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·प्राचीन सप्त देवालय·By प्रमोद कुमार शुक्ला

राधा रमण जी के 12 भाई व प्रकटीकरण लीला

राधा रमण जी के 12 भाई व  प्रकटीकरण लीला

गोपाल भट्ट गोस्वामी अपने साथ लाए गए शालिग्रामों की नित्य सेवा करते थे। संवत 1599 (1542 ईस्वी) के आसपास की बात है, वृन्दावन में एक धनी भक्त आए जिन्होंने सभी विग्रहों के लिए सुंदर वस्त्र और आभूषण दान किए।

वृन्दावन

ब्रज भूमि का कण-कण श्री कृष्ण व श्री राधा के प्रेम की गाथा कहता है। लेकिन श्री वृंदावन धाम के हृदय में विराजमान ठाकुर श्री राधा रमण जी मंदिर भक्ति की पराकाष्ठा और समर्पण की एक अद्भुत मिसाल है। श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु के पार्षद श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी जी के अद्भुत भक्ति एवं प्रेम ने कठोर शालिग्राम शिला को भी पिघलने पर विवश कर दिया।

आज से लगभग 480 वर्ष पूर्व, वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के पावन अवसर पर, श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी की भक्ति से प्रसन्न होकर एक शालिग्राम शिला ने 'राधा रमण' के रूप में अवतार लिया इस दिव्य प्रकटीकरण की नींव 1510 ईस्वी के आसपास पड़ी, जब श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी दक्षिण भारत यात्रा के दौरान श्रीरंगम पहुंचे।

वहां उन्होंने 'वेंकट भट्ट' के निवास पर चातुर्मास बिताया। वेंकट भट्ट के पुत्र, बालक गोपाल भट्ट, महाप्रभु की भक्ति से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना जीवन कृष्णार्पण करने का संकल्प लिया।

महाप्रभु के अंतर्धान होने के पश्चात, उनकी आज्ञानुसार गोपाल भट्ट गोस्वामी वृन्दावन आए और रूप गोस्वामी व सनातन गोस्वामी जैसे महान संतों के सान्निध्य में रहने लगे। वे वृन्दावन के 'सप्त देवालयों' के संस्थापकों में से एक बने।

गंडकी नदी और 12 शालिग्राम शिलाएँ

ऐतिहासिक वृत्तांतों के अनुसार, जब गोपाल भट्ट गोस्वामी नेपाल की गंडकी नदी में स्नान कर रहे थे, तब उनके कमंडल में स्वतः ही 12 शालिग्राम शिलाएँ आ गईं। उन्होंने कई बार उन्हें वापस नदी में प्रवाहित किया, लेकिन शिलाएँ बार-बार उनके कमंडल में लौट आती थीं। इसे दैवीय इच्छा मानकर वे उन्हें अपने साथ वृन्दावन ले आए।

प्रकटीकरण की वह ऐतिहासिक रात और भक्ति की व्याकुलता

गोपाल भट्ट गोस्वामी अपने साथ लाए गए शालिग्रामों की नित्य सेवा करते थे। संवत 1599 (1542 ईस्वी) के आसपास की बात है, वृन्दावन में एक धनी भक्त आए जिन्होंने सभी विग्रहों के लिए सुंदर वस्त्र और आभूषण दान किए। गोपाल भट्ट गोस्वामी के मन में एक टीस उठी। उनके पास केवल गोल शिलाएँ (शालिग्राम) थीं, जिन्हें वे न तो वस्त्र पहना सकते थे और न ही मुकुट-श्रृंगार कर सकते थे। उन्होंने अत्यंत व्याकुल होकर

प्रार्थना की: "हे प्रभु! यदि आप अन्य विग्रहों की तरह अंग-प्रत्यंग सहित प्रकट होते, तो मैं भी आपको सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सजा पाता।" उसी रात उन्होंने 'भक्ति-रसामृत-सिंधु' का पाठ किया और अश्रुपूरित नेत्रों से सो गए अगले दिन, वैशाख पूर्णिमा की सुबह जब उन्होंने अपनी 'दामोदर' नामक शालिग्राम शिला की मंजूषा (पेटी) खोली, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

12 शिलाओं में से एक प्रमुख शिला ने एक अति सुंदर, त्रिभंग मुद्रा (तीन जगह से मुड़ी हुई) वाले विग्रह का रूप ले लिया था। यह विग्रह लगभग 12 इंच का था। इनके मुखारविंद श्री गोविंद देव जी के समान, वक्षस्थल श्री गोपीनाथ जी के समान और चरण कमल श्री मदन मोहन जी के समान हैं। इसीलिए कहा जाता है कि राधा रमण जी के दर्शन मात्र से इन तीनों प्रमुख विग्रहों के दर्शन का फल मिल जाता है।

'राधा रमण' नाम का अर्थ

विद्वानों और संतों ने इस विग्रह का नाम 'श्री राधा रमण' रखा। 'राधा' का अर्थ है उनकी ह्लादिनी शक्ति और 'रमण' का अर्थ है आनंद देने वाले। यद्यपि इस मंदिर में श्री राधा जी का अलग से कोई विग्रह नहीं है, लेकिन ठाकुर जी के वाम भाग (बाईं ओर) में एक स्वर्ण मुकुट विराजमान रहता है, जो राधा रानी की उपस्थिति का प्रतीक है।

मंदिर की अद्वितीय परंपराएं और ऐतिहासिक तथ्य

राधा रमण मंदिर वृन्दावन के उन गिने-चुने मंदिरों में से एक है, जहां मुगल काल के दौरान भी विग्रह को कभी मंदिर से बाहर नहीं ले जाया गया। अखंड अग्नि: मंदिर की रसोई (रसोइया) में पिछले 480 वर्षों से वही अग्नि प्रज्वलित है जो ठाकुर जी के प्रकटीकरण के समय प्रकट की गई थी। यहाँ आज भी माचिस का प्रयोग नहीं होता; उसी पुरातन अग्नि से भोग तैयार किया जाता है।

वैष्णव आचार: यहाँ की सेवा पद्धति बहुत ही कठोर और शुद्ध है। केवल गोस्वामी परिवार के सदस्य ही गर्भगृह में प्रवेश कर सकते हैं।

वास्तुकला: वर्तमान मंदिर का निर्माण 1826 में शाह कुंदन लाल के सहयोग से आधुनिक शैली में किया गया था, जो अपनी नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। आज के दौर में, जहाँ आध्यात्मिकता केवल प्रदर्शन तक सीमित होती जा रही है, राधा रमण जी का प्रकटीकरण दिवस हमें 'भाव' की महत्ता सिखाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर केवल पाषाण में नहीं, बल्कि भक्त के विश्वास में वास करते हैं।

हर साल वैशाख पूर्णिमा के दिन यहाँ 'अभिषेक उत्सव' मनाया जाता है, जिसमें दूध, दही, घी, शहद और शक्कर के साथ ठाकुर जी का महाभिषेक होता है। देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस दृश्य के साक्षी बनते हैं।

श्री राधा रमण जी का प्राकट्य केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि प्रेम की विजय गाथा है। गोपाल भट्ट गोस्वामी की अटूट निष्ठा ने यह सिद्ध कर दिया कि जब जीव पूर्णतः शरणागत हो जाता है, तो जड़ पदार्थ भी चेतन होकर परमात्मा का रूप ले लेते हैं।

नोट:- यह जानकारी गौड़ीय वैष्णव अभिलेख भक्ति रत्नाकर (नरहरि चक्रवर्ती) व श्री चैतन्य चरितामृत आदि ग्रंथों के आधार पर लिखा गया है।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.