वैराग्य के शिखर पुरुष श्री रघुनाथ दास गोस्वामी: करोड़ों की संपदा त्याग सड़े चांवल खानें वाले महासंत

वृंदावन के 'छह गोस्वामियों' में से एक रघुनाथ दास जी ने सिद्ध किया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए महलों का सुख और करोड़ों की दौलत भी तुच्छ है। वे सप्तग्राम के जमींदार के इकलौते वारिस थे
वृंदावन
भारतीय भक्ति परंपरा में त्याग और वैराग्य की जब भी चर्चा होती है, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का नाम सबसे ऊपर आता है। वृंदावन के 'छह गोस्वामियों' में से एक रघुनाथ दास जी ने सिद्ध किया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए महलों का सुख और करोड़ों की दौलत भी तुच्छ है। वे सप्तग्राम के जमींदार के इकलौते वारिस थे, जिनके पास उस समय लाखों की वार्षिक आय थी, लेकिन उन्होंने चैतन्य महाप्रभु के चरणों में अपना जीवन समर्पित करने के लिए सब कुछ त्याग दिया। उन्हें गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय में 'प्रयोजन आचार्य' और 'वैराग्य का अवतार' माना जाता है।
जन्म और ऐश्वर्यपूर्ण प्रारंभिक जीवन
श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का जन्म 1494 ई. (लगभग) में पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के 'सप्तग्राम' में हुआ था। उनके पिता का नाम गोवर्धन मजूमदार और चाचा का नाम हिरण्य मजूमदार था। वे उस समय के बहुत बड़े जमींदार थे और उनकी वार्षिक आय लगभग 12 लाख स्वर्ण मुद्राएँ थी। वे अपने परिवार के इकलौते वारिस थे। उनके पास दुनिया के तमाम सुख-सुविधाएँ मौजूद थीं। उनके वैराग्य को रोकने के लिए उनके परिवार ने उनका विवाह एक अप्सरा जैसी सुंदर कन्या से कर दिया था, ताकि वे घर-परिवार में उलझे रहें।
चैतन्य महाप्रभु से प्रथम मिलन और 'मर्कट वैराग्य' की शिक्षा : जब चैतन्य महाप्रभु शांतिपुर आए, तब किशोर रघुनाथ ने उनसे भेंट की। रघुनाथ ने तुरंत घर त्यागने की इच्छा जताई, लेकिन महाप्रभु ने उन्हें एक बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दी:
"स्थिर ह्ञा घरे जाओ, ना हवा वातुल। क्रमे-क्रमे पाय लोक भव-सिंधु-कूल।"
(अर्थात: स्थिर होकर घर जाओ, पागल मत बनो। धीरे-धीरे ही जीव भव-सागर को पार करता है।) महाप्रभु ने उन्हें 'मर्कट वैराग्य' (बंदर जैसा दिखावटी वैराग्य) न करने और भीतर से विरक्त रहते हुए बाहर से सामाजिक कर्तव्यों को निभाने की सलाह दी। रघुनाथ ने कई वर्षों तक घर पर रहकर इस आज्ञा का पालन किया।
दही-चिउड़ा महोत्सव (पानीहाटी लीला)
रघुनाथ दास जी बार-बार घर से भागने का प्रयास करते, लेकिन उनके पिता के पहरेदार उन्हें पकड़ लेते। अंततः उन्हें नित्यानंद प्रभु के दर्शन पानीहाटी (गंगा तट) पर हुए। नित्यानंद प्रभु ने उन्हें 'दंड' दिया कि वे वहां उपस्थित सभी भक्तों को 'दही और चिउड़ा' का भोजन कराएं। महोत्सव: रघुनाथ ने बड़े उत्साह से यह आयोजन किया। इस सेवा से प्रसन्न होकर नित्यानंद प्रभु ने उनके सिर पर अपने चरण रखे और आशीर्वाद दिया कि अब चैतन्य महाप्रभु उन्हें अपनी शरण में ले लेंगे।
जगन्नाथ पुरी की ओर पलायन और 'कठोर साधना'
नित्यानंद प्रभु के आशीर्वाद के बाद, रघुनाथ दास जी एक रात गुप्त रूप से घर से निकल भागे। वे पहरेदारों को चकमा देकर घने जंगलों के रास्ते 12 दिनों तक पैदल चलकर जगन्नाथ पुरी पहुँचे।
स्वरूप दामोदर की शरण: महाप्रभु ने उन्हें अपने निजी सचिव स्वरूप दामोदर को सौंप दिया, इसलिए उन्हें 'स्वरूपेर रघु' भी कहा जाता है।
भोजन का त्याग: पुरी में उनकी वैराग्य साधना चरम पर थी। पहले वे मंदिर के द्वार पर खड़े होकर भिक्षा माँगते थे। फिर उन्होंने सोचा कि यह वेश्यावृत्ति जैसा है। बाद में वे जगन्नाथ मंदिर के उस सड़े हुए भात (चावल) को खाकर रहने लगे, जिसे गायें भी नहीं खाती थीं।
महाप्रभु की प्रसन्नता: जब चैतन्य महाप्रभु को उनके इस त्याग का पता चला, तो उन्होंने स्वयं वह सड़ा हुआ चावल चखा और कहा, "यह तो साक्षात अमृत है!"
वृंदावन आगमन और 'राधा कुंड' का निवास
महाप्रभु के अंतर्धान होने के बाद, रघुनाथ दास जी वियोग में प्राण त्यागने के उद्देश्य से वृंदावन आए। लेकिन यहाँ रूप और सनातन गोस्वामी ने उन्हें संभाला और महाप्रभु की आज्ञा अनुसार उन्हें जीवित रहकर भक्ति का प्रचार करने को कहा।
राधा कुंड का उद्धार: उन्होंने अपना शेष जीवन गोवर्धन की तलहटी में स्थित 'राधा कुंड' के किनारे व्यतीत किया। उन्होंने ही इस पावन कुंड का जीर्णोद्धार करवाया।
साधना पद्धति: वे प्रतिदिन 1000 बार दंडवत प्रणाम करते थे, 3 घंटे तक कृष्ण कथा कहते थे और बहुत कम छाछ पीकर जीवित रहते थे।
साहित्यिक रचनाएँ: प्रेम का सागर
यद्यपि वे वैराग्य की मूर्ति थे, लेकिन उनके हृदय में राधा-कृष्ण के लिए प्रेम उमड़ता रहता था। उन्होंने संस्कृत में अत्यंत भावपूर्ण ग्रंथों की रचना की:
स्तव-पुष्पांजलि: श्री राधा-कृष्ण की स्तुतियों का सुंदर संकलन।
मुक्ता-चरित: कृष्ण की एक अद्भुत लीला का वर्णन।
विलास कुसुमांजलि: श्री राधा जी की सेवा के प्रति उनकी तीव्र लालसा का चित्रण।
मन: शिक्षा: साधकों के लिए मन को वश में करने के 12 महत्वपूर्ण उपदेश।
वैराग्य की पराकाष्ठा और अंतिम समय
रघुनाथ दास गोस्वामी ने वृंदावन में लगभग 40-50 वर्ष व्यतीत किए। उनके वैराग्य की स्थिति यह थी कि वे बाहरी जगत से पूरी तरह कट चुके थे। वे निरंतर 'राधा नाम' का जप करते थे।
देहावसान: 1571 ई. (आश्विन शुक्ल द्वादशी) को उन्होंने राधा कुंड के तट पर अपनी भौतिक देह का त्याग किया।
समाधि स्थल: उनकी समाधि आज भी राधा कुंड के किनारे स्थित है, जहाँ भक्त और साधु उनकी वैराग्यमयी ऊर्जा का अनुभव करने जाते हैं।
शिक्षा और प्रासंगिकता : श्री रघुनाथ दास गोस्वामी का जीवन आज के भौतिकवादी युग के लिए एक बड़ी सीख है। वे सिखाते हैं कि ईश्वर की भक्ति के लिए हृदय का परिवर्तन जरूरी है, केवल बाहरी वेश नहीं। धन और विलासिता आत्मा की प्यास नहीं बुझा सकती।'सादा जीवन, उच्च विचार' ही वास्तविक शांति का मार्ग है।
नोट :- यह आर्टिकल निम्नलिखित ग्रंथों के आधार पर लिखा गया है
चैतन्य चरितामृत (अंत्य लीला): कृष्णदास कविराज गोस्वामी।
गौड़ीय वैष्णव इतिहास: श्री भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर की व्याख्याएँ।
भक्ति रत्नाकर: नरहरि चक्रवर्ती।
श्री रघुनाथ दास गोस्वामी की जीवनी: राधा कुंड के प्राचीन अभिलेखों के आधार पर लिखा गया है।
