परंतु भक्ति मार्ग के आचार्यों (जैसे श्री रूप गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी और श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर) का मानना है कि शुकदेव जी का अद्वैत ज्ञान और निर्गुण समाधि केवल उनकी भक्ति की पृष्ठभूमि (Background) थी।
महर्षि अगस्त्य का चरित्र केवल ज्ञानी या सिद्ध पुरुष का नहीं है, बल्कि एक अनन्य भक्त का है। शास्त्रों में भक्ति के कई प्रकार बताए गए हैं—नवधा भक्ति, निष्काम भक्ति, और अनन्य भक्ति। महर्षि अगस्त्य की भक्ति में यह सभी रूप समाहित हैं।
नारदजी अपने पूर्वजन्म में एक अत्यंत साधारण शूद्रा दासी के पुत्र थे। परंतु, सत्संग के प्रभाव से उनका जीवन पूर्णतः बदल गया। संतों के भोजन के पश्चात बचे हुए प्रसाद को ग्रहण किया, जिससे उनके जन्मांतर के पाप नष्ट हो गए और चित्त शुद्ध हो गया।
महर्षि वाल्मीकि 'रत्नगिरि' या 'रत्नाकर' के नाम से जाने जाते थे। वे अपने कुटुंब के भरण-पोषण के लिए तमसा नदी के बीहड़ वनों में राहगीरों को लूटने और हिंसा का कार्य करते थे। उनके जीवन में न तो धर्म का ज्ञान था और न ही भक्ति का आस्वादन।
ब्रह्मा जी 'आचार्य' और 'भक्त' की भूमिका में हैं। एक सच्चा भक्त कभी यह नहीं चाहता कि भगवान को छोड़कर उसकी स्वयं की पूजा हो। ब्रह्मा जी ने स्वयं भगवान श्रीहरि और श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार किया। वे जीवों को अपनी ओर आकर्षित करने के बजाय सीधे 'हरि-चरणों' की ओर भेजते हैं।
सालबेग का पालन-पोषण एक मुस्लिम माहौल में हुआ, लेकिन उनकी माता के मन में छिपी हिंदू धार्मिक चेतना ने उनके अवचेतन मन पर गहरा प्रभाव डाला। ओड़िशा के प्रसिद्ध इतिहासकार और शोधकर्ता डॉ. के.सी. पाणिग्रही....
भगवान शिव काल के भी काल 'महाकाल' बनकर शिवलिंग से प्रकट हो गए और यमराज को परास्त कर मार्कंडेय को अमरता का वरदान दिया। भक्त की रक्षा के लिए मृत्यु के नियम को बदल देना शिव के भक्त-प्रेमी स्वभाव को दर्शाता है।
प्रायः देखा जाता है कि जब किसी साधक या संत को सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, तो उसमें अहंकार प्रवेश कर जाता है। परंतु श्री गणेश ....