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·Bhatkmal·By प्रमोद कुमार शुक्ला

भक्तराज शिव जब बने अपने ही भक्तों के दास

भक्तराज शिव जब बने अपने ही भक्तों के दास

भगवान शिव काल के भी काल 'महाकाल' बनकर शिवलिंग से प्रकट हो गए और यमराज को परास्त कर मार्कंडेय को अमरता का वरदान दिया। भक्त की रक्षा के लिए मृत्यु के नियम को बदल देना शिव के भक्त-प्रेमी स्वभाव को दर्शाता है।

सनातन परंपरा में देवों के देव महादेव को सृष्टि के सर्वोच्च सत्ता, संहारक और परब्रह्म के रूप में देखा जाता है। वे सर्वशक्तिमान हैं, कालातीत हैं और त्रिदेवों में अग्रगण्य हैं। परंतु शास्त्रों, पुराणों और संतों के प्रामाणिक अनुभवों का सूक्ष्म अध्ययन एक अद्भुत और भावुक कर देने वाले सत्य को उजागर करता है भगवान शिव न केवल भगवान हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड के सबसे बड़े 'भक्त' और 'भक्तदास' भी हैं।

यदि भक्ति की पराकाष्ठा, समर्पण की गहराई और निरहंकारिता की कसौटी पर देखा जाए, तो महादेव संपूर्ण ब्रह्मांड के समस्त भक्तों, ऋषियों और संतों में भी श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं। एक समाचार विशेष के माध्यम से आइए जानते हैं कि कैसे शिव का यह 'भक्त चरित्र' उन्हें केवल ईश्वर ही नहीं, बल्कि भक्ति का उच्चतम शिखर बनाता है।

श्री राम के 'परम भक्त' के रूप में शिव

आमतौर पर माना जाता है कि ईश्वर की पूजा भक्त करते हैं, लेकिन शिव का चरित्र इस धारणा को उलट देता है। भगवान शिव स्वयं भगवान श्री विष्णु (और उनके राम अवतार) के अनन्य उपासक हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव कैलाश पर निरंतर 'श्री राम' नाम का जप करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में स्पष्ट लिखा है

उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना॥

महादेव स्वयं अपनी अर्धांगिनी पार्वती से कहते हैं कि संपूर्ण जगत स्वप्न के समान है, केवल हरि का भजन ही सत्य है।

सेवकाई के लिए हनुमान अवतार: भक्ति की पराकाष्ठा तब देखने को मिलती है जब सर्वशक्तिमान शिव अपने आराध्य श्री राम की सेवा के लिए स्वयं हनुमान के रूप में एकादश रुद्र अवतार लेते हैं। एक स्वामी होकर दास का रूप धारण करना और अपने आराध्य के चरणों की सेवा करना शिव के अलावा ऐसा उदाहरण संपूर्ण ब्रह्मांड में कहीं नहीं मिलता।

भक्त-पराधीन महादेव: जब भगवान बने भक्त के सेवक

शिव केवल भगवान विष्णु के भक्त नहीं हैं, बल्कि जो जीव शिव की भक्ति करता है, शिव उसके भी दास बन जाते हैं। संतों की सभा में शिव को 'भक्त-वत्सल' और 'भक्त-पराधीन' कहा गया है। इतिहास और पुराण ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं जहाँ शिव ने अपने भक्तों के आगे अपने ईश्वरत्व को भूलकर एक सेवक का भाव अपनाया।

कन्नप्पा नायनार की भक्ति और शिव का समर्पण

दक्षिण भारत के 63 नायनारों (शिवभक्तों) में कन्नप्पा का नाम सर्वोपरि है। कन्नप्पा एक निरक्षर जंगल के किरात (शिकारी) थे। उन्हें पूजा-पाठ का कोई ज्ञान नहीं था। वे अपने मुख में जल भरकर शिवलिंग पर नहलाते थे और मांस का भोग लगाते थे। जब शिवलिंग की आँख से रक्त बहने लगा, तो कन्नप्पा ने बिना सोचे अपनी आँख निकालकर शिवलिंग पर लगा दी।

जब दूसरी आँख से भी रक्त बहने लगा, तो उन्होंने अपना पैर शिवलिंग पर रखा ताकि स्थान का पता रहे और अपनी दूसरी आँख भी निकालने लगे। उसी क्षण महादेव प्रकट हुए, कन्नप्पा का हाथ थामा और उन्हें अपने गले से लगा लिया। महादेव ने एक अशिक्षित शिकारी के आगे झुककर सिद्ध कर दिया कि उनके लिए कर्मकांड नहीं, केवल भाव और प्रेम मायने रखता है।

मार्कंडेय की रक्षा के लिए यमराज से भिड़ना

16 वर्ष की अल्पायु वाले बाल ऋषि मार्कंडेय जब शिवलिंग से लिपट गए, तो स्वयं यमराज उनके प्राण हरने आए। अपने भक्त की पुकार सुनकर भगवान शिव काल के भी काल 'महाकाल' बनकर शिवलिंग से प्रकट हो गए और यमराज को परास्त कर मार्कंडेय को अमरता का वरदान दिया। भक्त की रक्षा के लिए मृत्यु के नियम को बदल देना शिव के भक्त-प्रेमी स्वभाव को दर्शाता है।

बाणासुर का द्वारपाल बनना: भक्ति के आगे शिव का आत्मसमर्पण

भक्ति की चरम सीमा तब देखने को मिलती है जब भक्त का प्रेम ईश्वर को बाध्य कर देता है। असुर राज बाणासुर शिव का अनन्य भक्त था। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उससे वरदान माँगने को कहा। बाणासुर ने कहा, "हे प्रभु! आप मेरे महल के मुख्य द्वार पर रक्षक बनकर तैनात रहें।" त्रिलोकी के स्वामी, जिनके इशारे पर पूरी सृष्टि चलती है, वे बिना किसी संकोच के एक दैत्य के महल के बाहर गदा लेकर द्वारपाल बनकर खड़े हो गए।

जब भगवान श्री कृष्ण और बाणासुर का युद्ध हुआ, तो शिव ने अपने भक्त बाणासुर का पक्ष लेकर श्री कृष्ण से युद्ध भी लड़ा। यह इस बात का प्रमाण है कि शिव अपने भक्त के लिए किस हद तक जा सकते हैं।

निष्कर्ष: संतों के भी संत हैं महादेव

समापन रूप में यह कहा जा सकता है कि भगवान शिव केवल उपासना के योग्य 'देव' ही नहीं हैं, बल्कि वे स्वयं 'उपासना' का सर्वोच्च स्वरूप हैं। वे एक ओर जहाँ सर्वोच्च ईश्वर हैं, वहीं दूसरी ओर भक्ति के सबसे बड़े आदर्श हैं। उन्होंने यह सिखाया कि सच्चा संत या भक्त वह नहीं जो केवल पूजा करे, बल्कि वह है जो दूसरों के दुखों को पी जाए (विषपान करे) और हर जीव में ईश्वर को देखे।

आज के समय में जब मनुष्य भक्ति में भी अहंकार और आडंबर की खोज करता है, शिव का 'भक्त चरित्र' हमें निरहंकारिता, सरलता और निष्काम प्रेम का मार्ग दिखाता है। शिव संत भी हैं, भिक्षुक भी हैं, राजा भी हैं और दास भी और यही चरित्र उन्हें संपूर्ण ब्रह्मांड का 'श्रेष्ठतम भक्त' और 'भक्तों का मुकुटमणि' सिद्ध करता है।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.