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·Bhatkmal·By प्रमोद कुमार शुक्ला

भक्तमाल के भक्त प्रवर श्री तत्त्वाजी का दिव्य चरित्र

भक्तमाल के भक्त प्रवर श्री तत्त्वाजी का दिव्य चरित्र

, "तत्त्वा! भोजन अत्यंत स्वादिष्ट है, इसमें किसी वस्तु की कमी नहीं है।" यह सुनकर तत्त्वाजी भाव-विभोर होकर नाचने लगे।

श्री तत्त्वाजी का प्रकटीकरण (जन्म) दक्षिण भारत के एक संभ्रांत, सुशिक्षित और धार्मिक रूप से अत्यंत सुदृढ़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यद्यपि उनके प्राकट्य के निश्चित संवत् को लेकर इतिहासकारों में किंचित मतभेद हैं, परंतु परंपरा और प्रामाणिक टीकाओं के अनुसार, उनका समय स्वामी रामानंद जी महाराज के परवर्ती काल और गोस्वामी तुलसीदास जी के समकालीन परिवेश के मध्य का माना जाता है।

बाल्यकाल से ही तत्त्वाजी की बुद्धि अलौकिक थी। वे अत्यंत कुशाग्र और वेदान्त के गूढ़ तत्त्वों को सहज ही हृदयंगम करने वाले थे। इसी कारण उनका नाम 'तत्त्व' से जोड़कर 'तत्त्वाजी' प्रसिद्ध हुआ। उनके जीवन के साथ उनके अनन्य सखा और सह-धर्मी 'जीवाजी' का नाम सदैव जुड़ा रहता है। ग्रंथाकार बताते हैं कि इन दोनों महापुरुषों की आत्मा मानो एक ही थी, जो दो शरीरों में निवास करती थी।

प्रारम्भिक जीवन में तत्त्वाजी शुद्ध अद्वैत वेदांत के प्रबल समर्थक और ज्ञान-मार्ग के कठोर अनुगामी थे। वे "अहं ब्रह्मास्मि" और "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" के सिद्धांतानुसार संसार को मिथ्या मानकर केवल निराकार ब्रह्म के चिंतन में लीन रहते थे। उनके जीवन में कर्मकांड और शुष्कता का प्रभाव अधिक था, और वे सगुण-साकार भक्ति तथा विग्रह-पूजा (मूर्ति-पूजा) को केवल प्रारंभिक साधकों के लिए ही उपयोगी मानते थे

ज्ञान से भक्ति की ओर: जीवन का महान परिवर्तन

श्री तत्त्वाजी के जीवन की सबसे प्रमुख लीला उनका 'ज्ञान-मार्ग' से 'प्रेम-भक्ति-मार्ग' में रूपांतरण है। श्रीभक्तमाल की प्रियादास जी कृत 'भक्तिरसबोधिनी' टीका में इस प्रसंग का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। तत्त्वाजी और जीवाजी दोनों ही ज्ञानी थे, परंतु उनके भीतर का अहंकार अभी पूरी तरह नष्ट नहीं हुआ था। वे विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित करने का आनंद लेते थे। एक समय की बात है, श्री वैष्णव संप्रदाय के एक परम सिद्ध, रसिक संत का आगमन उनके क्षेत्र में हुआ। वे संत साक्षात् श्री रघुनाथ जी (भगवान श्रीराम) के अनन्य उपासक थे और श्रीविग्रह की सेवा अत्यंत भाव से करते थे।

तत्त्वाजी ने उन संत के पास जाकर ज्ञान की चर्चा छेड़ी और कहा "जब ईश्वर सर्वव्यापी, निराकार और अजन्मा है, तो उसे एक काष्ठ, पाषाण या धातु की मूर्ति में सीमित करना और उसे भोग लगाना, सुलाना, जगाना कहाँ की बुद्धिमानी है? यह तो अज्ञानता का परिचायक है।" सिद्ध वैष्णव संत ने तत्त्वाजी की बात सुनी और मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने कोई शास्त्रार्थ नहीं किया, क्योंकि वे जानते थे कि शुष्क तर्क से कभी ईश्वर को नहीं जाना जा सकता। संत ने केवल इतना कहा, "तात! तुम जिसे पाषाण कह रहे हो, वह मेरे प्राणों का आधार है। कभी प्रेम की आँख से देखोगे, तो तुम्हें इसमें सारा ब्रह्मांड गतिमान दिखेगा।"

उसी रात्रि को भगवान ने तत्त्वाजी के स्वप्न में आकर दर्शन दिए। भगवान के उस अनुपम रूप को देखकर, जिसमें अपार करुणा और अलौकिक सौंदर्य था, तत्त्वाजी का सारा तार्किक अभिमान चूर-चूर हो गया। जब वे सोकर उठे, तो उनकी आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। जो हृदय कल तक वज्र के समान कठोर और तार्किक था, वह आज नवनीत (मक्खन) के समान कोमल हो चुका था। वे तुरंत दौड़कर उन वैष्णव संत के चरणों में गिर पड़े और दीक्षा की याचना की। संत ने उन्हें राम-मंत्र की दीक्षा दी और तिलक-माला से विभूषित किया।

प्रमुख लीलाएँ एवं भक्ति के चमत्कार

दीक्षा प्राप्त करने के बाद श्री तत्त्वाजी का जीवन पूर्णतः बदल गया। अब वे शास्त्रार्थ नहीं करते थे, बल्कि केवल 'राम-नाम' का संकीर्तन करते थे। उनके जीवन से जुड़ी कई ऐसी लीलाएँ हैं जो ग्रंथों में वर्णित हैं

विग्रह में प्राण-प्रतिष्ठा और ठाकुर जी का प्रत्यक्ष संवाद : तत्त्वाजी ने अपने घर में भगवान मदनमोहन जी (या श्री रामजी) के विग्रह की स्थापना की। वे अब केवल पूजा नहीं करते थे, बल्कि एक साक्षात् सखा और पुत्र के रूप में ठाकुर जी की सेवा करते थे। एक बार भोग लगाते समय वे भूल गए कि उन्होंने भोजन में नमक डाला है या नहीं। वे संशय में पड़ गए। तभी विग्रह से साक्षात् आवाज आई, "तत्त्वा! भोजन अत्यंत स्वादिष्ट है, इसमें किसी वस्तु की कमी नहीं है।" यह सुनकर तत्त्वाजी भाव-विभोर होकर नाचने लगे।

साधु-सेवा की अद्भुत निष्ठा

तत्त्वाजी का नियम था कि उनके द्वार पर जो भी साधु, संत या भिक्षुक आता, वे उसे बिना भोजन कराए और बिना आदर दिए जाने नहीं देते थे। एक बार उनके क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा। घर में अन्न का एक दाना भी नहीं बचा था। उसी समय संतों की एक विशाल टोली उनके घर आ पहुँची। तत्त्वाजी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपनी पत्नी से विचार किया और अपने घर के बहुमूल्य वस्त्र और बर्तन बेचकर संतों के लिए छप्पन भोग की व्यवस्था की। संतों ने तृप्त होकर आशीर्वाद दिया, जिसके प्रभाव से उनके अन्न भंडार स्वतः ही सदा के लिए भर गए।

पार्षद अवतार की मान्यता

कतिपय रसिक संतों का यह भी मत है कि श्री तत्त्वाजी साक्षात् साकेत लोक (या गोलोक) के नित्य पार्षद हैं, जो धराधाम पर केवल कलयुगी जीवों को यह सिखाने आए थे कि शुष्क वेदांत से ईश्वर नहीं मिलता, ईश्वर तो केवल 'प्रेम' और 'शरणागति' से ही रीझता है।

प्रामाणिक दोहे एवं चौपाइयाँ

श्रीभक्तमाल और उसकी टीकाओं में तत्त्वाजी के महत्त्व को प्रतिपादित करने वाले कई प्रामाणिक छंद मिलते हैं। स्वामी नाभादास जी महाराज कृत मूल भक्तमाल से तत्त्वाजी और जीवाजी की महिमा को प्रकट करता हुआ प्रसिद्ध छप्पय इस प्रकार है:

तत्त्वा जीवा दोउ भ्रात, भक्ति रस रँगे अनन्य।

ज्ञान विराग आगार, जगत जननी जन धन्य॥

कहैं कथा रघुनाथ की, श्रवण सुनत अघ जात।

नाभादास ऐसे भक्त की, महिमा कही न जात

भावार्थ: तत्त्वाजी और जीवाजी दोनों भाई (सखा) भक्ति के रस में पूरी तरह रंगे हुए अनन्य वैष्णव हैं। वे ज्ञान और वैराग्य के साक्षात् भंडार हैं, जिन्होंने इस संसार में जन्म लेकर अपनी माता की कोख को धन्य कर दिया। वे जब श्री रघुनाथ जी की कथा कहते हैं, तो सुनने वालों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्री तत्त्वाजी का जीवन इस बात का सर्वोच्च दृष्टांत है कि साधना की पूर्णता ज्ञान की शुष्कता में नहीं, अपितु भक्ति की आद्र्रता में है। उन्होंने सिद्ध किया कि जब तक ज्ञान में प्रेम का संपुट न लगे, तब तक वह जीव को मुक्ति तो दे सकता है, पर 'भगवद्-रस' नहीं दे सकता। श्रीभक्तमाल में अंकित उनका यह पावन चरित्र युगों-युगों तक साधकों का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा। उनके चरणों में कोटिशः नमन है।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.