पहले प्रबोधानंद जी तर्क करते थे कि ब्रह्म निराकार है, लेकिन महाप्रभु के सानिध्य में उन्हें अनुभव हुआ कि सगुण साकार 'कृष्ण' ही परम सत्य हैं। महाप्रभु की कृपा से उनका 'मायावाद' का अहंकार ढह गया और वे पूरी तरह कृष्ण-प्रेमी बन गए।
वे दक्षिण और उत्तर भारत के बीच भक्ति के सेतु थे। उनका संयम, शास्त्र निष्ठा और श्री राधा रमण देव के प्रति उनका अनन्य अनुराग आज भी हर भक्त के लिए प्रेरणास्रोत है।
उस समय बरसाना का क्षेत्र सघन जंगलों से ढका था और राधा रानी का प्राचीन मंदिर खंडित या लुप्त प्राय था। मान्यता है कि श्री राधा जी ने स्वयं उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और उस स्थान का संकेत दिया जहाँ उनका विग्रह दबा हुआ था।
श्री जीव गोस्वामी केवल एक लेखक नहीं, बल्कि एक महान संगठनकर्ता भी थे। उन्होंने 'विश्व वैष्णव राज सभा' की स्थापना की, जो संभवतः दुनिया का पहला अंतरराष्ट्रीय वैष्णव संगठन था।
गदाधर भट्ट जी का विशेष जुड़ाव श्री मदनमोहन जी (सनातन गोस्वामी के आराध्य) के साथ था। वे अक्सर मदनमोहन जी के मंदिर में बैठकर घंटों अश्रु बहाते हुए भजन करते थे।
इतिहासकारों और गौड़ीय वैष्णव ग्रंथों के अनुसार, श्री भूगर्भ गोस्वामी और उनके घनिष्ठ मित्र श्री लोकनाथ गोस्वामी वे पहले दो व्यक्ति थे, जिन्हें चैतन्य महाप्रभु ने वृंदावन के लुप्त तीर्थों का उद्धार करने के लिए सबसे पहले भेजा था।
मान्यता है कि वृंदावन के प्रसिद्ध 'वंशीवट' (जहाँ कृष्ण वंशी बजाया करते थे) के पास यमुना के किनारे मधु पंडित को भगवान गोपीनाथ का अत्यंत सुंदर विग्रह प्राप्त हुआ।
जब चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप में संकीर्तन आंदोलन शुरू किया, तब लोकनाथ जी उनके मुख्य पार्षदों में से एक बन गए। लेकिन जब महाप्रभु ने सन्यास लेने का निश्चय किया, तो लोकनाथ जी का हृदय वियोग की आशंका से भर गया।