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·Bhatkmal·By प्रमोद कुमार शुक्ला

राम ते अधिक राम कर दासा': महर्षि वाल्मीकि का अद्वितीय भक्त चरित्र और उनकी पावन लीलाएं

राम ते अधिक राम कर दासा': महर्षि वाल्मीकि का अद्वितीय भक्त चरित्र और उनकी पावन लीलाएं

महर्षि वाल्मीकि 'रत्नगिरि' या 'रत्नाकर' के नाम से जाने जाते थे। वे अपने कुटुंब के भरण-पोषण के लिए तमसा नदी के बीहड़ वनों में राहगीरों को लूटने और हिंसा का कार्य करते थे। उनके जीवन में न तो धर्म का ज्ञान था और न ही भक्ति का आस्वादन।

सनातन ज्ञान और भक्ति की अक्षुण्ण परंपरा में महर्षि वाल्मीकि का स्थान न केवल आदिकवि के रूप में सर्वोपरि है, बल्कि वे भगवद्भक्तों की आकाशगंगा में उस ध्रुवतारे के समान भासमान हैं, जिसकी चमक युगों-युगों तक मानव चेतना को आलोकित करती रहेगी। भक्ति साहित्य और भारतीय संस्कृति में यह उक्ति सर्वथा चरितार्थ होती है कि—"राम ते अधिक राम कर दासा"। अर्थात्, भगवान श्री राम की महिमा अपरंपार है, किंतु उनके अनन्य भक्तों का चरित्र भगवान से भी अधिक महान और वंदनीय हो जाता है।

महर्षि वाल्मीकि इसी दिव्य सत्य के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। प्रायः महर्षि वाल्मीकि को एक महान संस्कृत कवि, 'श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण' के रचयिता और आर्ष ज्ञान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। किंतु जब हम उनके जीवन के गहन आध्यात्मिक पृष्ठों को उलटते हैं, तो हमें ज्ञात होता है कि उनका काव्य-सृजन वास्तव में उनकी पराभक्ति का ही सहज प्रस्फुटन था। वे केवल कथाकार नहीं थे; वे तो श्रीराम के दिव्य स्वरूप के साक्षात् द्रष्टा और अनन्य अनुरागी थे।

संसार में अनेक भक्त हुए हैं जिन्होंने भगवान की स्तुति की, अनेक ज्ञानी हुए जिन्होंने ब्रह्म का चिंतन किया, परंतु महर्षि वाल्मीकि का भक्त चरित्र इसलिए विशिष्ट और श्रेष्ठ है क्योंकि उन्होंने 'अज्ञान से ज्ञान', 'पाप से पुण्य', और 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की यात्रा भक्ति के बल पर पूर्ण की। उनकी भक्ति ने न केवल उनके अपने जीवन का रूपांतरण किया, बल्कि संपूर्ण जगत् के लिए रामकथा का ऐसा अमृतकुंड रच दिया, जिससे आचमन करके आज भी सहस्रों वर्ष पश्चात मानवता तृप्त हो रही है।

तमसा तट से ब्रह्मज्ञान तक: जीवन का दिव्य रूपांतरण

महर्षि वाल्मीकि का जीवन-चरित्र इस महान आध्यात्मिक सिद्धांत की स्थापना करता है कि भक्ति किसी कुल, जाति, पूर्व कर्म या योग्यता की मोहताज नहीं होती। भक्ति केवल निष्छल समर्पण और भाव की भूखी होती है। पौराणिक वृत्तांतों एवं जनश्रुतियों के अनुसार, अपने प्रारंभिक काल में महर्षि वाल्मीकि 'रत्नगिरि' या 'रत्नाकर' के नाम से जाने जाते थे। वे अपने कुटुंब के भरण-पोषण के लिए तमसा नदी के बीहड़ वनों में राहगीरों को लूटने और हिंसा का कार्य करते थे। उनके जीवन में न तो धर्म का ज्ञान था और न ही भक्ति का आस्वादन। किंतु ईश्वर की अहेतुकी कृपा का मार्ग कब और कैसे खुल जाए, यह कोई नहीं जानता।

एक दिन उसी वन मार्ग से सप्तऋषि (अथवा देवर्षि नारद) व्यतीत हो रहे थे। रत्नाकर ने सदा की भांति उन्हें बंदी बना लिया और उनका सर्वस्व छीनने का प्रयास किया। परंतु संतों की संगति का प्रभाव अमोघ होता है। ऋषियों ने भयभीत होने के स्थान पर रत्नाकर से एक अत्यंत सहज और मर्मस्पर्शी प्रश्न पूछा:

"हे पुरुष! तुम जिन पाप कर्मों के द्वारा अपने परिवार का पालन कर रहे हो, क्या तुम्हारे परिवार के सदस्य तुम्हारे इन पाप कर्मों के फल में भी भागीदार बनेंगे?"

रत्नाकर को पूरा विश्वास था कि उसका परिवार उसके साथ खड़ा रहेगा। किंतु जब उसने गृह जाकर अपने माता-पिता और पत्नी से यही प्रश्न पूछा, तो सबने एक स्वर में कहा:

"हमारा भरण-पोषण करना तुम्हारा कर्तव्य है, परंतु तुम्हारे द्वारा किए गए पापों के भागीदार हम कदापि नहीं बनेंगे। अपने पापों का फल तुम्हें स्वयं ही भोगना होगा।"

इस एक नग्न सत्य ने रत्नाकर के भीतर विवेक की सोई हुई अग्नि को प्रज्वलित कर दिया। मोह का भ्रमजाल छिन्न-भिन्न हो गया। वे वैराग्य के अश्रुओं से भीगते हुए ऋषियों के चरणों में गिर पड़े और क्षमा याचना करने लगे। सप्तऋषियों ने जब देखा कि रत्नाकर का हृदय पश्चाताप की अग्नि में तपकर शुद्ध हो चुका है, तो उन्होंने उसे भगवान श्री राम का पावन नाम जप करने का उपदेश दिया। परंतु निरंतर हिंसा में लिप्त रहने के कारण रत्नाकर की जिह्वा से शुद्ध 'राम' शब्द का उच्चारण नहीं हो पा रहा था।

ऋषियों ने उनकी असमर्थता को देखकर अत्यंत सुगम मार्ग निकाला। उन्होंने कहा—"तुम 'मरा-मरा' शब्द का निरंतर जप करो।" रत्नाकर ने निष्छल भाव और अनन्य निष्ठा से ऋषियों की आज्ञा को शिरोधार्य किया। जब 'मरा-मरा' शब्द का तीव्र गति और निरंतरता के साथ जप होने लगा, तो वह स्वतः ही उलटकर 'राम-राम-राम' के महामंत्र में परिवर्तित हो गया।

वे दिव्य लीलाएं जो महर्षि वाल्मीकि को श्रेष्ठ भक्त सिद्ध करती हैं

महर्षि वाल्मीकि का जीवन केवल साधना तक सीमित नहीं रहा। उनके जीवन में ऐसी अनेक अलौकिक लीलाएं घटीं, जहाँ उनकी भक्ति, ज्ञान, करुणा और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम का प्रकटीकरण हुआ। आइए, उन प्रमुख लीलाओं का विस्तार से अनुशीलन करें:

क्रौंच-वध और शोक का 'श्लोक' में परिवर्तन (करुणा की पराकाष्ठा) : एक सच्चे भक्त का हृदय नवनीत (मक्खन) से भी अधिक कोमल होता है। दूसरों के दुःख को देखकर द्रवित हो जाना ही भक्त का प्रथम लक्षण है। महर्षि वाल्मीकि के जीवन की यह लीला सिद्ध करती है कि भक्ति और करुणा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

तमसा तट की घटना : एक बार महर्षि वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज के साथ तमसा नदी के निर्मल तट पर स्नान हेतु पधारे। वन का वातावरण अत्यंत शांत और मनोरम था। वहाँ वृक्ष की शाखा पर क्रौंच (सारस) पक्षी का एक जोड़ा प्रेम-क्रीड़ा में मग्न था। उसी क्षण एक क्रूर निषाद (बहेलिए) ने अपने बाण से जोड़े में से नर पक्षी का वध कर दिया। रक्त से लथपथ होकर नर पक्षी पृथ्वी पर गिर पड़ा और तड़पने लगा। उसकी मादा संगिनी अत्यंत करुण स्वर में विलाप करने लगी।

छंद का प्रस्फुटन : इस दृश्य को देखकर महर्षि वाल्मीकि का हृदय अगाध शोक और करुणा से भर गया। एक भक्त का हृदय प्राणिमात्र की पीड़ा से किस प्रकार उद्वेलित होता है, इसका उदाहरण महर्षि के मुख से निकले अनचाहे शब्दों में दिखा। उनके श्रीमुख से स्वतः ही छंदोबद्ध वाणी प्रस्फुटित हुई:

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥

(अर्थात: हे निषाद! तुझे कभी शाश्वत प्रतिष्ठा प्राप्त न हो, क्योंकि तूने काम-मोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक का बिना किसी अपराध के वध कर दिया है।)

ब्रह्मा जी का आगमन और आदिकाव्य का संकल्प

यह छंद केवल श्लोक नहीं था, बल्कि यह संस्कृत साहित्य का प्रथम लौकिक श्लोक था। महर्षि स्वयं आश्चर्यचकित थे कि उनके शोक से यह श्लोक कैसे निकल पड़ा। तभी वहाँ सृष्टि के रचयिता जगद्गुरु ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने वाल्मीकि जी से कहा: "हे ब्रह्मर्षि! यह वाणी किसी क्रोध का परिणाम नहीं, अपितु मेरी ही प्रेरणा से आपके मुख से निकली है। आपकी भक्ति और करुणा परिपक्व हो चुकी है। अब आप इसी छंद में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के संपूर्ण चरित्र और लीलाओं का गान कीजिए।"

श्रेष्ठता का प्रमाण: अन्य भक्त केवल भगवान के दर्शन की लालसा रखते हैं, परंतु वाल्मीकि जी की करुणा इतनी विशाल थी कि ईश्वर ने स्वयं आकर उन्हें अपनी लीला लिखने का अधिकार प्रदान किया। जो भक्त संसार के हर जीव में अपने प्रभु को देखता है, वही ऐसी करुणा का अधिकारी हो सकता है।

चित्रकूट में श्रीराम-वाल्मीकि मिलन (भक्त-भगवान संवाद) : जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ १४ वर्ष के वनवास हेतु निकले, तो वे चित्रकूट क्षेत्र में पहुंचे। वहाँ वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में पधारे। यह लीला भक्त और भगवान के दिव्य मिलन की पराकाष्ठा है। श्रीराम ने महर्षि वाल्मीकि के चरणों में प्रणाम किया और अत्यंत विनम्रतापूर्वक पूछा:

"हे मुनिवर! हम पिता की आज्ञा का पालन करने वन में आए हैं। आप मुझे कोई ऐसा सुंदर और सुरक्षित स्थान बताइए जहाँ मैं, सीता और लक्ष्मण सुखपूर्वक निवास कर सकें।"

यह भगवान की लीला थी। जो संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं, जिनके भीतर अनंत कोटि ब्रह्मांड समाए हुए हैं, वे एक भक्त से पूछ रहे हैं कि "मैं कहाँ रहूँ?"

वाल्मीकि जी का अलौकिक उत्तर: १४ निवास स्थान : महर्षि वाल्मीकि मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने भगवान के इस प्रश्न में छिपे गूढ़ भाव को समझ लिया। एक श्रेष्ठ भक्त ही भगवान के वास्तविक स्वरूप को पहचान सकता है। वाल्मीकि जी ने श्रीराम से कहा:

"हे राम! आप मुझसे पूछ रहे हैं कि आप कहाँ रहें? परंतु आप पहले मुझे वह स्थान बताइए जहाँ आप नहीं हैं! तत्पश्चात मैं आपके रहने का स्थान बताऊँगा।"

इसके बाद महर्षि वाल्मीकि ने रामचरितमानस और वाल्मीकीय रामायण के अनुसार भक्त के हृदय के १४ दिव्य निवास स्थानों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम को पत्थर या लकड़ी की कुटिया की आवश्यकता नहीं है, वे तो इन स्थानों पर निवास करते हैं:

  • जिनके कान प्रभु की कथा-रूपी समुद्र को निरंतर पीते रहते हैं और कभी तृप्त नहीं होते।

  • जिनकी जीभ निरंतर राम-नाम रूपी मणिरत्न का जप करती रहती है।

  • जो दूसरों के गुणों को देखकर प्रसन्न होते हैं और दूसरों के दुखों से दुखी होते हैं।

  • जिनके हृदय में काम, क्रोध, मद, मोह और मत्सर (ईर्ष्या) का वास नहीं होता।

  • जो सबमें वासुदेव को देखते हैं और किसी से वैर नहीं रखते।

  • जो गुरु और माता-पिता के चरणों में अनन्य प्रीति रखते हैं।

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।

तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ॥

इस संवाद में महर्षि वाल्मीकि ने सिद्ध कर दिया कि वे केवल ज्ञानमार्गी मुनि नहीं हैं, बल्कि वे भक्ति-शास्त्र के महानतम आचार्य हैं। उन्होंने भगवान को ही बता दिया कि उनका असली घर ईंट-पत्थर का महल नहीं, बल्कि एक निष्छल भक्त का हृदय है।

माता सीता को आश्रय और वात्सल्य प्रदान करना

रामकथा का उत्तरकांड अत्यंत करुण और संवेदनशील है। जब जन अपवाद के कारण श्रीराम ने गर्भवती माता सीता का त्याग कर दिया और लक्ष्मण जी उन्हें तमसा नदी के तट पर छोड़कर लौट गए, तब असहाय और एकाकी सीता जी वन में रोने लगीं। जगदम्बा के रक्षक के रूप में वाल्मीकि जी

उस समय महर्षि वाल्मीकि अपनी नित्य क्रिया के लिए नदी तट पर आए थे। सीता जी का विलाप सुनकर वे वहाँ पहुंचे। महर्षि वाल्मीकि त्रिकालदर्शी थे। वे अपनी योगदृष्टि से जान गए कि यह साक्षात जगज्जननी सीता हैं और श्रीराम के चरित्र की मर्यादा बनाए रखने के लिए यह लीला घटित हुई है।

महर्षि ने सीता जी से कहा

"हे पुत्री! तुम राजा जनक की कन्या, श्रीराम की पटरानी और संपूर्ण जगत् की माता हो। तुम शोक मत करो। यह आश्रम तुम्हारा ही पिता का घर है। यहाँ तुम पूर्ण सुरक्षा, सम्मान और पवित्रता के साथ रहोगी।"

एक पिता और संत का उत्तरदायित्व: महर्षि वाल्मीकि ने सीता जी को केवल आश्रय ही नहीं दिया, बल्कि उन्हें एक पिता का वात्सल्य और संबल प्रदान किया। उन्होंने अपने आश्रम की तपस्विनियों और ऋषिपत्नियों को निर्देश दिया कि वे सीता जी की देखभाल अपनी पुत्री की भांति करें। संसार में भगवान की भक्ति तो अनेक लोग करते हैं, परंतु जो 'भक्त की भक्ति' और 'भगवती (सीता)' की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दे, वही भक्तों में शिरोमणि है। जब संपूर्ण संसार ने सीता जी का त्याग कर दिया था, तब केवल महर्षि वाल्मीकि में वह आध्यात्मिक सामर्थ्य और निर्भयता थी कि वे जगदम्बा को अपने संरक्षण में ले सकें।

लव-कुश का निर्माण, शिक्षा और रामकथा गायन की दीक्षा : महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ही माता सीता के दो तेजस्वी पुत्रों—लव और कुश का जन्म हुआ। महर्षि वाल्मीकि ने इन दोनों बालकों के जीवन-निर्माण का संपूर्ण उत्तरदायित्व अपने कंधों पर लिया। भारतीय दर्शन में महर्षि वाल्मीकि की श्रेष्ठता को सभी युगों के संतों और आचार्यों ने सहर्ष स्वीकार किया है

वैष्णव परंपरा के आचार्यों का मानना है कि वाल्मीकि जी 'अवतार संत' थे। स्वयं भगवान शिव ने पार्वती जी से कहा था कि रामायण का एक-एक अक्षर महापापों का नाश करने वाला है और वाल्मीकि जी इस रस के प्रथम पायता (आस्वादन करने वाले) हैं।

संसार में जो कवि होता है, वह प्रायः भावुक होता है परंतु ज्ञानी नहीं होता। जो ज्ञानी होता है, वह अक्सर शुष्क होता है और उसमें काव्य-रस नहीं होता। परंतु महर्षि वाल्मीकि में कवि की भावुकता, ज्ञान का विवेक और भक्त का अनन्य समर्पण—तीनों एक साथ विद्यमान थे। यही कारण है कि वे केवल कवियों में ही नहीं, बल्कि भक्तों में भी श्रेष्ठ सिद्ध होते हैं।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.