भक्ति के पंचतत्व एवं अनन्य शरणागति के साक्षात विग्रह श्रीवास पंडित महाप्रभु

श्रीवास आंगन धन्य है, जहाँ नाचे गौर निताई। भक्ति शक्ति परकट भई, कलिमल दियो नसाई ॥
श्रीधाम वृंदावन
गौड़ीय वैष्णव धर्म के इतिहास में पंचतत्व का स्थान सर्वोपरि है। "पंचतत्वात्मकं कृष्णं भक्त-रूप-स्वरूपकम्" के सिद्धांत के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए, और उनके साथ उनके पांच विशिष्ट स्वरूप भी प्रकट हुए। इन पंचतत्वों में श्री श्रीवास पंडित 'भक्त' शक्ति के प्रतीक हैं। वे शुद्ध भक्ति और अनन्य शरणागति के साक्षात विग्रह हैं। श्री चैतन्य चरितामृत (आदि लीला 1.14) में कहा गया है:
पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं भक्त-रूप-स्वरूपकम्। भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्त-शक्तिकम्॥
यहाँ 'भक्त-शक्ति' के रूप में श्रीवास पंडित जी की वंदना की गई है। श्री चैतन्य महाप्रभु की संकीर्तन लीला का केंद्र श्रीवास आंगन ही था, जहाँ से हरिनाम संकीर्तन की उस धारा का प्रवाह हुआ जिसने संपूर्ण विश्व को प्लावित कर दिया।
श्रीवास पंडित का प्रकटीकरण और पारिवारिक पृष्ठभूमि
श्रीवास पंडित का प्राकट्य बंगाल के श्रीहट्ट (वर्तमान सिलहट, बांग्लादेश) जिले में हुआ था। बाद में वे अपने परिवार के साथ श्रीधाम नवद्वीप (नदिया) में आकर बस गए।
वंश परिचय: उनके पिता का नाम श्री जलधर पंडित था। श्रीवास पंडित के कुल पांच भाई थे: श्रीवास, श्रीराम, श्रीनिधि, श्रीपति और श्रीकांत। ये पांचों भाई परम वैष्णव थे और सदैव कृष्ण कथा में निमग्न रहते थे।
शास्त्रों का संदर्भ: श्री गौरांग-गणोद्देश-दीपिका (पद संख्या 90) के अनुसार, श्रीवास पंडित द्वापर युग के नारद मुनि के अवतार हैं। जिस प्रकार नारद जी सर्वत्र भक्ति का प्रचार करते हैं और भगवान के प्रिय पार्षद हैं, उसी प्रकार श्रीवास पंडित ने गौर लीला में भक्ति-शक्ति का प्रतिनिधित्व किया।
श्रीवास पंडित की पत्नी का नाम मालिनी देवी था, जो साक्षात अंबिका (सच्ची माता की सखी) का स्वरूप मानी जाती हैं। उन्होंने महाप्रभु को वात्सल्य भाव से स्नेह दिया।
महाप्रभु के आगमन से पूर्व की स्थिति और प्रार्थना
श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रकट होने से पूर्व, नवद्वीप का वातावरण भौतिकतावाद और शुष्क तर्कवाद से भरा हुआ था। लोग धर्म के नाम पर केवल उत्सव मनाते थे, लेकिन वास्तविक कृष्ण भक्ति का अभाव था। श्रीवास पंडित और श्री अद्वैत आचार्य इस स्थिति को देखकर अत्यंत दुखी रहते थे। भक्तों की व्याकुलता: श्रीवास पंडित अपने भाइयों के साथ गंगा किनारे एकत्र होकर ऊंचे स्वर में कीर्तन करते और भगवान से अवतार लेने की प्रार्थना करते थे।
श्री चैतन्य भागवत (आदि खंड) में वर्णित है कि श्रीवास पंडित रात-रात भर जागकर भगवान का नाम लेते थे, जिससे पड़ोसी (जो अभक्त थे) चिढ़ जाते थे। वे कहते थे, "यह श्रीवास इतना शोर क्यों मचाता है? राजा को पता चलेगा तो दंड मिलेगा।" परंतु श्रीवास जी निर्भय होकर केवल कृष्ण की सेवा में लगे रहे।
श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलन और शरणागति
जब निमाई (महाप्रभु) गया से लौटकर आए और उनमें कृष्ण-प्रेम के लक्षण प्रकट हुए, तब सबसे पहले उन्होंने श्रीवास पंडित के प्रति ही अपना आंतरिक भाव व्यक्त किया।
एक दिन श्रीवास पंडित मार्ग में निमाई से मिले। निमाई ने उन्हें प्रणाम किया। श्रीवास जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा, "निमाई, तुम विद्वान तो हो, पर कृष्ण भक्ति कब करोगे? विद्या का फल तो कृष्ण की सेवा है।" निमाई ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, "आप जैसे भक्तों की कृपा होगी तो अवश्य ही वह दिन आएगा।"
महाप्रभु का प्रकाश: चैतन्य भागवत के अनुसार, महाप्रभु ने सबसे पहले श्रीवास पंडित के घर में ही अपना 'ईश्वर भाव' प्रकट किया था। उन्होंने श्रीवास जी से कहा, "श्रीवास! तुमने जो पुकारा, उसी के कारण मैं बैकुंठ छोड़कर यहाँ आया हूँ।"
श्रीवास आंगन: संकीर्तन आंदोलन का जन्मस्थान
श्रीवास पंडित का घर, जिसे 'श्रीवास आंगन' कहा जाता है, गौर-लीला का हृदय स्थल है। महाप्रभु ने यहाँ लगातार एक वर्ष तक रात्रि संकीर्तन किया।
लीला का स्वरूप: संकीर्तन के समय द्वार बंद कर दिए जाते थे। केवल अंतरंग भक्तों (अद्वैत आचार्य, नित्यानंद प्रभु, गदाधर पंडित आदि) को ही प्रवेश की अनुमति थी।
महाप्रभु का अभिषेक: इसी आंगन में महाप्रभु का 'अभिषेक' हुआ था, जिसे "महा-प्रकाश लीला" कहा जाता है। श्रीवास पंडित ने वेदोक्त मंत्रों से महाप्रभु की पूजा की थी।
श्रीवास आंगन धन्य है, जहाँ नाचे गौर निताई। भक्ति शक्ति परकट भई, कलिमल दियो नसाई ॥
श्रीवास पंडित की निष्ठा: श्रीवास पंडित के जीवन की सबसे मार्मिक और उनकी परा-निष्ठा को दर्शाने वाली घटना उनके पुत्र की मृत्यु है। एक रात्रि जब श्रीवास आंगन में महाप्रभु कीर्तन कर रहे थे, तभी श्रीवास जी के इकलौते पुत्र का देहांत हो गया। घर के अंदर स्त्रियाँ विलाप करने लगीं। श्रीवास पंडित ने तुरंत अंदर जाकर सबको शांत किया और कहा, "यदि तुम्हारे रोने से महाप्रभु के नृत्य और कीर्तन में बाधा पड़ी, तो मैं इसी क्षण गंगा में कूदकर अपनी जान दे दूँगा।"
उन्होंने मृत बालक को एक तरफ लिटा दिया और वापस आकर महाप्रभु के साथ नृत्य करने लगे। अंतर्यामी महाप्रभु ने सब जान लिया और पूछा, "आज कीर्तन में वैसा आनंद क्यों नहीं आ रहा? क्या श्रीवास के घर कुछ अनिष्ट हुआ है?" जब महाप्रभु को पता चला, तो उन्होंने मृत बालक के पास जाकर कहा, "हे बालक! तुम इस घर को छोड़कर क्यों जा रहे हो?" तब भगवान की कृपा से वह मृत बालक जीवित होकर बोला, "प्रभु, मेरा इस जन्म का निर्धारित समय समाप्त हो गया है।
अब मैं आपकी आज्ञा से नए गंतव्य की ओर जा रहा हूँ। इसमें किसी का दोष नहीं है।" यह सुनकर सबका शोक समाप्त हो गया और श्रीवास पंडित महाप्रभु के चरणों में गिर पड़े। इस लीला का विस्तृत वर्णन श्री चैतन्य भागवत (मध्य खंड) और चैतन्य चरितामृत में मिलता है।
श्रीवास पंडित का पूर्ण अवतार स्वरूप
गौड़ीय वैष्णव दर्शन के अनुसार, श्रीवास पंडित साक्षात नारद मुनि हैं। जिस प्रकार नारद जी भगवान नारायण के मन के अवतार माने जाते हैं और वे सर्वदा वीणा पर 'नारायण-नारायण' का गान करते हैं, उसी प्रकार श्रीवास पंडित महाप्रभु के 'मन' के समान थे।
पंचतत्व में स्थिति:
श्री चैतन्य महाप्रभु: स्वयं कृष्ण (भक्त रूप)
श्री नित्यानंद प्रभु: स्वयं बलराम (भक्त स्वरूप)
श्री अद्वैत आचार्य: महाविष्णु/सदाशिव (भक्तावतार)
श्री गदाधर पंडित: श्री राधा रानी (भक्त आख्या)
श्री श्रीवास पंडित: नारद मुनि (भक्त शक्ति)
श्रीवास पंडित उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो जीव को भगवान के साथ जोड़ती है। उनके बिना महाप्रभु की संकीर्तन लीला अधूरी है
जीवन की अंतिम लीलाएँ और पुरी प्रस्थान
जब महाप्रभु ने संन्यास ले लिया और पुरी (जगन्नाथ पुरी) चले गए, तो श्रीवास पंडित विरह में व्याकुल हो गए। वे नवद्वीप छोड़कर कुमारहट्ट (हालिसहर) में रहने लगे। वे हर वर्ष रथयात्रा के समय अपने भाइयों के साथ पुरी जाते थे।
रथयात्रा लीला: रथयात्रा के दौरान महाप्रभु सात संकीर्तन मंडलियाँ बनाते थे। इनमें से एक मंडली का नेतृत्व श्रीवास पंडित करते थे। चैतन्य चरितामृत (मध्य लीला 13.38) में उल्लेख है कि महाप्रभु श्रीवास के प्रेम के वशीभूत होकर उनके समूह में नृत्य करते थे।
प्रमाणित मंत्र और स्तुति
श्रीवास पंडित की आराधना के बिना चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त करना असंभव माना जाता है। संकीर्तन से पूर्व 'पंचतत्व मंत्र' का उच्चारण अनिवार्य है:
"जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानंद,
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर भक्तवृंद"
यहाँ "श्रीवासादि" शब्द का अर्थ है "श्रीवास पंडित और अन्य सभी भक्त"। यह दर्शाता है कि समस्त भक्तों के प्रतिनिधि के रूप में श्रीवास पंडित जी का नाम अग्रणी है।
श्रीवास पंडित का जीवन हमें सिखाता है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण कैसे संभव है। उन्होंने सिद्ध किया कि विपत्ति के समय भी विचलित न होकर केवल कृष्ण की सेवा को प्राथमिकता देना ही वास्तविक भक्ति है। वे संकीर्तन यज्ञ के पुरोहित हैं।
ग्रंथ संदर्भ सूची (References)
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी) - आदि, मध्य एवं अंत्य लीला।
श्री चैतन्य भागवत (वृंदावन दास ठाकुर)।
श्री गौरांग-गणोद्देश-दीपिका (कवि कर्णपुर)।
भक्ति रत्नाकर (नरहरि चक्रवर्ती)।
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