प्राणाधार बाबा श्री श्याम दास जी महाराज (संकेत वट, बरसाना) – भाग 1

कोट-पेंट, हाथ में बंधी कीमती घड़ी और अपनी सामाजिक वेशभूषा में ही वे तत्काल वृंदावन की ओर दौड़ पड़े। वृंदावन पहुँचकर उन्होंने अपनी पुरानी पहचान को त्याग दिया और धोती-माला
संकेत वट, बरसाना
भाग - 1
श्री श्याम दास जी महाराज के जीवन का पूर्वार्ध भौतिक जगत की व्यस्तताओं के बीच बीता। संन्यास ग्रहण करने से पूर्व वे एक प्रतिष्ठित दवाइयों के व्यापारी थे। व्यवसाय की व्यस्तता के बावजूद, उनके अंतर्मन में एक तड़प बनी रहती थी। और फिर एक दिन ठाकुर जी की प्रेरणा से उन्होंने संसार की माया को त्याग कर अपना सर्वस्व श्री राधा-कृष्ण के चरणों में अर्पित कर दिया और ब्रज धाम ने उन्हें अपना बना लिया। आज वे मध्वगौड़ीय संप्रदाय के अंतर्गत जीव गोस्वामी परिकर के एक निष्ठावान साधक के रूप में श्री राधा संकेत बिहारी जी की सेवा कर रहे हैं।
जब पत्थरों में दिखने लगे प्राणवल्लभ
वैराग्य का मार्ग कभी-कभी इतना आकस्मिक और तीव्र होता है कि संसार की चकाचौंध एक पल में फीकी पड़ जाती है। श्री श्याम दास जी महाराज के जीवन में भी यह परिवर्तन किसी दिव्य लीला से कम नहीं था। एक सफल दवा व्यापारी, जो हरिद्वार की पावन धरा पर केवल भ्रमण के उद्देश्य से गए थे, वहां श्रीमद्भागवत कथा के अमृत वचनों ने उनके हृदय के द्वार खोल दिए। कथा के प्रभाव से महाराज जी की चेतना में ठाकुर जी ऐसे बसे कि उनकी दृष्टि ही बदल गई।
अब वे घर से दफ्तर के लिए निकलते तो थे, लेकिन उनका मन कन्हैया की तलाश में रहता था। मार्ग में पड़ा हर पत्थर उन्हें साधारण पाषाण नहीं, बल्कि साक्षात् शालिग्राम और ठाकुर जी का स्वरूप नजर आने लगा। वे बड़े भाव से उन पत्थरों को घर लाने लगे। धीरे-धीरे उनके घर में 'ठाकुरों' (पत्थरों) का एक विशाल संग्रह हो गया। लोग चकित थे, पर महाराज जी तो उस अलौकिक प्रेम में मग्न थे जहाँ जड़ और चेतन का भेद मिट चुका था।
गुरु ही गोविंद से मिलाएंगे
इसी बीच एक पथप्रदर्शक ने उनके भीतर की तड़प को पहचान कर कहा— "असली ठाकुर जी तो वृंदावन में विराजते हैं, आपको वहीं जाना चाहिए।" यह सुनते ही जैसे महाराज जी के प्राणों को दिशा मिल गई। उन्होंने न पीछे मुड़कर देखा, न भविष्य की चिंता की। कोट-पेंट, हाथ में बंधी कीमती घड़ी और अपनी सामाजिक वेशभूषा में ही वे तत्काल वृंदावन की ओर दौड़ पड़े।
वृंदावन पहुँचकर उन्होंने अपनी पुरानी पहचान को त्याग दिया और धोती-माला धारण कर जुगल घाट के किनारे आसन जमा लिया। कई दिनों तक निराहार रहकर, भूख-प्यास से बेखबर वे केवल भजन में डूबे रहे। उनकी इसी तड़प के बीच एक वृद्ध बाबा वहां से गुजरे और उन्होंने वह गूढ़ रहस्य बताया जो भक्ति का आधार है:
"बिना गुरु के भजन, साधन और व्रत सब व्यर्थ हैं। श्याम दास, गुरु खोजो... वही तुम्हें गोविंद से मिलाएंगे।"
इन शब्दों ने महाराज जी को गुरु-शरण की महत्ता समझाई।
ठाकुर जी की कठिन परीक्षा और एक रहस्यमयी लूट
वृंदावन की गलियों में गुरु की खोज में निकले श्याम दास जी महाराज के धैर्य की परीक्षा अभी शेष थी। गुरु प्राप्ति की व्याकुलता में वे दर-दर भटक रहे थे, तभी नियति ने एक अत्यंत कठिन और खौफनाक लीला रची। एक कपटी व्यक्ति, जिसकी पैनी दृष्टि महाराज जी के पास मौजूद सूटकेस और कीमती घड़ी पर थी, उन्हें "असली गुरु से मिलवाने" का झांसा देकर वृंदावन से दूर एक निर्जन, भयानक जंगल की ओर ले गया।
वहां पहुँचकर उस व्यक्ति ने अपनी असलियत दिखाई और चाकू की नोक पर महाराज जी का सब कुछ लूट लिया। वह क्षण उनके लिए न केवल सर्वस्व खोने का था, बल्कि प्राणों के संकट का भी था। लेकिन, तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने महाराज जी के जीवन को पूरी तरह पलट कर रख दिया। क्या उस निर्जन जंगल में महाराज जी के प्राण कैसे बच पाए? सब कुछ खो देने के बाद उन्हें गुरु कैसे मिले, उनका आध्यात्मिक जीवन कैसे आगे बढ़ा?
जानने के लिए अवश्य पढ़ें इस लेख का दूसरा और अंतिम भाग।
प्राणाधार बाबा श्री श्याम दास जी महाराज – भाग 2 (गुरु मिलन और साधना) [भाग 1 से आगे...]
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