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ब्रह्म संप्रदाय का इतिहास, स्वरूप, विभाजन और वर्तमान स्थिति
·उत्सव विशेष·By प्रमोद कुमार शुक्ला

ब्रह्म संप्रदाय का इतिहास, स्वरूप, विभाजन और वर्तमान स्थिति

वैष्णव परंपरा के अनुसार, इस संप्रदाय के आद्य-प्रवर्तक स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी हैं। भगवान नारायण (विष्णु) ने सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी को जो दिव्य ज्ञान प्रदान किया, वही आगे चलकर 'ब्रह्मा संप्रदाय' के नाम से जाना गया।

परम भागवत महर्षि वशिष्ठ: ज्ञान, गुरुता एवं अनन्य भक्ति का दिव्य स्वरूप
·Bhatkmal·By प्रमोद कुमार शुक्ला

परम भागवत महर्षि वशिष्ठ: ज्ञान, गुरुता एवं अनन्य भक्ति का दिव्य स्वरूप

भक्ति मार्ग में साधक का ध्येय भगवान की शरणागति और उनके चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त करना होता है। ज्ञानी प्रायः 'सोऽहम्' (मैं वह हूँ) के भाव में लीन रहता है, परंतु परम भक्त 'दासोऽहम्' (मैं प्रभु का दास हूँ) के भाव में आनंद का अनुभव करता है। म

महात्मा विदुर: निष्काम भक्ति, धर्म और शरणागति के सर्वोच्च प्रतीक
·Bhatkmal·By प्रमोद कुमार शुक्ला

महात्मा विदुर: निष्काम भक्ति, धर्म और शरणागति के सर्वोच्च प्रतीक

"न मे भक्तः प्रणश्यति" (मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता) — श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्री कृष्ण का यह वचन महात्मा विदुर के जीवन में शत-प्रतिशत चरित्रार्थ होता है।

विदुरानी जी का भक्ति चरित्र: प्रेम, समर्पण और पराकाष्ठा
·Bhatkmal·By प्रमोद कुमार शुक्ला

विदुरानी जी का भक्ति चरित्र: प्रेम, समर्पण और पराकाष्ठा

विदुरानी जी (जिन्हें कई पौराणिक संदर्भों में 'सुलभा' नाम से भी जाना जाता है) हस्तिनापुर के महाज्ञानी, नीतिशास्त्र के प्रकांड विद्वान और धर्मनिष्ठा के प्रतीक महात्मा विदुर की धर्मपत्नी थीं।

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