शनिदेव की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें इसी वन में कोकिला' (कोयल) के रूप में दर्शन दिए। श्रीकृष्ण के कोयल रूप में प्रकट होने के कारण ही इस पवित्र वन का नाम 'कोकिलावन' पड़ा।
, "तत्त्वा! भोजन अत्यंत स्वादिष्ट है, इसमें किसी वस्तु की कमी नहीं है।" यह सुनकर तत्त्वाजी भाव-विभोर होकर नाचने लगे।
कुछ अन्य रामानंदीय ग्रंथों के मत के अनुसार, वे प्रभु श्री रामचंद्र जी के अनन्य पार्षद के रूप में धरा पर अवतरित हुए थे ताकि कलियुग के जीवों को 'नाम-महिमा' और 'भोग-महिमा' का व्यावहारिक ज्ञान करा सकें।
श्री नाभादास जी महाराज कृत 'श्री भक्तमाल' के अनमोल मणियों में 'राजर्षि' से 'ब्रह्मर्षि' बनने वाले परम भक्त श्री पीपा जी महाराज का चरित्र अत्यंत विलक्षण है।
धन्य धन्य नरहरि गुरु, ज्ञान रूप अवतार। तुलसी से जगमग किये, दे भक्ति को सार
प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। उनका छोटा भाई 'वज्रध्वज' अत्यंत क्रूर, अधर्मी और अपने बड़े भाई से द्वेष रखने वाला था।
श्रीवास आंगन धन्य है, जहाँ नाचे गौर निताई।
भक्ति शक्ति परकट भई, कलिमल दियो नसाई ॥
रूपलाल जी को भक्ति और शास्त्र ज्ञान विरासत में मिला था। उनके पूर्वजों ने श्री राधावल्लभ लाल की सेवा को ही अपना जीवनोद्देश्य माना था। रूपलाल जी ने अल्पायु में ही संप्रदाय के..