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·Saints·By प्रमोद कुमार शुक्ला

महर्षि सूत जी: परम भागवत, व्यास-शिष्य एवं पौराणिक कथा-मर्मज्ञ

महर्षि सूत जी: परम भागवत, व्यास-शिष्य एवं पौराणिक कथा-मर्मज्ञ

महान पौराणिक व्यास-शिष्य महर्षि रोमहर्षण जी, सूत जी के पूज्य पिता थे। रोमहर्षण जी को स्वयं भगवान वेदव्यास जी ने पुराणों का ज्ञान प्रदान किया था। रोमहर्षण जी का नाम 'रोमहर्षण' इसलिए पड़ा क्योंकि जब वे भगवान की कथा सुनाते थे, तो सुनने वालों के रोंगटे (रोम) हर्ष से खड़े हो जाते थे।

सनातन संस्कृति और वैदिक वाङ्मय में पौराणिक आख्यानों का जो अजस्र प्रवाह युगों से चला आ रहा है, उसका मुख्य श्रेय पूज्यपाद महर्षि सूत जी (उग्रश्रवा सूत) को जाता है। जब-जब मानव समाज में धर्म की हानि हुई, जब-जब ज्ञान की रश्मियाँ संशय और अज्ञान के बादलों से आच्छादित होने लगीं, तब-तब पौराणिक ज्ञान के देदीप्यमान सूर्य के रूप में सूत जी का प्राकट्य हुआ।

महर्षि सूत जी केवल एक महान वक्ता, इतिहासकार या पुराणों के संकलनकर्ता ही नहीं थे, अपितु वे ‘परम भागवत’—भगवान श्रीहरि के अनन्य और सर्वश्रेष्ठ भक्तों की श्रेणी में मूर्धन्य स्थान रखते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण, श्रीविष्णु पुराण, पद्म पुराण तथा विभिन्न शास्त्रों में सूत जी के चरित्र की जो महिमा गाई गई है, वह अद्भुत और अद्वितीय है। वे भगवान के नाम, गुण, रूप और लीलाओं में निरंतर निमग्न रहने वाले ऐसे महान आत्मा हैं, जिनका जीवन ही 'हरि-कथा' का पर्याय बन गया।

"सर्ववेदान्तसारं हि श्रीमद्भागवतं इष्यते। तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्रास्ति रतिः क्वचित्॥"

सूत जी महाराज ने इसी रसामृत का स्वयं पान किया और सम्पूर्ण जगत् को इसका पान कराया। उनका सम्पूर्ण जीवन निष्काम भक्ति, शरणागति, गुरु-निष्ठा और लोक-कल्याण के अद्भुत समन्वयात्मक भाव से ओत-प्रोत था।

जन्म, वंश एवं सूत जाति की आध्यात्मिक व्याख्या

महर्षि सूत जी का आविर्भाव पौराणिक इतिहास का एक अत्यंत पावन और रहस्यमयी प्रसंग है। शास्त्रों में सूत जी के जन्म और उनके वंश के विषय में विविध वर्णन मिलते हैं, जिनका आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों ही दृष्टिकोणों से बड़ा गम्भीर महत्त्व है।

  • ऋषियों के महान यज्ञ से प्राकट्य : पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाराजा पृथु अथवा देवाधिदेव ब्रह्मा जी के महान यज्ञ के समय यज्ञानुष्ठान के पवित्र कुण्ड से सूत और मागध का प्राकट्य हुआ था। जब यज्ञ की आहुतियों से महर्षिगण भगवान की स्तुति कर रहे थे, तब उस हविष्य और मन्त्र-शक्ति के दिव्य प्रभाव से सूत जी का जन्म हुआ। उनका मुख्य कार्य था—भगवान के यश, धर्म के रहस्य और ऋषियों-राजाओं के पावन चरित्र का गान करना।

  • सूत जी के पिता: महर्षि रोमहर्षण महान पौराणिक व्यास-शिष्य महर्षि रोमहर्षण जी, सूत जी के पूज्य पिता थे। रोमहर्षण जी को स्वयं भगवान वेदव्यास जी ने पुराणों का ज्ञान प्रदान किया था। रोमहर्षण जी का नाम 'रोमहर्षण' इसलिए पड़ा क्योंकि जब वे भगवान की कथा सुनाते थे, तो सुनने वालों के रोंगटे (रोम) हर्ष से खड़े हो जाते थे। उग्रश्रवा जी (जो सूत जी के नाम से विख्यात हुए) उन्हीं रोमहर्षण जी के योग्य, सुयोग्य और धर्मनिष्ठ पुत्र थे

जाति नहीं, गुण और भक्ति की प्रधानता

पौराणिक ग्रंथों में सूत परंपरा को यद्यपि वर्ण व्यवस्था में एक विशेष स्थान दिया गया (ब्राह्मण और क्षत्रिय के संयोग से उत्पन्न उत्पन्न संतति), किंतु सूत जी के जीवन ने यह सिद्ध कर दिया कि भगवान की भक्ति में जाति, कुल या वर्ण कोई बाधा नहीं है।

"जाति पाँति पूछे नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई॥"

सूत जी के महान चरित्र ने सिद्ध किया कि जो हृदय से भगवान श्रीहरि को धारण करता है, वही वास्तव में सबसे श्रेष्ठ है। महान-से-महान ब्रह्मर्षि, महर्षि और तपस्वी भी सूत जी के चरणों में बैठकर हरि-कथा सुनने के लिए आतुर रहते थे। उनका ज्ञान और उनकी भक्ति इतनी अलौकिक थी कि वर्ण-भेद उनके सामने अत्यंत तुच्छ हो गया।

भक्ति-मार्गी सूत जी: भक्त के रूप में उनके गुण

महर्षि सूत जी का जीवन यह प्रदर्शित करता है कि एक सच्चे भक्त के भीतर कौन-कौन से लक्षण विद्यमान होने चाहिए। श्रीमद्भागवत और अन्य पुराणों के आधार पर सूत जी के चरित्र में निम्नलिखित महान भक्ति-गुण परिलक्षित होते हैं:

  • अनन्य गुरु-निष्ठा : सूत जी का अपने गुरुदेव (महर्षि वेदव्यास जी एवं श्रीशुकदेव जी) के प्रति अगाध और निष्कंप विश्वास था। उन्होंने अपने गुरुदेव से प्राप्त ज्ञान को कभी अपना ज्ञान नहीं माना, अपितु सर्वदा यही कहा—"हे ऋषियों! यह ज्ञान मुझे मेरे पूज्य गुरुदेव की कृपा से प्राप्त हुआ है।" भक्ति मार्ग में गुरु-निष्ठा ही सर्वोपरि है, और सूत जी इसके सजीव प्रमाण थे।

  • अहंकार-शून्यता और परम नम्रता : विशाल पौराणिक ज्ञान का अगाध भंडार होने के बाद भी सूत जी में लेशमात्र भी अहंकार नहीं था। जब नैमिषारण्य के अस्सी हजार ऋषि-मुनियों ने उन्हें व्यासपीठ पर बैठाया, तब भी वे अत्यंत विनम्र रहे। उन्होंने स्वयं को सर्वदा भगवान का दास और ऋषियों के चरणों की धूलि माना।

  • हरि-कथा से अगाध प्रेम : सूत जी के लिए हरि-कथा केवल सुनाने का माध्यम नहीं थी, वह उनका जीवन-प्राण थी। वे जब भी भगवान की लीलाओं का वर्णन करते, तो उनकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगती, वाणी गद्गद हो जाती और वे स्वयं भक्ति के आनंद-सागर में निमग्न हो जाते थे।

  • सर्वभूत-हितैषिता (लोक-कल्याण की भावना) : सूत जी ने ज्ञान का संचय अपने स्वयं के मोक्ष के लिए नहीं किया। उनका एकमात्र लक्ष्य था कि कलयुग के पाप-ताप्त, दुःखी और भ्रमित जीवों का उद्धार कैसे हो। उनका पूरा जीवन निष्काम भाव से संसार के कल्याण के लिए समर्पित था।

सूत जी को श्रेष्ठ भक्त सिद्ध करने वाली प्रमुख लीलाएँ एवं प्रसंग

सूत जी के भक्त-शिरोमणि होने का सबसे बड़ा प्रमाण नैमिषारण्य तीर्थ में घटित यह अद्भुत प्रसंग है। कलियुग का प्रारंभ हो रहा था। शौनकादि अस्सी हजार ऋषि-मुनि अत्यंत चिंतित थे कि कलियुग में मनुष्यों की आयु अल्प होगी, बुद्धि मंद होगी, और वे नाना प्रकार के रोगों व पापों से घिरे रहेंगे। ऐसे समय में जीवों का कल्याण किस प्रकार होगा? इस चिंता के निवारणार्थ ऋषियों ने नैमिषारण्य की पवित्र भूमि पर एक सहस्र (हजार) वर्षों के महान ज्ञान-यज्ञ का अनुष्ठान किया।

ऋषियों का सूत जी का वरण करना : उस यज्ञ-सभा में जब महर्षि उग्रश्रवा सूत जी का आगमन हुआ, तो शौनक जी महाराज सहित समस्त महान ब्रह्मर्षियों ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। ऋषियों ने देखा कि सूत जी का मुखमंडल भक्ति और ज्ञान के अलौकिक तेज से दीप्यमान है। ऋषियों ने नम्रतापूर्वक प्रार्थना की:

"कथं संसारपंकस्थानां मुक्तिः स्यात्कलिपापिनाम्।

इति नः संशयं छिन्धि सर्वज्ञोऽसि मतो मम॥"

अर्थात, "हे सूत जी! आप सर्वज्ञ हैं। आप हमें वह उपाय बताइए जिससे कलियुग के पापी और संसारी जीव इस भवसागर के दलदल से आसानी से पार उतर सकें।"

व्यासपीठ का गौरव और सूत जी की भक्ति

ऋषियों ने सूत जी को सर्वोच्च 'व्यासपीठ' पर विराजमान किया। सोचिए, जहाँ वशिष्ठ, विश्वामित्र, और शौनक जैसे महान तपस्वी ब्रह्मर्षि उपस्थित हों, वहाँ एक सूत-वंशज को सर्वोच्च व्यासपीठ पर बिठाया जाना यह सिद्ध करता है कि भक्ति और हरि-कथा के ज्ञान के समक्ष तप और वर्ण का अहंकार फीका पड़ जाता है। सूत जी ने व्यासपीठ पर बैठकर किसी भी प्रकार का अभिमान नहीं किया। उन्होंने ऋषियों के छह प्रश्नों का अत्यंत सरस, सुबोध और भक्ति रस से परिपूर्ण उत्तर दिया। उन्होंने १८ पुराणों, श्रीमद्भागवत, और महाभारत की पावन कथाओं का ऐसा अजस्र प्रवाह चलाया कि नैमिषारण्य की भूमि साक्षात वैकुंठ बन गई।

शुकदेव जी महाराज के सत्संग और श्रीमद्भागवत-अमृत का स्मरण : सूत जी के जीवन की एक और अत्यंत पावन लीला वह है जब उन्होंने राजा परीक्षित की सभा में भगवान श्रीशुकदेव जी के मुखारविंद से श्रीमद्भागवत कथा का श्रवण किया था। शुकदेव जी के चरणों में बैठकर श्रवण जब राजा परीक्षित को तक्षक नाग के डसने का शाप मिला, तो वे गंगा तट पर आमरण अनशन (प्रायोपवेशन) करके बैठ गए। वहाँ संसार के समस्त सिद्ध ऋषि-मुनि पधारे।

उसी समय व्यास-पुत्र, नग्न-अवधूत, परम हंस श्रीमद् शुकदेव जी महाराज का आगमन हुआ। शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सात दिनों तक 'श्रीमद्भागवत महापुराण' की अमृतमयी कथा सुनाई।सूत जी (उग्रश्रवा जी) उस महान सभा में एक निष्ठावान श्रोता के रूप में उपस्थित थे। वे शुकदेव जी के चरणों के समीप अत्यंत नम्र भाव से बैठे थे। उन्होंने सात दिनों तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए, एकाग्रचित्त होकर उस कथा-अमृत का पान किया।

कथा को हृदयंगम करना और पुनः प्रकट करना : सूत जी की भक्ति इतनी गाढ़ थी कि शुकदेव जी द्वारा गाया गया एक-एक अक्षर, एक-एक श्लोक और उसका गूढ़ भाव उनके हृदय में सदा-सदा के लिए अंकित हो गया। जब नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों ने उनसे पूछा, तो सूत जी ने उस पूरी कथा को ज्यों-का-त्यों, उसी भाव और भक्ति-रस के साथ पुनः सुना दिया। सूत जी ने स्वयं कहा:

"तत्राभवद् भगवान् व्यासपुत्रो यद्रोचमानो भगवान् उरुश्रवाः। तस्यानुकम्पां अहमाददानो व्यासप्रसादादपि तद्विदानः॥"

अर्थात, "वहाँ परम हंस शुकदेव जी की कृपा से और मेरे गुरुदेव व्यास जी के प्रसाद से मुझे इस अलौकिक भागवत-रस की प्राप्ति हुई।" एक श्रेष्ठ भक्त की पहचान यह है कि वह ज्ञान और भक्ति का श्रेय कभी स्वयं नहीं लेता, वह सर्वदा अपने गुरु और भगवान की कृपा का ही बखान करता है। सूत जी ने शुकदेव जी की वाणी को संसार में अमर बनाकर स्वयं को एक आदर्श शिष्य और सर्वोपरि भक्त सिद्ध किया।

बलराम जी द्वारा वध और पुनर्जीवन का आख्यान (पाप-मुक्ति और परम पद)

महर्षि सूत जी के जीवन (और उनके पिता रोमहर्षण जी के संदर्भ) से जुड़ा एक अत्यंत गम्भीर और रहस्यमयी प्रसंग श्रीमद्भागवत के १०वें स्कंध के ७९वें अध्याय में आता है। यह प्रसंग भगवान बलराम जी की तीर्थयात्रा और सूत जी के दिव्य चरित्र का उद्घाटन करता है। महाभारत युद्ध के समय भगवान बलराम जी किसी का पक्ष न लेकर तीर्थयात्रा पर निकल गए थे। घूमते-घूमते वे नैमिषारण्य पहुँचे। उस समय नैमिषारण्य में एक बड़ा सत्र-याग (यज्ञ) चल रहा था। पूज्य रोमहर्षण सूत जी व्यासपीठ पर विराजमान होकर ऋषियों को कथा सुना रहे थे।

जब साक्षात भगवान बलराम जी (जो शेषनाग के अवतार हैं) सभा में पधारे, तो वहाँ उपस्थित समस्त ऋषि-मुनि, सिद्ध और तपस्वी खड़े हो गए और उन्होंने बलराम जी की वंदना की। किंतु, रोमहर्षण सूत जी व्यासपीठ पर बैठे रहे। वे न तो उठे, न ही उन्होंने हाथ जोड़कर बलराम जी का अभिवादन किया।

बलराम जी का क्रोध और रोमहर्षण का वध : भगवान बलराम जी ने सोचा कि "यद्यपि यह सूत-कुल में उत्पन्न हुआ है, फिर भी इसे ऋषियों ने व्यासपीठ पर बैठाया है। इसे इतना ज्ञान और सम्मान मिला, किंतु इसके भीतर व्यासपीठ का अहंकार आ गया है। जो साक्षात ईश्वर के आने पर भी नम्र नहीं होता, उसका ज्ञान व्यर्थ है।" यह सोचकर बलराम जी ने हाथ में रखे 'कुश' (एक पवित्र घास) के अग्रभाग से रोमहर्षण जी पर प्रहार कर दिया, और रोमहर्षण जी का शरीर वहीं छूट गया।

ऋषियों की प्रार्थना और बलराम जी का वरदान

यह देखकर वहाँ उपस्थित ऋषियों में हाहाकार मच गया। ऋषियों ने बलराम जी से कहा: "हे प्रभु! आपने यह क्या किया? हमने ही रोमहर्षण जी को ब्रह्मासन/व्यासपीठ पर बिठाया था और उन्हें दीर्घायु तथा निष्पाप रहने का वरदान दिया था। यद्यपि आपसे बड़ा कोई नहीं है, किंतु हमारे द्वारा दिए गए वचन का क्या होगा?" भगवान बलराम जी ने मुस्कराकर कहा: "हे ऋषियों! वेदों और धर्म की मर्यादा की रक्षा करना मेरा कर्तव्य है। किंतु ऋषियों के वचन असत्य नहीं हो सकते। आप जैसा चाहें, वैसा बताइए।"

ऋषियों ने कहा: "प्रभु! रोमहर्षण जी की आत्मा को शांति मिले और उनका पुत्र उग्रश्रवा (सूत जी) अपने पिता का स्थान ग्रहण करे। जो ज्ञान और शक्ति रोमहर्षण में थी, वह सब उनके पुत्र में आ जाए।"

सूत जी (उग्रश्रवा) का प्राकट्य और बलराम जी की कृपा

भगवान बलराम जी ने रोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी को आशीर्वाद दिया। उन्होंने सूत जी को:

  • अक्षय ज्ञान का वरदान दिया।

  • दीर्घायु और इंद्रियों की अदम्य शक्ति प्रदान की।

  • यह वरदान दिया कि "जब तक सूर्य और चंद्रमा रहेंगे, तब तक सूत जी द्वारा गाई गई कथाएँ संसार में अमर रहेंगी।"

यह लीला भक्ति-शास्त्र का एक अत्यंत गूढ़ रहस्य प्रकट करती है:

  • व्यासपीठ का सम्मान: व्यासपीठ पर बैठने वाला व्यक्ति व्यक्तिगत अहंकार से मुक्त होना चाहिए।

  • भक्त की शुद्धता: भगवान बलराम जी ने रोमहर्षण जी के भौतिक शरीर का अंत करके उनकी आत्मा को परम पद दिया और उनके पुत्र उग्रश्रवा (सूत जी) के रूप में एक पूर्ण, अहंकार-रहित और परम भागवत भक्त को जगत् के कल्याण हेतु व्यासपीठ पर स्थापित किया। सूत जी ने अपने पिता के साथ हुए इस घटनाक्रम को भी भगवान की परम कृपा और लीला माना। उन्होंने बलराम जी के प्रति लेशमात्र भी द्वेष नहीं रखा, बल्कि उनकी भक्ति में और अधिक लीन हो गए। यह एक 'श्रेष्ठ भक्त' की सर्वोच्च स्थिति है—जो अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों में भगवान की कृपा ही देखता है।

सूत जी के मुखारविंद से प्रकट हुए पावन ग्रंथ एवं कथाएँ

महर्षि सूत जी के बिना सनातन धर्म के वर्तमान स्वरूप की कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज हम जिन महान पुराणों और कथाओं का श्रवण करके अपना जीवन धन्य बनाते हैं, वे सभी सूत जी की ही देन हैं।

  • श्रीमद्भागवत महापुराण : शौनकादि ऋषियों को परीक्षित और शुकदेव संवाद के रूप में सम्पूर्ण १२ स्कंधों का अमृतमयी ज्ञान प्रदान किया।

  • श्रीशिव महापुराण : भगवान शिव के अलौकिक स्वरूप, लिंगार्चन, और शिव-लीलाओं का प्रामाणिक गान किया। |

  • श्रीविष्णु पुराण एवं पद्म पुराण : भगवान विष्णु के अवतारों, उनके भक्तों की कथाओं और एकादशी व्रत महात्म्य का विस्तृत विवरण दिया।

  • श्रीसत्यनारायण व्रत कथा : कलियुग में सबसे सरल और फलदायी सत्यनारायण कथा का उपदेश सूत जी ने ही ऋषियों को दिया था। |

  • महाभारत एवं हरिवंश पुराण : कौरव-पांडवों के युद्ध, धर्म के गूढ़ रहस्यों और श्रीकृष्ण के वंश का वर्णन ऋषियों के समक्ष किया।

संक्षेप में कहा जाए तो, महर्षि सूत जी महाराज सनातन परंपरा के वे विशाल वटवृक्ष हैं, जिनकी छाया में बैठकर युगों-युगों से मुमुक्षु (मोक्ष की इच्छा रखने वाले) और भक्त शांति प्राप्त करते आ रहे हैं। वे केवल एक पौराणिक पात्र या वक्ता मात्र नहीं हैं, अपितु वे स्वयं भक्ति-रस के साकार विग्रह हैं। उनका सम्पूर्ण चरित्र—उनका प्राकट्य, उनकी गुरु-भक्ति, नैमिषारण्य का महान ज्ञान-यज्ञ, बलराम जी की कृपा प्राप्त करना, और 18 पुराणों का वितरण—यह स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि वे भक्तों की श्रेणी में अत्यंत श्रेष्ठ, वंदनीय और प्रातः स्मरणीय हैं।

जब तक इस पृथ्वी पर सूर्य, चंद्रमा, गंगा और श्रीमद्भागवत कथा का अस्तित्व रहेगा, तब तक परम भागवत महर्षि सूत जी का नाम संपूर्ण मानव जाति के हृदय में श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता रहेगा। परम पुरुष वासुदेव और उन महर्षि सूत जी को बारंबार प्रणाम है, जिनके मुखारविंद से झरे हुए कथा-रसामृत का पान करके सम्पूर्ण जगत् धन्य हो रहा है।)

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.