
कृष्ण युग का साक्षी नंदभवन जहां आज भी दिखता है नंदबाबा का वैभव
सखियों और गोपियों के मटके फोड़ना, माखन लूटना और कल्पवृक्ष की छांव में बांसुरी बजाना यहाँ की नित्य लीला थी।

सखियों और गोपियों के मटके फोड़ना, माखन लूटना और कल्पवृक्ष की छांव में बांसुरी बजाना यहाँ की नित्य लीला थी।

शनिदेव की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें इसी वन में कोकिला' (कोयल) के रूप में दर्शन दिए। श्रीकृष्ण के कोयल रूप में प्रकट होने के कारण ही इस पवित्र वन का नाम 'कोकिलावन' पड़ा।

, "तत्त्वा! भोजन अत्यंत स्वादिष्ट है, इसमें किसी वस्तु की कमी नहीं है।" यह सुनकर तत्त्वाजी भाव-विभोर होकर नाचने लगे।

कुछ अन्य रामानंदीय ग्रंथों के मत के अनुसार, वे प्रभु श्री रामचंद्र जी के अनन्य पार्षद के रूप में धरा पर अवतरित हुए थे ताकि कलियुग के जीवों को 'नाम-महिमा' और 'भोग-महिमा' का व्यावहारिक ज्ञान करा सकें।