भक्तमाल के श्री जीवाजी महाराज का चरित्र एवं लीला-वैभव

कुछ अन्य रामानंदीय ग्रंथों के मत के अनुसार, वे प्रभु श्री रामचंद्र जी के अनन्य पार्षद के रूप में धरा पर अवतरित हुए थे ताकि कलियुग के जीवों को 'नाम-महिमा' और 'भोग-महिमा' का व्यावहारिक ज्ञान करा सकें।
श्रीधाम वृंदावन
सनातनी भक्ति-साहित्य के इतिहास में श्री नाभादास जी कृत 'श्री भक्तमाल' एक ऐसा अनुपम ग्रंथ है, जो भक्तों के चरित्र के माध्यम से साक्षात् हरि-तत्व का दिग्दर्शन कराता है। इस पावन ग्रंथ के परम उज्ज्वल चरित्रों में श्री जीवाजी महाराज (जिन्हें अनेक स्थानों पर जीवा राम जी या भक्त जीवाजी भी कहा गया है) का नाम अत्यंत श्रद्धा के साथ लिया जाता है। वे केवल एक साधक नहीं, बल्कि साक्षात् माधुर्य भक्ति के ऐसे विग्रह थे, जिन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि भगवान केवल क्रिया के नहीं, अपितु भाव के भूखे हैं।
प्रस्तुत लेख विभिन्न प्रामाणिक वैष्णव ग्रंथों, टीकाओं और परंपराओं के आधार पर उनके प्राकट्य, अलौकिक लीलाओं और उनके स्वरूप को रेखांकित करता है। श्री जीवाजी महाराज का प्राकट्य और उनका प्रारंभिक जीवन दिव्य कौतुक से परिपूर्ण है। वैष्णव इतिहास और 'श्री भक्तमाल की प्रियादास जी कृत भक्तिरसबोधिनी टीका' के अनुसार, उनका जन्म मध्यकालीन भारत की पावन धरा पर एक अत्यंत सदाचारी और भगवद्भक्त परिवार में हुआ था।
दिव्य जन्म और बाल्यकाल
बचपन से ही उनके भीतर सांसारिक विषयों के प्रति पूर्ण विरक्ति और ठाकुर जी के प्रति अनन्य अनुराग था। अन्य बालक जहाँ खेल-कूद में समय व्यतीत करते थे, वहीं जीवाजी मिट्टी के ठाकुर जी बनाकर उनकी सेवा-अर्चना में लीन रहते थे। 'भक्तिरसबोधिनी टीका' (कवित्त संख्या ३४०-३४५) के अंतर्गत यह संकेत मिलता है कि उनका हृदय बाल्यकाल से ही नवधा भक्ति के रंग में रंगा हुआ था। दीक्षा और गुरु-शरण
वैष्णव सिद्धांतों के अनुसार बिना गुरु के भक्ति मार्ग में प्रवेश असंभव है। श्री जीवाजी ने तत्कालीन प्रामाणिक रामानंदीय परंपरा के सिद्ध संत से दीक्षा प्राप्त की। ग्रंथों में उल्लेख है कि गुरु मंत्र प्राप्त करते ही उनके भीतर की सुप्त विरक्ति पूर्णतः जाग्रत हो गई और उन्होंने अपना सर्वस्व श्री राधा-कृष्ण (अथवा सीताराम जी, रूप भेद से दोनों ही युगल स्वरूप) के चरणों में समर्पित कर दिया।
श्री जीवाजी महाराज की प्रमुख अलौकिक लीलाएँ
श्री जीवाजी महाराज का जीवन चमत्कारों के प्रदर्शन के लिए नहीं था, परंतु उनकी अनन्य निष्ठा और निश्छल भाव को प्रकट करने के लिए स्वयं भगवान को कई लीलाएँ रचनी पड़ीं। ग्रंथों में वर्णित कुछ प्रमुख लीलाएँ निम्नलिखित हैं
ठाकुर जी का सखा भाव से भोजन करना (भाव-विजृम्भित लीला) : श्री जीवाजी महाराज की भक्ति 'सख्य' और 'माधुर्य' भाव की पराकाष्ठा थी। वे जब अपने आराध्य को भोग लगाते थे, तो केवल औपचारिकता नहीं करते थे। 'भक्तमाल प्रसंग' और 'वैष्णवन की वार्ता' के समकालीन प्रसंगों के अनुसार, जीवाजी अपने ठाकुर जी के सम्मुख बैठकर ठीक उसी तरह मनुहार करते थे, जैसे कोई अपने परम मित्र से करता है। एक बार उन्होंने ठाकुर जी के आगे अत्यंत प्रेम से गरम-गरम रोटियाँ और माखन रखा।
वे साक्षात् देखने लगे कि ठाकुर जी आरोग (भोजन कर) रहे हैं। ठाकुर जी का हाथ जल न जाए, इसलिए वे अपने आंचल से पंखा झलने लगे। इस अलौकिक दृश्य को देखकर वहां उपस्थित अन्य बाह्य-दृष्टि वाले लोग चकित रह गए, क्योंकि उन्हें केवल मूर्ति दिख रही थी, परंतु जीवाजी को साक्षात् प्राणेश्वर के दर्शन हो रहे थे।
शरणागत वत्सलता और संतों की सेवा : जीवाजी महाराज के जीवन का मूल मंत्र था—"मदभक्त पूज्याभ्यधिका" अर्थात् मेरे भक्तों की पूजा मुझसे भी बढ़कर है। उनके आश्रम पर जो भी साधु-संत आते, वे उनकी सेवा में अपना तन-मन-धन अर्पित कर देते थे। श्री प्रियम्वदा कृत 'भक्त चरितावली' में वर्णन आता है कि एक बार आश्रम में अन्न का सर्वथा अभाव हो गया। रात्रि का समय था और अचानक संतों की एक मण्डली पधार गई। जीवाजी विचलित नहीं हुए।
उन्होंने अपने ठाकुर जी के आभूषण और यहाँ तक कि स्वयं के वस्त्र तक गिरवी रखकर संतों के लिए उत्तम छप्पन भोग की व्यवस्था की। भगवान ने उनकी इस लाज को रखने के लिए स्वयं सेठ का रूप धारण कर व्यापारी का कर्ज चुकाया था।
स्वरूप विचार पूर्ण अवतार की मान्यता : वैष्णव वांग्मय और रस शास्त्र के ग्रंथों में श्री जीवाजी महाराज को कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि गोलोक अथवा साकेत धाम की नित्य लीला का एक अभिन्न अंग माना गया है।
सखी अथवा पार्षद अवतार : 'श्री स्वरूप-निरूपण' एवं 'भक्तमाल के रसिकाचार्य' की टीकाओं के अनुसार, श्री जीवाजी महाराज को गोलोक धाम की 'जीवा' सखी का साक्षात् अवतार माना जाता है। युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) की निकुंज लीलाओं में सखियों का जो भाव होता है, वही भाव जीवाजी के भीतर कूट-कूट कर भरा था।
कुछ अन्य रामानंदीय ग्रंथों के मत के अनुसार, वे प्रभु श्री रामचंद्र जी के अनन्य पार्षद के रूप में धरा पर अवतरित हुए थे ताकि कलियुग के जीवों को 'नाम-महिमा' और 'भोग-महिमा' का व्यावहारिक ज्ञान करा सकें। उनका संपूर्ण जीवन साक्षात् प्रेम का विग्रह था, इसलिए उन्हें 'प्रेम-अवतार' की संज्ञा भी दी जाती है।
प्रियादास जी कृत 'भक्तिरसबोधिनी टीका' से प्रामाणिक कवित्त:
भाव को भूखो भयो मेरो ठाकुर, क्रिया को कछू न मानत है। जीवाजी के हाथ सों खायो माखन, ऐसो प्रेम पहिचानत है॥
लोक-लाज सब छाँड़ि के, सुमिरन की कसर न राखी। संतन की सेवा करी, जाकी साखी भरत हैं साखी॥
'श्री भक्तमाल सटीक' (प्रियादास जी कृत कवित्त संख्या ३४२), कल्याण संतांक।
अर्थ: इस पद में स्पष्ट किया गया है कि हमारे ठाकुर जी केवल भाव के भूखे हैं, वे बाहरी पाखंड या क्रिया को प्रधानता नहीं देते। श्री जीवाजी महाराज ने जब प्रेम से माखन का भोग लगाया, तो प्रभु ने उनके हाथों से साक्षात् भोजन ग्रहण किया। उन्होंने लोक-लाज को त्याग कर केवल हरि-स्मरण और संत-सेवा को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।
