श्री राधा संकेत बिहारी जी मन्दिर का इतिहास एवं जीवंत परंपराएं

"संकेतये कल्पतरु प्रसूने, राधा मुकुन्दो मिलतो यत्र।"
अर्थात्, जहाँ कल्पवृक्षों की छांव में राधा और मुकुंद का गुप्त मिलन और रास संपन्न हुआ, वही संकेत भूमि है।
ब्रजमंडल\संकेत ग्राम
ब्रजमंडल की पावन भूमि केवल भूगोल का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह अनंत आध्यात्मिक चेतना, दिव्य लीलाओं और परात्पर प्रेम का एक जीवंत विग्रह है। मथुरा-वृंदावन के विशाल सांस्कृतिक परिदृश्य में बरसाना और नंदगांव के मध्य स्थित ‘संकेत ग्राम’ और वहां प्रतिष्ठित ‘श्री राधा संकेत बिहारी जी मंदिर’ { गौड़ीय } एक ऐसा परम पावन केंद्र है, जिसकी महिमा सुने बिना ब्रज यात्रा अधूरी मानी जाती है।
यह वह गोपन (रहस्यमयी) स्थल है, जहां द्वापर युग में जगतजननी राधारानी और अखिल ब्रह्मांड नायक श्रीकृष्ण का प्रथम गुप्त मिलन हुआ था। ‘संकेत’ शब्द का शाब्दिक अर्थ ही है— इशारा, indication। आज जब भौतिकता की चकाचौंध में मानव मन शांति की तलाश कर रहा है, तब संकेत ग्राम की कुंज-गलियां, प्राचीन सरोवर और संकेत बिहारी जी का यह विग्रह दिव्य शांति और निश्छल भक्ति का साक्षात् संदेश दे रहे हैं। आइए, इस पावन धाम के इतिहास, स्थापत्य, आध्यात्मिक महत्व और वर्तमान स्वरूप का एक विस्तृत व प्रामाणिक अन्वेषण करें:
भौगोलिक एवं ऐतिहासिक संकेत ग्राम
संकेत ग्राम उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित राधा-रानी की रंगीली भूमि 'बरसाना' और कान्हा की नगरी 'नंदगांव' के बिल्कुल मध्य में स्थित है। भौगोलिक दृष्टि से यह दोनों प्रमुख कस्बों से लगभग ५-५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक शांत, ग्रामीण और वृक्षों से आच्छादित क्षेत्र है। पुराणों और ब्रज के प्राचीन ग्रंथों (जैसे पद्म पुराण, गर्ग संहिता और ब्रज भक्ति विलास) के अनुसार
जब भगवान श्रीकृष्ण नंदगांव में और श्री राधारानी बरसाना (रावल से आने के बाद) में निवास कर रही थीं, तब किशोर अवस्था में दोनों के परिजनों की सामाजिक मर्यादाएं अत्यधिक कठोर थीं। ऐसे में दोनों दिव्य विभूतियों के मिलन के लिए एक मध्यवर्ती स्थान चुना गया, जिसे स्वयं ललिता, विशाखा और वृन्दा देवी ने तैयार किया था।
संकेत का अर्थ 'रसराज' और 'महाभाव' का मिलन बिंदु
श्री कृष्ण और श्री राधा जी की सखियों द्वारा से इस स्थल पर एक दिव्य योजना बनाई गई। कृष्ण गायें चराते हुए (गोचारण लीला) इस वन में आते और राधा जी अपनी सखियों के साथ फूल चुनने के बहाने यहाँ पहुँचतीं। इसी स्थान पर पहली बार वृंदा देवी ने अपनी संकेत यानी इशारे की लीला के द्वारा पहली बार जगतजननी राधारानी और अखिल ब्रह्मांड नायक श्रीकृष्ण का प्रथम गुप्त कराया। इसलिए इस गांव का नाम संकेत ग्राम वी ठाकुर जी का नाम संकेत बिहारी जी विख्यात हुआ।
"संकेतये कल्पतरु प्रसूने, राधा मुकुन्दो मिलतो यत्र।"
अर्थात्, जहाँ कल्पवृक्षों की छांव में राधा और मुकुंद का गुप्त मिलन और रास संपन्न हुआ, वही संकेत भूमि है।
यहाँ की सखियाँ, विशेषकर *वृन्दा देवी* (तुलसी जी), दोनों के बैठने के लिए कुंज सजाती थीं। इसी स्थान पर दोनों ने एक-दूसरे को निहारा और ब्रज की मधुरा भक्ति की नींव पड़ी। इसलिए इसे 'राधा-कृष्ण की नित्य मिलन स्थली' के रूप में पूजा जाता है।
संकेत देवी व लग्न सगाई चबूतरा
जिन्होंने राधा कृष्ण के मिलन में आने वाली सामाजिक बढ़ाओ को दूर किया वह माता आज भी संकेत गांव में संकेत गांव की अधिष्ठात्री देवी बनाकर विराजमान है इन्हें योगमाया माता, कात्यायनी माता और मनोकामना पूर्ति माता के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि एक बार यशोदा मैया ने यहां पर आकर श्री राधा और कृष्ण के विवाह की मनोकामना पूर्ति माता से मन्नत मांगी लेकिन भगवान कृष्ण और श्री राधा रानी का विवाह लीला में संभव नहीं था।
मनोकामना माता के कहने पर ब्रह्मा जी ने आकर इसी स्थान पर प्रिया प्रीतम का लगन सगाई और विवाह की अन्य रश्मों को पूरा किया। गर्ग संहिता, बृजभक्ति विलास व अन्य कई ऐतिहासिक ग्रंथो में संकेत गांव को लगन सगाई वह भांडीरवन को विवाह स्थान के रूप में दर्ज किया गया है। यहां आज भी शादी के लिए लोग मन्नत मांगते हैं और उनका ऐसा मानना है कि योग माया माता के प्रभाव से विवाह में आ रही रुकावटें समाप्त हो जाती है।
हिडोल व रासमंडल
भगवान कृष्ण की वंशज महाराज वज्रनाभ जी के द्वारा ब्रज के ऐतिहासिक स्थानों को चुनकर पांच हिंडोली (झूला) का निर्माण कराया गया जिसमें से एक संकेत गांव में है। अन्य हिंडोली ऊंचा गांव, कमाई गांव, बरसाना और चिक्सौली में स्थित है।
मंदिर का ऐतिहासिक पुनरुद्धार
यद्यपि यह स्थल द्वापर युग से ही पूजनीय था, लेकिन समय के थपेड़ों और विदेशी आक्रांताओं के दौर में यह वन क्षेत्र उपेक्षित हो गया था। महाप्रभु चैतन्य देव के ब्रज आगमन और उनके शिष्यों (षड गोस्वामी) द्वारा ब्रज के लुप्त तीर्थों की खोज के क्रम में इस स्थान को पुनः चिन्हित किया गया। बाद में, श्री नारायण भट्ट जी (जिन्होंने ब्रज की लीलाओं को पुनर्जीवित किया) और निंबार्क संप्रदाय के संतों ने इस स्थान पर कुटिया बनाकर भजन किया।
वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण और जीर्णोद्धार मध्यकाल के बाद स्थानीय राजाओं और धनाढ्य भक्तों के सहयोग से संपन्न हुआ। इसमें प्रमुख नाम साहब मदन सिंह जी (ठिकाना लोडरी जयपुर) का आता है। मंदिर की बनावट में राजस्थानी और पारंपरिक ब्रज शैली की वास्तुकला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है।
श्री वल्लभाचार्य महाप्रभु, विट्ठलनाथ गोसाई व गोपाल भट्ट गोस्वामी का स्थान
संकेत गांव के भीतर ही विव्हाल कुंड है। जहां पर बैठकर वल्लभाचार्य महाप्रभु ने अपनी 18वीं भागवत कथा का पारण किया था। यह स्थान वल्लभाचार्य महाप्रभु की 18वीं बैठक है। बहुत लंबे समय तक वल्लभाचार्य महाप्रभु के अनन्य भक्त श्री विट्ठलनाथ गोसाई जी ने यहां रहकर भजन किया उनका भजन स्थान भी संकेत देवी मंदिर के पास में बना हुआ है।
विट्ठलनाथ गोसाई जी के भजन स्थान के बिल्कुल सामने छः गोस्वामियों में से एक श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी की भी भजन कुटिया बनी हुई है। संकेत ग्राम बज के प्रमुख वट स्थान में से एक है इसी वट वृक्ष के नीचे जहां प्रिया प्रीतम की नित्य मिलन की लीला होती थी वहीं पर श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी ने लम्बे समय तक भजन किया था।
मौजूदा परम्परा व आचार्य श्री
इस ऐतिहासिक स्थान पर श्रीमद् माध्व गौडिया वैष्णव संप्रदाय के द्वारा सेवा की जाती है। सिद्ध श्री राम कृष्ण दास (पंडित बाबा) के शिष्य व भगवत निवास वृंदावन के संस्थापक महान संत श्री कृपा सिंधु दास बाबा के द्वारा लंबे समय तक यहां पर सेवा की गई। मौजूदा समय में भी उनकी कुल परंपरा से जुड़े लोग सेवा में है। अभी संकेत बिहारी जी मंदिर के मुख्य महंत के तौर पर श्री श्री श्याम दास जी महाराज सेवा में है।
मुख्य पूजारी के रूप श्री अद्वैत दास जी महाराज सेवा में हैं जिनके द्वारा प्रतिदिन ठाकुर जी को ब्रज के पारंपरिक वस्त्र, आभूषण आदि से लगन सगाई के दिन की भांति ही दूल्हा बनाकरक सजाया जाता है। ऋतु के अनुसार चन्दन श्रृंगार, फूल बँगला और शीतकाल में पशमीना के वस्त्र पहनाए जाते हैं।
ब्रज के सभी एतिहासिक एक संस्कृति त्योहारौ के साथ ही गौडिया सम्प्रदाय के सभी उत्सवों को धूम धाम से मनाया जाता।श्री राधा संकेत बिहारी जी मन्दिर का इतिहास एवं जीवंत परंपराएं
