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·नवोदित भाव·By प्रमोद कुमार शुक्ला

सोशल मीडिया एक्टिविस्ट सागर गोस्वामी की लेखनी से जन्मी राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत नई काव्य रचना

सोशल मीडिया एक्टिविस्ट सागर गोस्वामी की लेखनी से जन्मी राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत नई काव्य रचना

बहुआयामी प्रतिभा, मॉडर्न लुक और हंसमुख अंदाज़ के लिए युवाओं के बीच पहचाने जाने वाले सागर गोस्वामी

khabar4india.com का अनुभाग/सेक्सन "नवोदित भाव" एक ऐसा मंच है जो धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर केंद्रित है। हमारा उद्देश्य धर्म और अध्यात्म के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाना है, और इसमें हम नए लेखकों, कवियों और शायरों की मदद से उनकी रचनात्मकता को एक मंच प्रदान करना चाहते हैं। हमारे इस नए सेक्सन में, हम आपको उन प्रतिभाशाली लोगों से मिलवाएंगे जो अपनी कलम से धर्म और अध्यात्म की दुनिया को और भी समृद्ध बना रहे हैं। यहां आपको उनकी कविताएं, लेख, और शायरी पढ़ने को मिलेगी, जो आपको धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से प्रेरित करेंगी।

आज की प्रस्तुति

अपनी बहुआयामी प्रतिभा, मॉडर्न लुक और हंसमुख अंदाज़ के लिए युवाओं के बीच पहचाने जाने वाले सागर गोस्वामी के दिल से निकली कविता ने पढ़ने वालों का दिल छू लिया राष्ट्र भक्ति और आध्यात्म से सराबोर उनकी यह कविता है। देश के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा व भक्ति को प्रकट करती है। उन्होंने भारत माता की महिमा और इस पावन धरा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती हुई एक बेहद शानदार रचना की

इस कविता के माध्यम से उन्होंने उत्तर के पर्वतों से लेकर दक्षिण के महासागर, गंगा-कावेरी जैसी पवित्र नदियों और भारत के गौरवशाली इतिहास को अपनी पंक्तियों में पिरोया है। आध्यात्मिक मूल्यों, राष्ट्र रक्षा की भावना और आधुनिक सोशल मीडिया संस्कृति का यह अनूठा संगम युवाओं को अपनी संस्कृति और देश से जुड़ने की प्रेरणा दे रहा है।

जब-जब मैं साँसें लेता हूँ,

इस मिट्टी का ऋणी हो जाता हूँ,

हे भारत, तेरी धरती को

कोटि-कोटि शीश नवाता हूँ।

जहाँ दक्षिण में सागर

तेरे चरणों को छूता है,

जहाँ लहरों में भी तेरा

अनंत स्वर गूँजता है।

जहाँ गंगा की निर्मल धारा

तेरे आँचल सी बहती है,

जहाँ कावेरी, कृष्णा, नर्मदा

तेरी कहानी कहती हैं।

जहाँ मरुस्थल की रेत में भी

वीरों की गाथा मिलती है,

जहाँ हर कण में सदियों की

एक नई कहानी खिलती है।

यहीं कहीं से सभ्यता ने

दुनिया में पहला कदम बढ़ाया,

यहीं ज्ञान ने दीप जलाकर

अंधकार को दूर भगाया।

यहीं वेदों की ऋचाएँ गूँजीं,

यहीं ज्ञान की ज्योति जली,

यहीं बुद्ध की करुणा निकली,

यहीं से मानवता चली।

और जब नज़र उठती है ऊपर,

तो हिमालय खड़ा दिखाई देता है,

धरती का मस्तक बनकर

आकाश को छूता दिखाई देता है

उसकी सबसे ऊँची चोटी पर,

जहाँ पहुँचती है हर निगाह,

वहाँ भी तेरा ही गौरव है,

वहाँ भी तेरी ही छाँव।

दक्षिण के सागर से लेकर

एवरेस्ट की ऊँचाई तक,

हर धड़कन में तू ही बसा है,

हर साँस में तेरी ही महक।

हे भारत, तू केवल मेरा देश नहीं,

मेरी साँसों का विश्वास है।

तेरी मिट्टी में जन्म मिला,

इससे बड़ा क्या सौभाग्य है।

जब तक साँस रहेगी मेरी,

तेरा ऋण बढ़ता जाएगा,

और जब अंतिम साँस भी निकले,

तेरा नाम ही साथ जाएगा।

आप भी बन सकते हैं हमारे इस मंच का हिस्सा!

अगर आप भी धार्मिक या आध्यात्मिक विषयों पर लिखते हैं, और अपनी रचनाओं को दुनिया के सामने लाना चाहते हैं, तो हमसे संपर्क करें! आप हमें अपनी कविताएं, लेख, या शायरी व्हाट्सएप के माध्यम से भेज सकते हैं। यह पूर्ण रूप से निशुल्क है। अपनी कविता और अपना परिचय हमें एक फोटो के साथ व्हाट्सएप करें

हम आपकी रचनाओं का इंतज़ार कर रहे हैं!

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.