रिद्धि सिद्धि के स्वामी होकर भी त्यागी व भक्तों में श्रेष्ठ है भगवान गणेश

प्रायः देखा जाता है कि जब किसी साधक या संत को सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, तो उसमें अहंकार प्रवेश कर जाता है। परंतु श्री गणेश ....
काशी : सनातन परंपरा में देवताओं, ऋषियों, मुनियों और संतों का एक विस्तृत और दैवीय इतिहास रहा है। जब भी भक्ति, ज्ञान, त्याग और साधना की चर्चा होती है, तो हमारे मस्तिष्क में महान भक्तों और संतों के नाम उभरते हैं। परंतु यदि सूक्ष्मता और आध्यात्मिक गहराई से विचार किया जाए, तो एक ऐसा चरित सामने आता है जो ज्ञान के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान होने के बाद भी निष्काम भक्ति और सेवा का सबसे अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। वे हैं—प्रथमोपास्य श्री गणेश।
गणेश केवल विघ्नहर्ता, बुद्धिदाता या मंगलमूर्ति ही नहीं हैं, बल्कि उनका संपूर्ण जीवन, उनकी हर एक लीला और उनकी प्रत्येक चेष्टा उन्हें समस्त भक्तों और संतों में शिरोमणि सिद्ध करती है। आज जहाँ संसार ज्ञान के अहंकार में डूबकर भक्ति मार्ग से भटक जाता है, वहीं श्री गणेश अपनी अद्वितीय पितृ-मातृ भक्ति, आज्ञाकारिता और पूर्ण समर्पण से यह संदेश देते हैं कि "सच्चा ज्ञान वही है जो भक्ति में परिवर्तित हो जाए।"
पितृ-मातृ भक्ति: जब परिक्रमा से जीता त्रिलोक
श्री गणेश के 'भक्त-शिरोमणि' होने का सबसे पहला और अकाट्य प्रमाण उनकी माता-पिता के प्रति अनन्य भक्ति है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवताओं के बीच यह प्रश्न उठा कि पृथ्वी पर सबसे पहले किसकी पूजा होनी चाहिए? इस समस्या के समाधान हेतु देवऋषि नारद ने एक प्रतियोगिता का प्रस्ताव रखा—"जो भी सर्वप्रथम संपूर्ण ब्रह्मांड की परिक्रमा करके आएगा, वही सर्वपूज्य माना जाएगा।"
समस्त देवता अपने-अपने तीव्रगामी वाहनों पर सवार होकर ब्रह्मांड की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। कार्तिकेय जी अपने मयूर पर सवार होकर तीव्र गति से उड़ चले। परंतु श्री गणेश, जिनका वाहन एक छोटा सा मूषक है, शांत भाव से चिंतन करने लगे। उन्होंने अपनी बुद्धि और भक्ति का आश्रय लिया।
गणेश जी ने अपने माता-पिता—भगवान शिव और जगदम्बा पार्वती—को एक स्थान पर बैठाया और अत्यंत श्रद्धा के साथ उनकी सात बार परिक्रमा की। जब उनसे इसका कारण पूछा गया, तो उन्होंने सहजता से कहा:
"माता और पिता के चरणों में ही संपूर्ण ब्रह्मांड समाहित है। माता जगज्जननी हैं और पिता देवाधिदेव। इनकी परिक्रमा कर लेने से अनंत कोटि ब्रह्मांडों की परिक्रमा स्वयं हो जाती है।
गणेश जी का यह उत्तर न केवल उनकी कुशाग्र बुद्धि का परिचायक था, बल्कि यह भक्ति की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ बाहरी ढोंग और दौड़-भाग समाप्त हो जाती है और केवल हृदय का भाव ही शेष रहता है। इस एक घटना ने सिद्ध कर दिया कि किसी भी संत या भक्त की साधना तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक उसमें अपने जन्मदाताओं और ईश्वर के प्रति ऐसा निष्छल भाव न हो।
त्याग और समर्पण: मस्तक कटने पर भी आज्ञा भंग नहीं
भक्ति का वास्तविक परीक्षण संकट की घड़ी में होता है। संत वही है जो अपने इष्ट या स्वामी की आज्ञा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दे। श्री गणेश का प्राकट्य ही निष्काम सेवा और आज्ञापालन के लिए हुआ था। जब माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की रचना की और उसे द्वारपाल नियुक्त करते हुए आदेश दिया कि "मेरी अनुमति के बिना कोई भी अंदर प्रवेश न करे", तब गणेश जी ने उस आदेश को अपने जीवन का अंतिम सत्य मान लिया
जब स्वयं देवाधिदेव महादेव वहाँ पहुंचे, तो गणेश जी ने उन्हें भी रोक दिया। महादेव के गणों, देवताओं और स्वयं शिवजी के समझाने पर भी गणेश जी अपने कर्तव्य से तनिक भी नहीं डिगे। वे जानते थे कि सामने साक्षात कालस्वरूप भगवान शिव खड़े हैं, परंतु माता की आज्ञा का उल्लंघन उनके लिए असम्भव था। अंततः युद्ध हुआ और श्री गणेश का मस्तक धड़ से अलग हो गया।
विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या कोई साधारण भक्त या संत अपने इष्ट की आज्ञा के लिए इस सीमा तक त्याग कर सकता है? श्री गणेश ने यह सिद्ध किया कि सच्चा भक्त वह है जो अपने अस्तित्व को मिटा दे, लेकिन अपने स्वामी के प्रति निष्ठा और धर्म का त्याग न करे। उनका यह त्याग उन्हें समस्त संतों की श्रेणी में सबसे ऊपर स्थापित करता है।
महाभारत लेखन: अखंड साधना और अहम् का विसर्जन
भक्ति मार्ग में संत का एक प्रमुख लक्षण 'निरंतरता' और 'अहंकार शून्यता' होता है। गणेश जी का एकदंत रूप इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जब महर्षि वेदव्यास ने 'महाभारत' जैसे महाकाव्य की रचना का संकल्प लिया, तो उन्हें एक ऐसे लेखक की आवश्यकता थी जो बिना रुके, बिना थके और बिना किसी त्रुटि के उनके श्लोकों को लिपिबद्ध कर सके। यह कार्य केवल गणेश जी ही कर सकते थे। गणेश जी ने शर्त रखी कि व्यास जी को बिना रुके बोलना होगा, और व्यास जी ने शर्त रखी कि गणेश जी को बिना समझे कुछ नहीं लिखना होगा।
लेखन कार्य प्रारंभ हुआ। व्यास जी बोलते गए और गणेश जी लिखते गए। लिखते-लिखते अचानक गणेश जी की लेखनी (कलम) टूट गई। नियम के अनुसार कार्य रुकना नहीं चाहिए था। ऐसे में श्री गणेश ने बिना एक क्षण गंवाए, अपने दिव्य रूप का अहंकार त्याग कर, अपना एक दांत (गजदंत) स्वयं तोड़ लिया और उसे स्याही में डुबोकर लिखना जारी रखा।
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी होकर भी परम वैरागी
प्रायः देखा जाता है कि जब किसी साधक या संत को सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं, तो उसमें अहंकार प्रवेश कर जाता है। परंतु श्री गणेश अष्ट सिद्धियों और नव निधियों के स्वामी हैं। रिद्धि (समृद्धि) और सिद्धि (आध्यात्मिक शक्ति) उनकी पत्नियाँ हैं, और शुभ-लाभ उनके पुत्र हैं। इसके बावजूद, गणेश जी का स्वरूप अत्यंत सरल और निस्पृह है। वे मूषक (चूहे) की सवारी करते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि चंचल से चंचल मन और कामनाओं को उन्होंने अपने वश में कर रखा है। वे मोदक प्रिय हैं, जो ब्रह्मानंद का प्रतीक है।
संतों की पहचान यह है कि वे संसार में रहते हुए भी संसार से लिप्त नहीं होते। गणेश जी समस्त भौतिक और आध्यात्मिक संपदाओं के केंद्र होकर भी शिव-पार्वती की भक्ति में लीन रहते हैं। वे कभी अपनी शक्तियों का प्रदर्शन अपने स्वार्थ के लिए नहीं करते, बल्कि सदैव भक्तों के कष्टों को हरने (विघ्नहर्ता) के लिए तत्पर रहते हैं।
