आज हम आपको मिलाएंगे कवि अविनाश श्रीवास्तव जी से उनकी कलम में एक जादुई स्पर्श है, जो ठाकुर श्री राधारमण जी......
गोपाल भट्ट गोस्वामी अपने साथ लाए गए शालिग्रामों की नित्य सेवा करते थे। संवत 1599 (1542 ईस्वी) के आसपास की बात है, वृन्दावन में एक धनी भक्त आए जिन्होंने सभी विग्रहों के लिए सुंदर वस्त्र और आभूषण दान किए।
राधा दामोदर मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं रहा, बल्कि यह ज्ञान का भी केंद्र रहा है। इस्कॉन (ISKCON) के संस्थापक श्रील प्रभुपाद ने संन्यास लेने के बाद इसी मंदिर के एक छोटे से कमरे
भक्तों का विश्वास है कि श्री गोपीनाथ जी के दर्शन करने से भगवान के वक्षस्थल (हृदय) के दर्शन का फल प्राप्त होता है। यहाँ राधा जी के साथ ललिता सखी और विशाखा सखी की भी पूजा की जाती है
वह नूपुर साधारण नहीं था; उसकी आभा अलौकिक थी। मान्यता है कि वह नूपुर स्वयं श्रीमती राधारानी का था, जो रास के दौरान वहाँ गिर गया था। जब राधारानी एक गोपी के भेष में उसे लेने आईं, तो श्यामानंद जी ने अपनी निश्छल भक्ति से उन्हें पहचान लिया।
यद्यपि पर्वत श्री कृष्ण की छोटी उंगली पर था, किंतु विशाल जी का 'प्रेम' ऐसा था कि वे अपनी पूरी शक्ति लगा रहे थे ताकि उनके प्रिय कन्हैया को कष्ट न हो।
वृषभ जी अक्सर बलराम जी के साथ प्रतिस्पर्धा करते थे। वे इतने बलशाली थे कि कई बार वे बलराम जी को कड़ी चुनौती देते थे
गौड़ीय वैष्णव दर्शन में 'सुबल-मिलन' का विशेष महत्व है। सुबल जी का चरित्र यह सिखाता है कि भगवान की प्राप्ति के लिए कभी-कभी अपनी पहचान भी खोनी पड़ती है।