श्री चैतन्य चरितामृत प्रकाट्य विशेष लेख : प्राकट्य की मंगल बधाई

उस समय कृष्णदास कविराज गोस्वामी अत्यंत वृद्ध थे (लगभग 80-90 वर्ष) और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। किंतु, वैष्णवों की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए, उन्होंने इस दैवीय कार्य का संकल्प लिया।
'श्री चैतन्य चरितामृत' केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का सबसे महत्वपूर्ण और दार्शनिक ग्रंथ है। इस ग्रंथ की रचना की पृष्ठभूमि, भक्तों का अटूट प्रेम और श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी की अटूट भक्ति की एक अद्भुत गाथा है।
रचना की पृष्ठभूमि और भक्तों की जिज्ञासा
चैतन्य महाप्रभु के तिरोधान (अंतर्ध्यान) के बाद, वृंदावन के भक्तों के मन में उनके अंतिम वर्षों की लीलाओं को जानने की तीव्र जिज्ञासा उत्पन्न हुई। उस समय 'चैतन्य भागवत' (वृंदावन दास ठाकुर द्वारा रचित) मुख्य स्रोत था, जिसमें महाप्रभु की प्रारंभिक लीलाओं का सुंदर वर्णन था, लेकिन उनकी 'अंत्य-लीला' (अंतिम वर्ष) का वर्णन बहुत संक्षिप्त था। भक्तों की इसी अतृप्त जिज्ञासा ने 'चैतन्य चरितामृत' की रचना की नींव रखी।

भक्तों का अनुरोध और गुरु-आज्ञा
वृंदावन के वरिष्ठ वैष्णवों, विशेष रूप से श्री रघुनाथ दास गोस्वामी और श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी ने श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी से प्रार्थना की कि वे महाप्रभु की 'अंत्य-लीला' पर एक विस्तृत ग्रंथ लिखें। उस समय कृष्णदास कविराज गोस्वामी अत्यंत वृद्ध थे (लगभग 80-90 वर्ष) और उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। किंतु, वैष्णवों की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए, उन्होंने इस दैवीय कार्य का संकल्प लिया।

श्री मदन मोहन जी की दिव्य अनुमति
किसी भी महान कार्य को प्रारंभ करने से पहले ईश्वरीय अनुमति आवश्यक है। कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने वृंदावन के प्रसिद्ध मदन मोहन जी के मंदिर जाकर प्रार्थना की। उन्होंने संकोचवश पूछा, "क्या मैं इस महान कार्य के योग्य हूँ? मेरा स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा।" तभी एक चमत्कार हुआ—ठाकुर जी के विग्रह से फूलों की माला स्वतः गिर गई। पुजारियों ने इसे भगवान का आशीर्वाद मानकर उन्हें भेंट किया। भगवान की इस प्रत्यक्ष आज्ञा को पाकर उन्होंने लेखन कार्य प्रारंभ किया।

सूचना के विश्वसनीय स्रोत (References)
इस प्रामाणिक ग्रंथ की रचना के लिए कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने दो मुख्य ऐतिहासिक दस्तावेजों का आधार लिया:
मुरारी गुप्त की 'कड़चा' (Notes): इसमें महाप्रभु की शुरुआती लीलाओं का आंखों देखा विवरण था।
स्वरूप दामोदर गोस्वामी की 'डायरी': स्वरूप दामोदर महाप्रभु के अत्यंत निजी सचिव थे। उनकी डायरी में महाप्रभु के आंतरिक भावों और जगन्नाथ पुरी के अंतिम दिनों का गहन वर्णन था।

ग्रंथ की संरचना
'चैतन्य चरितामृत' को तीन प्रमुख भागों या 'लीलाओं' में विभाजित किया गया है:
आदि-लीला: इसमें महाप्रभु के जन्म से लेकर संन्यास लेने तक की घटनाएं, दार्शनिक सिद्धांत और पंच-तत्व का वर्णन है।
मध्य-लीला: इसमें संन्यास ग्रहण, भारत भ्रमण, दक्षिण यात्रा और रूप-सनातन गोस्वामी को दी गई शिक्षाओं का विस्तार है।
अंत्य-लीला: यह भाग जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु के अंतिम 18 वर्षों पर केंद्रित है, जहाँ वे 'राधा-भाव' और दिव्य उन्माद में डूबे रहते थे।

इस प्रकार, भक्तों के अनुरोध, भगवान की आज्ञा और प्रामाणिक स्रोतों के संगम से 'चैतन्य चरितामृत' जैसा दिव्य ग्रंथ हमें प्राप्त हुआ। यह ग्रंथ आज भी करोड़ों भक्तों के लिए आध्यात्मिक प्रकाश स्तंभ के रूप में कार्य कर रहा है, जो महाप्रभु की संपूर्ण और गहन लीलाओं का प्रामाणिक ज्ञान प्रदान करता है।
