
श्री राधा संकेत बिहारी जी मन्दिर का इतिहास एवं जीवंत परंपराएं
"संकेतये कल्पतरु प्रसूने, राधा मुकुन्दो मिलतो यत्र।" अर्थात्, जहाँ कल्पवृक्षों की छांव में राधा और मुकुंद का गुप्त मिलन और रास संपन्न हुआ, वही संकेत भूमि है।

"संकेतये कल्पतरु प्रसूने, राधा मुकुन्दो मिलतो यत्र।" अर्थात्, जहाँ कल्पवृक्षों की छांव में राधा और मुकुंद का गुप्त मिलन और रास संपन्न हुआ, वही संकेत भूमि है।

सखियों और गोपियों के मटके फोड़ना, माखन लूटना और कल्पवृक्ष की छांव में बांसुरी बजाना यहाँ की नित्य लीला थी।

शनिदेव की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें इसी वन में कोकिला' (कोयल) के रूप में दर्शन दिए। श्रीकृष्ण के कोयल रूप में प्रकट होने के कारण ही इस पवित्र वन का नाम 'कोकिलावन' पड़ा।

, "तत्त्वा! भोजन अत्यंत स्वादिष्ट है, इसमें किसी वस्तु की कमी नहीं है।" यह सुनकर तत्त्वाजी भाव-विभोर होकर नाचने लगे।