मोहनजोदड़ों से प्राप्त 'पशुपति सील' (Pashupati Seal) शैव परंपरा का प्राचीनतम भौतिक प्रमाण मानी जाती है। इस सील में त्रिमुखीय और ध्यानावस्थित एक आकृति दर्शायी गई है, जिसके चारों ओर पशु (व्याघ्र, हाथी, गैंडा और भैंसा) विराजमान हैं।
यह संप्रदाय केवल भक्ति मार्ग का प्रतिपादन नहीं करता, बल्कि द्वैत (भेद) और अद्वैत (अभेद) के बीच समन्वय स्थापित करते हुए 'द्वैताद्वैत दर्शन' का अत्यंत वैज्ञानिक व तार्किक ढांचा प्रस्तुत करता है।
भगवान शिव (रुद्र) द्वारा जगत के कल्याण हेतु विष्णु-ज्ञान के प्रथम उपदेश से प्रारंभ हुआ यह संप्रदाय आज शताब्दियों की यात्रा तय कर विभिन्न शाखाओं में प्रस्फुटित हो चुका है।
वैष्णव परंपरा के अनुसार, इस संप्रदाय के आद्य-प्रवर्तक स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी हैं। भगवान नारायण (विष्णु) ने सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी को जो दिव्य ज्ञान प्रदान किया, वही आगे चलकर 'ब्रह्मा संप्रदाय' के नाम से जाना गया।
भारतीय संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'श्री वैष्णव संप्रदाय' (Sri Vaishnavism) का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण और शीर्षस्थ है। यह संप्रदाय केवल एक धार्मिक मार्ग नहीं, बल्कि दर्शन, साहित्य, सामाजिक समरसता और मंदिर प्रबंधन की एक सुव्यवस्थित प्रणाली है।
विदुरानी जी (जिन्हें कई पौराणिक संदर्भों में 'सुलभा' नाम से भी जाना जाता है) हस्तिनापुर के महाज्ञानी, नीतिशास्त्र के प्रकांड विद्वान और धर्मनिष्ठा के प्रतीक महात्मा विदुर की धर्मपत्नी थीं।
भक्ति मार्ग में साधक का ध्येय भगवान की शरणागति और उनके चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त करना होता है। ज्ञानी प्रायः 'सोऽहम्' (मैं वह हूँ) के भाव में लीन रहता है, परंतु परम भक्त 'दासोऽहम्' (मैं प्रभु का दास हूँ) के भाव में आनंद का अनुभव करता है। म
"न मे भक्तः प्रणश्यति" (मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता) — श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्री कृष्ण का यह वचन महात्मा विदुर के जीवन में शत-प्रतिशत चरित्रार्थ होता है।