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·84 कोस धाम·By प्रमोद कुमार शुक्ला

वो भयानक राक्षस जिनसे डरते थे भगवान कृष्ण

वो भयानक राक्षस जिनसे डरते थे भगवान कृष्ण

इस स्थान की आधुनिक गुरु परंपरा में श्री श्री 108श्री बालकृष्ण दास जी महाराज का नाम परम आदरणीय है। वे इस स्थान के अत्यंत तेजस्वी और भगवद्-प्राप्त संत थे

श्रीधाम नंदगांव :

ब्रजमंडल वह पावन हृदयस्थल है, जहां द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बाल्यकाल और कौमार्य काल की सबसे दिव्य और मधुर लीलाएं रची थीं। नंदभवन से कुछ ही दूरी पर दक्षिण दिशा में स्थित 'यशोदा कुंड'और उसके तट पर स्थित 'हाऊ-बिलाऊ' की पाषाण शिलाएं ब्रज संस्कृति, वात्सल्य रस और पौराणिक इतिहास का एक अनूठा संगम हैं। khabar4india.com यह लेख इस पावन स्थल के पौराणिक इतिहास, उत्पत्ति, लोक कथाओं, जीर्णोद्धार, गुरु परंपरा और समीपस्थ गौशाला के ऐतिहासिक प्रमाणों को विस्तार से आपके सम्मुख प्रस्तुत करता है।

यशोदा कुंड का इतिहास एवं पौराणिक प्रमाण

यशोदा कुंड वह परम पवित्र सरोवर है जहां माता यशोदा प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करने आती थीं। कई बार वे अपने दोनों लालाओं—श्रीकृष्ण और बलराम को भी अपने साथ लाती थीं और उनकी बाल-क्रीड़ाओं को देखकर वात्सल्य रस में सराबोर हो जाती थीं। सनातन ग्रंथों और ब्रज-साहित्य में यशोदा कुंड को 'तीर्थराज' की संज्ञा दी गई है।

यशोदा कुंड का प्रणाम मंत्र : धनधान्यसुखं देहि तीर्थराज नमोस्तु ते । वैकुण्ठपदलाभाय प्रार्थयामि नमस्तु ते ॥

हे तीर्थराज ! इस लोक में आप धन-धान्य सुख प्रदान करें, परलोक में वैकुण्ठ पद लाभ प्राप्त करायें । हे उभयलोकसाधक ! आपको बार बार प्रणाम है ।

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ऐसी मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से भक्त को भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य भक्ति और वैकुंठ लोक का अधिकार प्राप्त होता है। कुंड के समीप ही एक प्राचीन नृसिंह भगवान का मंदिर है। माता यशोदा कुंड में स्नान करने के पश्चात अपने लाला की नजर उतारने और उनके कुशल-क्षेम की कामना के लिए इसी नृसिंह मंदिर में पूजा-अर्चना किया करती थीं।

यशोदा कुंड के पश्चिमी तट पर एक छोटी सी पर्वत शिला पर दो डरावनी सी दिखने वाली टूटी हुई (भग्न) पाषाण मूर्तियां स्थित हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'हाऊ-बिलाऊ' (Hau-Bilau) कहा जाता है। इन मूर्तियों की उत्पत्ति को लेकर इतिहास और लोक-परंपरा में तीन प्रमुख धाराएं मिलती हैं

शांडिल्य ऋषि का श्राप (असुरों का पाषाण बनना)

पौराणिक इतिहास के अनुसार, द्वापर युग में नंदीश्वर पर्वत (जिस पर नंदगांव बसा है) पर महर्षि शांडिल्य तपस्या किया करते थे। कंस द्वारा भेजे गए कई मायावी राक्षस अक्सर उनके यज्ञ और तप में बाधा डालते थे। एक बार राक्षसों के उपद्रव से कुपित होकर महर्षि शांडिल्य ने इस क्षेत्र को अभिमंत्रित करते हुए श्राप दे दिया:

"जो भी आसुरी प्रवृत्ति या दुर्भावना लेकर इस नंदीश्वर पर्वत क्षेत्र में प्रवेश करेगा, वह उसी क्षण पाषाण (पत्थर) का बन जाएगा।" माना जाता है कि कंस द्वारा भेजे गए दो भयानक राक्षस (जिन्हें लोकभाषा में हाऊ और बिलाऊ कहा गया) श्रीकृष्ण को क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से आए थे, किंतु ऋषि के श्राप के प्रभाव से वे इसी कुंड के तट पर आकर पत्थर के बन गए। इसी अभेद्य सुरक्षा के कारण, कंस के असुर केशी के आतंक से पीड़ित होकर नंद बाबा अपने संपूर्ण गोपों और गायों के साथ महावन (गोकुल) छोड़कर नंदीश्वर पर्वत पर आकर बस गए थे, क्योंकि यहाँ कोई भी राक्षस जीवित रूप में प्रवेश नहीं कर सकता था।

स्थानीय लोगों में एक दंत कथा प्रसिद्ध है कि जब कंस के द्वारा हाऊ और बिलाऊ को भेजा गया तो उन्हें देखकर भगवान कृष्ण डरने का नाटक करने लगे। क्यों हाऊ और बिलाऊ की मृत्यु नहीं हो सकती थी यह उनके मृत्यु का समय नहीं था। इसलिए भगवान कृष्ण रोते हुए वहां से भागे और बड़े भैया बलराम को मदद के लिए बुलाया जिसके बाद दाऊ जी ने दोनों असुरों से युद्ध किया। दाऊ जी ने दोनों को एक घुसा मारकर पाषाण का बना दिया।

hau bilau

माता यशोदा की वात्सल्यमयी लीला (हऊआ की लोककथा)

दूसरी और सबसे लोकप्रिय मान्यता भगवान की बाल-लीला से जुड़ी है। कन्हैया और बलदाऊ जब सखाओं के साथ खेलते-खेलते घर से बहुत दूर निकल जाते थे और भोजन के समय भी लौटकर नहीं आते थे, तब माता यशोदा उन्हें वापस बुलाने के लिए 'हाऊ' (हऊआ या भूत-प्रेत जैसी डरावनी आकृति) का नाम लेकर डराया करती थीं। ब्रजभाषा के सुप्रसिद्ध पद में इस लीला का अद्भुत वर्णन मिलता है:

"दूर खेलन मत जाउ लाल यहाँ हाऊ आये हैं। हँस कर पूछत कान्ह मैया यह किनै पठाये हैं।।"

माता यशोदा कहती थीं, "लाला, दूर खेलने मत जाओ, वहाँ हाऊ खड़ा है, वह तुम्हें पकड़ लेगा।" इस पर बालकृष्ण मंद-मंद मुस्कुराते हुए पूछते थे, "मैया, इस हाऊ को यहाँ किसने भेजा है? मैं तो उसे देखूँगा।" भक्तों का विश्वास है कि बालकृष्ण की इसी कौतुकमयी इच्छा को पूर्ण करने के लिए वे आकृतियां पाषाण रूप में वहाँ प्रकट हो गईं। हाऊ-बिलाऊ की स्तुति का एक प्राचीन प्रामाणिक मंत्र भी ब्रज में गाया जाता है:

  • नमः कृष्णेक्षकास्तुभ्यं धर्मकामार्थ मोक्षिणः।

  • पाषाणरूपिणो देवाः यशोदाशीषसंस्थिताः ॥

अर्थ: श्रीकृष्ण का दर्शन कराने वाले, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाले तथा माता यशोदा के आशीर्वाद से यहाँ स्थित, हे पाषाण रूपी देवताओं! आपको नमस्कार है।

जीर्णोद्धार का ऐतिहासिक वृत्त

यशोदा कुंड और हाऊ-बिलाऊ क्षेत्र का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। पुरातात्विक दृष्टिकोण से यहाँ मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा मंदिर तोड़े जाने का कोई सीधा लिखित प्रमाण नहीं मिलता, जिससे इतिहासकार यह अनुमान लगाते हैं कि ये मूर्तियां मुस्लिम काल से भी पहले (पूर्व-मध्यकाल या गुप्तोत्तर काल) की हो सकती हैं, जो समय के थपेड़ों और प्राकृतिक कारणों से भग्न दशा में पहुँचीं।

प्राचीन काल: ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, मुगल काल के अवसान के बाद ब्रजमंडल के पुनरुद्धार के क्रम में भरतपुर के जाट राजाओं (विशेषकर राजा रूपसिंह और उनके उत्तराधिकारियों) ने 18वीं शताब्दी में नंदगांव के मुख्य नंदराय मंदिर का पुनरुद्धार कराया था। उसी कालखंड में यशोदा कुंड के घाटों का भी आंशिक जीर्णोद्धार हुआ।

आधुनिक युग में चोरी और क्षति: लगभग 20-25 वर्ष पूर्व हाऊ-बिलाऊ की मुख्य प्रतिमाओं में से एक प्राचीन मूर्ति चोरी हो गई थी। वर्तमान में वहाँ मूल प्रतिमाओं के भग्न अवशेष और एक चबूतरे पर प्राचीन मूर्तियों का संग्रह दिखाई देता है।

हालिया स्वरूप: वर्तमान में उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद और स्थानीय संतों के सहयोग से यशोदा कुंड की गाद निकालकर इसके जल को स्वच्छ करने, घाटों की मरम्मत करने तथा पर्यटकों/भक्तों के बैठने के लिए सुंदर परिक्रमा मार्ग विकसित करने का कार्य किया गया है

मौजूद गुरु परंपरा और सिद्ध संतों की गुफाएं

यशोदा कुंड का परिसर केवल एक दार्शनिक स्थल नहीं है, बल्कि यह सदियों से उच्च कोटि के विरक्त संतों की 'भजन-स्थली' रहा है। कुंड के ठीक पास एक अत्यंत शांत और निर्जन क्षेत्र में प्राचीन गुफाएं (कंदराएं) स्थित हैं।

इन गुफाओं का इतिहास 300से 400वर्ष पुराना माना जाता है। ब्रज के विरक्त वैष्णव संत, जो संसार के कोलाहल से सर्वथा दूर रहना चाहते थे, वे इन गुफाओं के भीतर बैठकर अहोरात्र 'हरे कृष्ण' महामंत्र और राधा-नाम का जप करते थे। इस स्थान की आधुनिक गुरु परंपरा में श्री श्री 108श्री बालकृष्ण दास जी महाराज का नाम परम आदरणीय है। वे इस स्थान के अत्यंत तेजस्वी और भगवद्-प्राप्त संत थे। उन्होंने इस निर्जन गुफा में घोर तपस्या की और मान्यता है कि उन्हें इसी स्थान पर ठाकुर जी के बाल-स्वरूप का साक्षात साक्षात्कार हुआ था।

वर्तमान में गुफा परिसर में महाराज जी की दिव्य प्रतिमा स्थापित है, जहाँ आने वाले भक्त संतों की इस अखंड भजन-परंपरा को नमन करते हैं। आज भी उनके शिष्य और परंपरा के विरक्त साधु इस स्थान की देखरेख करते हैं और यहाँ आने वाले भक्तों को ब्रज-रस की दीक्षा व कथा श्रवण कराते हैं।

पास स्थित प्राचीन गौशाला

भगवान श्रीकृष्ण का नाम 'गोपाल' और 'गोविंद' उनकी गायों के प्रति अगाध प्रेम के कारण ही पड़ा। नंदगांव का अर्थ ही है—गायों के राजा नंद बाबा का निवास।

ऐतिहासिक संदर्भ: यशोदा कुंड के ठीक समीप एक विशाल प्राचीन गौशाला स्थित है। पौराणिक मान्यता है कि नंदीश्वर पर्वत से उतरकर जब श्रीकृष्ण और ग्वालबाल गायों को चराने 'खदिरवन' या आसपास के चरागाहों में ले जाते थे, तो दोपहर के समय गायों को पानी पिलाने और विश्राम कराने के लिए इसी यशोदा कुंड और पास के 'कारोहरो कुंड' पर लाते थे।

वर्तमान स्थिति: आज भी इस परंपरा को जीवित रखते हुए कुंड के पास सैकड़ों गोवंश की सेवा के लिए विशाल गौशाला संचालित है। यहाँ ब्रज की स्थानीय नस्ल की गायों का संवर्धन किया जाता है। भक्तगण कुंड के दर्शन के पश्चात इस गौशाला में आकर गो-ग्रास (गायों को चारा खिलाना) देते हैं, जिसे ब्रज यात्रा का एक अनिवार्य अंग माना जाता है।

यशोदा कुंड और हाऊ-बिलाऊ का यह संपूर्ण परिसर द्वापरयुगीन वात्सल्य लीला का जीवंत गवाह है। जहाँ एक ओर यशोदा कुंड माता के प्रेम और पवित्रता को दर्शाता है, वहीं हाऊ-बिलाऊ की पाषाण शिलाएं महर्षि शांडिल्य के तपोबल और भगवान की रक्षा के लिए प्रकृति द्वारा रचित सुरक्षा-कवच का ऐतिहासिक प्रमाण हैं। संतों की तपस्या से पूत यह भूमि आज भी प्रत्येक सनातन धर्मी को कृष्ण-प्रेम के रंग में सराबोर करने की अद्भुत क्षमता रखती है।

नंदगांव के इस पावन स्थल की दृश्य अनुभूति और संतों के मुख से इसकी साक्षात महिमा श्रवण के लिए आप यह वीडियो देख सकते हैं: यशोदा कुंड एवं हाऊ-बिलाऊ दिव्य दर्शन - नंदगांव यह वीडियो आपको यशोदा कुंड के मनोरम वातावरण, वहां स्थित संतों की प्राचीन गुफाओं और हाऊ-बिलाऊ की ऐतिहासिक पाषाण शिलाओं के प्रत्यक्ष दर्शन कराता है।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.