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·Saints·By प्रमोद कुमार शुक्ला

परम भागवत श्री शुकदेव जी महाराज: परमज्ञान से परमभक्ति की दिव्य यात्रा

परम भागवत श्री शुकदेव जी महाराज: परमज्ञान से परमभक्ति की दिव्य यात्रा

परंतु भक्ति मार्ग के आचार्यों (जैसे श्री रूप गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी और श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर) का मानना है कि शुकदेव जी का अद्वैत ज्ञान और निर्गुण समाधि केवल उनकी भक्ति की पृष्ठभूमि (Background) थी।

सनातन धर्म के इतिहास और भक्ति-साहित्य में महर्षि शुकदेव जी का स्थान अद्वितीय और अनुपम है। वे न केवल परम ज्ञान के प्रतीक हैं, बल्कि 'भागवत रस' के प्रदाता और भक्तों के मुकुटमणि भी हैं। जहाँ एक ओर वे जन्म से ही ब्रह्मनिष्ठ, जीवन्मुक्त और मायातीत ज्ञानी माने जाते हैं, वहीं दूसरी ओर वे श्रीमद्भागवत महापुराण के मुख्य वक्ता बनकर 'भक्ति रस' के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान दिखते हैं।

सामान्यतः ज्ञान और भक्ति के बीच एक दार्शनिक सीमा रेखा मानी जाती है। ज्ञान निर्गुण, निराकार और कैवल्य मोक्ष की ओर ले जाता है, जबकि भक्ति सगुण, साकार और भगवान के लीलामृत के प्रति असीम प्रेम में डुबोती है। महर्षि शुकदेव का जीवन चरित्र इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि ज्ञान का अंतिम परिपाक और पूर्णाहुति केवल और केवल 'भक्ति' ही है।

जन्म कथा और अलौकिक प्राकट्य

श्री शुकदेव जी का प्राकट्य कोई साधारण भौतिक जन्म नहीं था; यह एक अलौकिक, दिव्य और आध्यात्मिक घटना थी। वे भगवान वेदव्यास जी के पुत्र हैं और उनकी माता का नाम पिंगला (या वाटिका) बताया गया है। परंतु उनके प्राकट्य की कथा अत्यंत रहस्यमयी और रसपूर्ण है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार भगवान शिव कैलाश पर्वत पर जगज्जननी माता पार्वती को अत्यंत गूढ़ 'अमरकथा' (परम ब्रह्म और भगवद्-लीला का गुप्त रहस्य) सुना रहे थे। भगवान शिव ने कथा प्रारंभ करने से पूर्व यह सुनिश्चित किया कि वहाँ कोई अन्य जीव उपस्थित न हो, ताकि इस परम गुह्य ज्ञान की पवित्रता बनी रहे।

परंतु उसी वृक्ष पर एक शुक (तोते) का अंडा रखा था। कथा के प्रभाव से वह अंडा प्रस्फुटित हो गया और उसमें से एक लघु शुक-शिशु प्रकट हुआ। जब शिव जी पार्वती जी को कथा सुना रहे थे, तब पार्वती जी सुनते-सुनते निद्राधीन हो गईं। परंतु वह शुक-शिशु शिव जी की वाणी के उत्तर में 'हाँ... हाँ...' (हुंकार) भरता रहा ताकि कथा का प्रवाह न रुके। जब कथा समाप्त हुई और शिव जी को ज्ञात हुआ कि पार्वती जी तो सो रही थीं और कथा किसी शुक ने सुन ली है, तो वे क्रुद्ध हो गए।

शिव जी अपना त्रिशूल लेकर उस शुक के पीछे दौड़े। वह शुक भयभीत होकर ब्रह्मांड में उड़ने लगा और अंततः महर्षि वेदव्यास जी के आश्रम में पहुँचा। वहाँ व्यास जी की पत्नी जंभाई (उबासी) ले रही थीं। शुक सूक्ष्म रूप धारण करके उनकी मुख-गुहा के माध्यम से उनके गर्भ में प्रविष्ट हो गया। अमरकथा के श्रवण मात्र से जीव अमर और भगवद्-भाव से भावित हो जाता है। शुक ने वही अमरकथा सुनी थी, जिसने उसे साक्षात ब्रह्मरूप और परम भागवत बना दिया।

गर्भ में १६ वर्ष का निवास और माया से निर्भयता

शुकदेव जी माता के गर्भ में साधारण ९-१० महीने नहीं, बल्कि पूरे १६ वर्षों तक रहे। वे गर्भ से बाहर आने के लिए तैयार नहीं थे। जब महर्षि वेदव्यास जी ने उनसे पूछा कि वे बाहर क्यों नहीं आ रहे हैं, तो गर्भस्थ शिशु ने उत्तर दिया "हे पिता! जैसे ही जीव गर्भ से बाहर आता है, भगवान की त्रिगुणात्मिका 'माया' उसे अपने वश में कर लेती है। मैं माया के बंधन में नहीं पड़ना चाहता। मैं निरंतर उस परमपिता परमात्मा का ध्यान कर रहा हूँ और इसी अवस्था में प्रसन्न हूँ।" अंततः, जब स्वयं जगदीश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आश्वासन दिया कि "मेरे वरदान से मेरी माया तुम्हें स्पर्श भी नहीं कर पाएगी," तब श्री शुकदेव जी ने गर्भ से जन्म लिया।

जन्म लेते ही वन-गमन: निर्विकल्प समाधि और मायातीत अवस्था

श्री शुकदेव जी का जन्म साधारण बालकों की भाँति रुदन करते हुए नहीं हुआ। वे जन्म लेते ही सोलह वर्ष के परम ज्ञानी, ब्रह्मज्ञानी और यति रूप में प्रकट हुए। उनका न तो कोई यज्ञोपवीत संस्कार हुआ था, न ही उनका लौकिक मुंडन या जातकर्म हुआ। जन्म लेते ही उन्होंने संसार के प्रति कोई आसक्ति न दिखाते हुए सीधे वन की ओर प्रस्थान कर दिया।

महर्षि वेदव्यास जी अपने पुत्र के प्रति वात्सल्य से भरकर पीछे-पीछे भागे और पुकारने लगे— "हे पुत्र! हे पुत्र!" परंतु शुकदेव जी इतने समदर्शी और ब्रह्ममय हो चुके थे कि उन्होंने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। वृक्षों, पौधों और दिशाओं ने व्यास जी के प्रश्नों का उत्तर प्रतिध्वनि (Echo) के रूप में दिया कि "अरे व्यास! यहाँ कौन किसका पुत्र है और कौन किसका पिता? सर्वत्र एक ही ब्रह्म व्याप्त है।"

यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव। पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽभिनेदुस्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि॥ (श्रीमद्भागवत १/२/२)

अर्थ: जिनका उपनयन संस्कार नहीं हुआ था, जिन्होंने कोई सांसारिक कर्तव्य नहीं किए थे, ऐसे शुकदेव जी को जब विरह में कातर होकर उनके पिता व्यास जी 'पुत्र-पुत्र' कहकर पुकारने लगे, तब सर्वव्यापी होने के कारण वृक्षों ने शुकदेव जी के रूप में उत्तर दिया। ऐसे सभी भूतों के हृदय-स्वरूप श्री शुकदेव जी को मैं प्रणाम करता हूँ।

निर्गुण ज्ञान से सगुण भक्ति की ओर: व्यास जी की युक्ति

श्री शुकदेव जी जन्मावधि से ही ब्रह्मनिष्ठ थे। उनके लिए संसार के सभी पदार्थ, स्त्री-पुरुष, राग-द्वेष और सुख-दुःख सर्वथा मिथ्या थे। वे निरंतर आत्माराम (अपनी आत्मा में ही रमण करने वाले) थे। यहाँ प्रश्न उठता है कि जो व्यक्ति निर्गुण निराकार ब्रह्म की पूर्ण अवस्था में स्थित हो, वह सगुण-साकार भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी लीलाओं की ओर कैसे आकर्षित हुआ? यही वह लीला है जो शुकदेव जी को केवल ज्ञानियों का शिरोमणि ही नहीं, बल्कि भक्तों की श्रेणी में सर्वोपरि सिद्ध करती है।

वेदव्यास जी भली-भांति जानते थे कि उनका पुत्र आत्माराम है और उसे संसार का कोई भी भोग या प्रलोभन आकर्षित नहीं कर सकता। परंतु व्यास जी चाहते थे कि शुकदेव श्रीमद्भागवत महापुराण का अध्ययन करें और संसार को इस भक्ति-रस से आप्लावित करें। इसके लिए व्यास जी ने एक अद्भुत उपाय किया। व्यास जी ने अपने शिष्यों को श्रीमद्भागवत के दो विशेष श्लोक कंठस्थ कराए और उन्हें उसी वन में जाकर ऊँचे स्वर में गाने को कहा जहाँ शुकदेव जी ध्यानावस्थित थे।

प्रथम श्लोक: भगवान के परम सौन्दर्य का चित्रण शिष्यों ने वन में जाकर भगवान श्रीकृष्ण के नटवर रूप का वर्णन करने वाला यह श्लोक गाया:

बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं बिभ्रद्वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्। रन्ध्रान्वेणोरधरसुधया पूरयन्गोपवृन्दै- र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद्गीतकीर्तिः॥ (श्रीमद्भागवत १०/२१/५) भावार्थ: भगवान श्रीकृष्ण अपने मस्तक पर मयूरपिच्छ धारण किए हैं, कानों में कनेर के फूल सजाए हैं, शरीर पर सुवर्ण के समान पीतांबर पहने हैं और गले में वैजयंती माला धारण किए हैं। वे अपने अधरामृत से बांसुरी के छिद्रों को भरते हुए, ग्वालबालों के साथ अपने चरणों की छाप से वृंदावन की भूमि को पावन करते हुए प्रवेश कर रहे हैं। इस श्लोक को सुनते ही समाधिस्थ शुकदेव जी का मन चंचल हो उठा। उनके भीतर कौतूहल जागा— "यह कौन सा ऐसा सुंदर रूप है, जिसकी झांकी मात्र से आत्मा का आनंद भी फीका पड़ जाता है?"

द्वितीय श्लोक: भगवान की अहैतुकी दया का प्रसंग तत्पश्चात शिष्यों ने भगवान के परम कृपालु स्वभाव को व्यक्त करने वाला दूसरा श्लोक गाया

अहो बकीयस्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी। लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ (श्रीमद्भागवत ३/२/२३)

भावार्थ: अहो! वह पूतना राक्षसी, जो भगवान श्रीकृष्ण को मारने की नीयत से अपने स्तनों में हलाहल विष लगाकर आई थी, उसे भी भगवान ने माता की गति (धात्री गति) प्रदान कर दी! ऐसे परम दयालु भगवान श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मैं और किसकी शरण में जाऊँ?

भक्ति का विजय-ध्वज

जब श्री शुकदेव जी ने इस श्लोक को सुना, तो उनका हृदय द्रवीभूत हो गया। वे विचार करने लगे— "संसार में ऐसा कौन सा स्वामी या ईश्वर हो सकता है जो अपने शत्रु और प्राण लेने वाली राक्षसी को भी वही गति दे दे जो एक माता को दी जाती है?" भगवान के इस असीम सौन्दर्य और अपार वात्सल्य-दयालुता ने शुकदेव जी के वज्र समान कठोर ब्रह्मज्ञान के आवरण को पल भर में भेद दिया। जो शुकदेव जी निर्गुण समाधि में लीन थे, वे सगुण साकार श्रीकृष्ण के प्रेम में अश्रु बहाने लगे।

वे तुरंत वन से निकलकर अपने पिता वेदव्यास जी के पास पहुँचे और उनसे श्रीमद्भागवत का अध्ययन किया। महत्वपूर्ण सिद्धान्त: यह घटना सिद्ध करती है कि भगवद्-गुण और भगवद्-लीला में ऐसा अलौकिक आकर्षण है जो मुक्त आत्माओं (जीवन्मुक्तों) को भी अपनी ओर खींच लेता है। यही शुकदेव जी का वह मोड़ है जहाँ वे 'ज्ञानी' से 'परम भागवत भक्त' बन गए।

लीलाएँ जो शुकदेव जी को 'श्रेष्ठ भक्त' सिद्ध करती हैं

अप्सराओं का प्रसंग और सर्वथा निष्काम दृष्टि

जब शुकदेव जी जन्म के समय वन की ओर जा रहे थे, तब मार्ग में एक सरोवर में स्वर्ग की अप्सराएँ स्नान कर रही थीं। शुकदेव जी नग्न अवस्था में वहाँ से निकले, परंतु अप्सराओं ने अपने वस्त्र धारण करने का कोई प्रयास नहीं किया और सहज भाव से खड़ी रहीं। लेकिन जब कुछ समय बाद वृद्ध वेदव्यास जी (जो वस्त्र पहने हुए थे) अपने पुत्र को खोजते हुए उसी मार्ग से निकले, तो अप्सराओं ने शीघ्रता से अपने वस्त्र पहन लिए और लज्जित हो गईं। व्यास जी को यह देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने अप्सराओं से पूछा, "हे देवियों! मेरा युवा पुत्र निर्वस्त्र निकला, तब तुम्हें लज्जा नहीं आई। परंतु मुझ वृद्ध और वस्त्रधारी को देखकर तुम लज्जित हो गईं और कपड़े ढकने लगीं, इसका क्या कारण है?"

अप्सराओं ने अत्यंत विनम्रता से उत्तर दिया: "हे ऋषिवर! आपके पुत्र श्री शुकदेव जी में स्त्री और पुरुष का कोई भेद ही नहीं है। उनकी दृष्टि में न कोई अपना है, न कोई पराया, न कोई पुरुष है, न स्त्री। वे सर्वत्र केवल एक शुद्ध आत्म-तत्त्व और ब्रह्म को ही देखते हैं। परंतु आपकी दृष्टि में अभी भी सांसारिक भेद (स्त्री-पुरुष का विवेक) अवशिष्ट है। इसीलिए हमें आपसे लज्जा आई, परंतु शुकदेव जी की दृष्टि निष्पाप और मायातीत है।"

यह लीला दर्शाती है कि शुकदेव जी की देहाध्यास (शरीर होने का भाव) पूरी तरह से मिट चुकी थी। सच्चा भक्त वही है जो प्राणिमात्र में केवल अपने इष्टदेव को देखता है, और शुकदेव जी इस अवस्था के चरम शिखर पर थे।

राजा परीक्षित की सभा और भागवत-कथा का गायन

शुकदेव जी के भक्त चरित्र का सबसे उज्ज्वल और महान प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रकटीकरण का है। तक्षक नाग के काटने के शाप के कारण चक्रवर्ती सम्राट परीक्षित गंगा के तट पर (शुकताल/गंगा तट) अनशन व्रत (प्रायोपवेशन) लेकर बैठ गए थे। उनके पास केवल सात दिनों का जीवन शेष था। उस समय संसार के कोने-कोने से महान ऋषि-मुनि, सिद्ध और तपस्वी—जैसे अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, नारद, परशुराम आदि वहाँ एकत्र हुए।

सबके मन में एक ही प्रश्न था— "जिस व्यक्ति की मृत्यु अति निकट हो, उसे क्या करना चाहिए?" कोई कर्मकांड की सलाह दे रहा था, तो कोई योग और ध्यान की। कोई तपस्या की बात कर रहा था, तो कोई तीर्थाटन की। कोई भी ऋषि सर्वसम्मत और अंतिम निर्णय नहीं दे पा रहा था।

उसी समय १६ वर्ष के दिगंबर, अवधूत रूप में श्री शुकदेव जी महाराज वहाँ सहसा पधारे। उनकी दिव्य आभा और मुखमंडल का तेज देखकर सभा में उपस्थित सभी वयोवृद्ध और तपोवृद्ध ऋषि-मुनि अपने-अपने आसनों से खड़े हो गए और उन्हें प्रणाम किया। सब ऋषियों ने सर्वसम्मति से शुकदेव जी को 'व्यासपीठ' पर विराजमान किया और राजा परीक्षित के प्रश्न का उत्तर देने का अनुरोध किया।

जब शुकदेव जी राजा परीक्षित को कथा सुनाने ही वाले थे, तब स्वर्ग के देवता अमृत का कलश (अमृत-कुंभ) लेकर सभा में उपस्थित हुए। देवताओं ने शुकदेव जी से कहा"हे शुकदेव जी! आप यह कथा का रस हमें दे दीजिए और बदले में यह स्वर्ग का अमृत राजा परीक्षित को पिला दीजिए, जिससे इनकी तक्षक नाग से मृत्यु नहीं होगी और ये अमर हो जाएँगे।" यह वह क्षण है जहाँ शुकदेव जी की भक्ति और भगवद्-रस के प्रति निष्ठा का पराकाष्ठा रूप दिखाई देता है।

शुकदेव जी ने देवताओं का परिहास करते हुए उस अमृत कलश को अस्वीकार कर दिया। "कहाँ यह सांसारिक अमृत जो केवल भौतिक शरीर को कुछ काल के लिए अमर करता है, और कहाँ यह श्रीमद्भागवत की कथा रूपी भक्ति-अमृत जो जीव को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करके सीधे श्रीकृष्ण के चरणों में नित्य धाम प्रदान करता है! कांच के टुकड़े (स्वर्ग का अमृत) के बदले में चिंतामणि (भागवत कथा) का सौदा नहीं किया जा सकता।"

शुकदेव जी ने देवताओं को अधिकारहीन मानकर कथा से वंचित कर दिया। यह लीला सिद्ध करती है कि शुकदेव जी की दृष्टि में मोक्ष और स्वर्ग का सुख, भगवद्-भक्ति और हरि-कथा के आनंद के सामने अत्यंत तुच्छ और तिनके के समान था। शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को सात दिनों तक लगातार श्रीमद्भागवत महापुराण का रसपान कराया। उन्होंने परीक्षित को कोई कर्मकांड या कठिन योग नहीं सिखाया, बल्कि केवल भगवान की लीलाओं, उनके गुणों और उनके स्वरूप का ऐसा वर्णन किया कि परीक्षित का मृत्यु का भय पूरी तरह समाप्त हो गया।

'आत्मारामश्च मुनयो' श्लोक की व्याख्या और व्यासपीठ की मर्यादा

जब शुकदेव जी भागवत कथा का गायन करते थे, तो उनकी आँखों से निरंतर अश्रु प्रवाहित होते थे। भगवान की लीलाओं का वर्णन करते समय उनका कंठ अवरुद्ध हो जाता था और वे स्वयं को भूलकर रोमांचित हो उठते थे। श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध में एक अत्यंत प्रसिद्ध श्लोक आता है:

आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहेतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥ (श्रीमद्भागवत १/७/१०) भावार्थ: जो मुनि समस्त बंधनों से मुक्त हैं, जो आत्मा में ही रमण करने वाले (आत्माराम) हैं, वे भी भगवान श्रीहरि के प्रति निष्काम (अहैतुकी) भक्ति करते हैं। क्योंकि भगवान के गुण ही ऐसे अलौकिक और आकर्षक हैं! यह श्लोक वास्तव में स्वयं श्री शुकदेव जी के जीवन का दर्पण है। शुकदेव जी स्वयं वह आत्माराम मुनि हैं जो किसी सांसारिक फल की इच्छा के बिना केवल भगवान के स्वरूप के प्रति असीम अनुराग रखते हैं। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि भक्ति ज्ञान की दासी नहीं है, बल्कि ज्ञान और वैराग्य तो भक्ति के दो पुत्र हैं जो भक्ति के बिना निष्प्राण हैं। शुकदेव जी के भक्त चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ

पूर्ण अयाचकता और असंगता (Absolute Detachment)

शुकदेव जी कभी किसी नगर या गाँव में आधे मिनट (गाय दुहने के समय) से अधिक नहीं ठहरते थे। वे केवल इसलिए गृहस्थों के द्वार पर जाते थे ताकि वे अपने दर्शन से उनके घर को पवित्र कर सकें, न कि भोजन या आश्रय मांगने के लिए। उनके पास न कोई वस्त्र था, न कोई आश्रम, न कोई शिष्य-मंडली और न ही कोई संग्रह। वे पूर्णतः नग्न अवस्था में रहते थे, परंतु उनके मन में कभी काम, क्रोध, लोभ या मोह का विचार भी नहीं आया। उनके लिए मृदा और सुवर्ण, मित्र और शत्रु, नर और नारी सब एक समान थे। 'शुक-मुख' से भागवत का माधुर्यसंस्कृत साहित्य में कहा गया है:

निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्। पिबत भागवतं रसमालयं मुहु रहो रसिका भुवि भावुकाः॥ (श्रीमद्भागवत १/१/३) वेद रूपी कल्पवृक्ष का जो पका हुआ फल (भागवत) है, वह 'शुक के मुख' (शुकदेव जी) का स्पर्श पाने से अमृत रस से परिपूर्ण हो गया है। जैसे तोता (शुक) जब किसी फल को काटता है तो वह फल और अधिक मीठा हो जाता है, उसी प्रकार जब श्रीमद्भागवत की कथा शुकदेव जी के श्रीमुख से निसृत हुई, तो वह आनंदमयी कथा और अधिक रसमय और मुक्तिदायिनी बन गई। शुकदेव जी: ज्ञानी, ध्यानी या परम भागवत?

अक्सर विद्वानों में यह चर्चा होती है कि शुकदेव जी को किस श्रेणी में रखा जाए?

* अद्वैत वेदांत की दृष्टि से: वे अद्वैत स्थिति में स्थित, जीवनमुक्त और ज्ञानियों के सिरमौर हैं। * योग शास्त्र की दृष्टि से: वे सिद्ध योगी और निर्विकल्प समाधि के स्वामी हैं। * भक्ति शास्त्र की दृष्टि से: वे 'परम भागवत' (भगवान के महानतम प्रेमी) हैं।

परंतु भक्ति मार्ग के आचार्यों (जैसे श्री रूप गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी और श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर) का मानना है कि शुकदेव जी का अद्वैत ज्ञान और निर्गुण समाधि केवल उनकी भक्ति की पृष्ठभूमि (Background) थी। जब तक जीव को भगवान के रस का आस्वादन नहीं मिलता, तब तक वह आत्माराम रहता है। परंतु जैसे ही उसे भगवद्-रस की प्राप्ति होती है, वह आत्मारामता को छोड़कर 'भक्त' बन जाता है। शुकदेव जी ने स्वयं स्वीकार किया है

"हे राजन्! यद्यपि मैं निर्गुण ब्रह्म में पूर्णतः स्थित था और सांसारिक माया से मुक्त था, फिर भी भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं ने मेरे हृदय को चुरा लिया और मैं भागवत-कथा का प्रेमी बन गया।"

यह स्वीकारोक्ति सिद्ध करती है कि शुकदेव जी की भक्ति ज्ञान जनित नहीं, बल्कि ज्ञान से भी उच्चतर अवस्था की 'साध्य भक्ति' (Prema Bhakti) है। महर्षि शुकदेव जी ने राजा परीक्षित के माध्यम से संपूर्ण मानव जाति को जो उपदेश दिया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना हज़ारों वर्ष पूर्व था

काल और मृत्यु का निरंतर स्मरण: मनुष्य को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि काल (मृत्यु) निरंतर उसके सिर पर खड़ा है। जैसे परीक्षित के पास सात दिन थे, वैसे ही हर जीव के पास भी सप्ताह के सात दिनों (रविवार से शनिवार) में से ही कोई एक दिन मृत्यु के लिए निश्चित है।

अभय का मार्ग केवल हरि-स्मरण है: संसार का कोई भी धन, पद, औषधि या सम्बंध जीव को मृत्यु के भय से मुक्त नहीं कर सकता। केवल भगवान के नाम, रूप और लीला का श्रवण-कीर्तन ही जीव को अभय बना सकता है।

भक्ति ही परम पुरुषार्थ है: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (चार पुरुषार्थ) से भी ऊपर एक पाँचवाँ पुरुषार्थ है— 'भगवद्-प्रेम' (भक्ति)। मोक्ष प्राप्त करना अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि मोक्ष के बाद भी भगवान की सेवा और प्रेम में लीन रहना ही जीव का वास्तविक स्वरूप है।

परम भागवत शुकदेव जी को नमन

महर्षि शुकदेव जी का जीवन चरित्र ज्ञान और भक्ति का वह असीम महासंगम है जहाँ ज्ञान की नदियाँ भक्ति के महासमुद्र में जाकर विलीन हो जाती हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सच्चा वैराग्य कपड़ों को छोड़ने में नहीं, बल्कि मन से संसार की असत्यताओं को निकालने में है। वे यह भी सिद्ध करते हैं कि ईश्वर का प्रेम किसी सांसारिक लालच या भय का मोहताज नहीं है वह तो आत्मा का स्वाभाविक धर्म है।

शुकदेव जी महाराज ने श्रीमद्भागवत रूपी जिस भक्ति-गंगा को धराशायी किया, वह आज भी करोड़ों मुमुक्षुओं और भक्तों के ताप को हर रही है। वे केवल व्यासपुत्र ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भक्ति-परंपरा के अमर स्तंभ हैं। ऐसे परमहंस, सर्वभूतहृदय, परम भागवत, भक्ति-रस के सम्राट और भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य प्रेमी महर्षि शुकदेव जी के चरणों में बारंबार प्रणाम है।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.