
विदुरानी जी का भक्ति चरित्र: प्रेम, समर्पण और पराकाष्ठा
विदुरानी जी (जिन्हें कई पौराणिक संदर्भों में 'सुलभा' नाम से भी जाना जाता है) हस्तिनापुर के महाज्ञानी, नीतिशास्त्र के प्रकांड विद्वान और धर्मनिष्ठा के प्रतीक महात्मा विदुर की धर्मपत्नी थीं।

विदुरानी जी (जिन्हें कई पौराणिक संदर्भों में 'सुलभा' नाम से भी जाना जाता है) हस्तिनापुर के महाज्ञानी, नीतिशास्त्र के प्रकांड विद्वान और धर्मनिष्ठा के प्रतीक महात्मा विदुर की धर्मपत्नी थीं।

भक्ति मार्ग में साधक का ध्येय भगवान की शरणागति और उनके चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त करना होता है। ज्ञानी प्रायः 'सोऽहम्' (मैं वह हूँ) के भाव में लीन रहता है, परंतु परम भक्त 'दासोऽहम्' (मैं प्रभु का दास हूँ) के भाव में आनंद का अनुभव करता है। म

"न मे भक्तः प्रणश्यति" (मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता) — श्रीमद्भगवद्गीता भगवान श्री कृष्ण का यह वचन महात्मा विदुर के जीवन में शत-प्रतिशत चरित्रार्थ होता है।

निम्न वर्ग कुल में जन्म लेने के बावजूद अपनी अनन्य निष्ठा, निरहंकार, और निश्छल भक्ति के बल पर उन्होंने स्वयं भगवान श्री कृष्ण को यह सिद्ध करने पर मजबूर कर दिया कि "जाति-पांति पूछे न कोई, हरि को भजे सो हरि का होई।"