“गच्छनन्द्ब्रजं तात तत्र नन्दयशोदयोः। कृष्णं रामं च संरक्षन् गोपगोपीजनैर्वृतः॥” ग्रंथों के अनुसार, गोकुल वन का विस्तार यमुना के तट पर सघन कुंजों और विशाल चरागाहों के रूप में था। यह वन केवल वृक्षों का समूह नहीं, बल्कि 'गो-कुल' (गायों का परिवार) का आश्रय स्थल था।
"महावनं चतुर्थं तु सर्वपापप्रणाशनम्। तत्र गत्वा नरो देवि पुनर्जन्म न विद्यते॥" अर्थात्: बारह वनों में चतुर्थ स्थान पर स्थित महावन सभी पापों को नष्ट करने वाला है। यहाँ जाने वाले मनुष्य को पुनर्जन्म का भय नहीं रहता।
"बिल्वपत्रैश्चितं रम्यं बिल्ववनं मुनीश्वरैः। तत्र दृष्ट्वा महालक्ष्मीं सर्वान्कामानवाप्नुयात्॥"
अर्थात्: मुनीश्वरों द्वारा सेवित यह बिल्ववन (बेलवन) अत्यंत रमणीय है। यहाँ महालक्ष्मी के दर्शन करने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
"लोहजंघं वनं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्। तत्र गत्वा नरो देवि मम लोकं स गच्छति॥" अर्थात्: लोहजंघ (लोहवन) अत्यंत पुण्यदायी और सभी पापों को नष्ट करने वाला है। जो भी मनुष्य यहाँ भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह निश्चित रूप से विष्णु लोक को प्राप्त होता है।
"भांडीरं नाम तद्वनं सर्वपापप्रणाशनम्। तत्र दृष्ट्वा तु देवेशं पुनर्जन्म न विद्यते॥" अर्थात्: भांडीर नाम का यह वन सभी पापों को नष्ट करने वाला है। यहाँ के अधिष्ठाता देव के दर्शन मात्र से पुनर्जन्म नहीं होता।
गर्ग संहिता (वृंदावन खंड): महर्षि गर्ग द्वारा रचित 'गर्ग संहिता' में भद्रवन को 'नित्य सिद्ध' वन कहा गया है। यहाँ वर्णन मिलता है कि यमुना के तट पर स्थित इस वन की लताएं और वृक्ष साक्षात वेदों की ऋचाओं का गान करते हैं। यह वन भगवान की 'गोष्ठ-लीला' का मुख्य केंद्र रहा है।
"कामवनं नाम वनं यत्र गत्वा नरो देवि। सर्वान्कामानवाप्नोति मम लोके महीयते॥"
अर्थात्: कामवन वह स्थान है जहाँ जाने से मनुष्य की सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं और वह मेरे लोक (वैकुंठ) में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।