सृष्टि के रचयिता ही नहीं, भगवद्-भक्ति के भी परम मुकुटमणि हैं पितामह ब्रह्मा

ब्रह्मा जी 'आचार्य' और 'भक्त' की भूमिका में हैं। एक सच्चा भक्त कभी यह नहीं चाहता कि भगवान को छोड़कर उसकी स्वयं की पूजा हो। ब्रह्मा जी ने स्वयं भगवान श्रीहरि और श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार किया। वे जीवों को अपनी ओर आकर्षित करने के बजाय सीधे 'हरि-चरणों' की ओर भेजते हैं।
वृंदावन : सनातन परंपरा और वैदिक साहित्य में जब भी भगवान ब्रह्मा जी का नाम आता है, जनसामान्य के मन में केवल एक ही छवि उभरती है चार मुख वाले, हाथ में कमंडल और वेद धारण किए सृष्टि के नियंता और रचयिता। परंतु क्या ब्रह्मा जी केवल एक कुशल 'आर्किटेक्ट' या निर्माता मात्र हैं? वैदिक विद्वानों, परम वैष्णवों और शास्त्रों के गहन अध्ययनकर्ताओं की मानें तो भगवान अज (ब्रह्मा जी) केवल सृष्टि के कर्ता नहीं हैं, बल्कि वे ब्रह्मांड के 'प्रथम और सर्वश्रेष्ठ भक्त' (परम भागवत) भी हैं।
यहाँ तक कि भक्ति मार्ग के गूढ़ रहस्यों में वे अन्य सभी साधारण एवं असाधारण साधकों, सिद्धों और संतों में भी शिरोमणि सिद्ध होते हैं। भगवान ब्रह्मा जी के इसी दिव्य, अनुपम और निष्काम 'भक्त चरित्र' पर हमारी विशेष रिपोर्ट।
'ब्रह्म-संप्रदाय' के आद्य प्रवर्तक: जहाँ से बहती है भक्ति की धारा
भक्ति मार्ग में गुरु-परंपरा का विशेष महत्त्व है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, भक्ति और ज्ञान की जो धारा आज हम तक पहुँचती है, उसके मूल स्रोत स्वयं ब्रह्मा जी हैं। भगवान श्रीकृष्ण (श्रीहरि) ने सबसे पहले अपने हृदय से इस परम ज्ञान का उपदेश ब्रह्मा जी को ही दिया था जिसे 'चतुःश्लोकी भागवत' कहा जाता है।
"तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये..."
अर्थ: उन आदि भगवान ने ही आदि-कवि ब्रह्मा जी के हृदय में वेदज्ञान का स्फुरण किया था।
ब्रह्मा जी ने इस ज्ञान को केवल अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपने मानस पुत्र देवर्षि नारद को हस्तांतरित किया। नारद जी से यह ज्ञान महर्षि वेदव्यास जी को मिला और आगे चलकर यही परंपरा ब्रह्म माध्व-गौड़ीय संप्रदाय के रूप में प्रसिद्ध हुई, जिसने विश्व को श्रीमन्महाप्रभु चैतन्य और रूप-सनातन जैसे संत दिए। यदि ब्रह्मा जी प्रथम भक्त के रूप में इस ज्ञान को ग्रहण करके आगे न बढ़ाते, तो संतों की यह महान परंपरा ही अस्तित्व में न आती। इस नाते वे समस्त संतों के 'आदि गुरु' और मार्गदर्शक सिद्ध होते हैं।
ब्रह्मा जी का दैन्य भाव: "मैं तो केवल एक छोटा सा कीट हूँ"
सच्चे भक्त की सबसे बड़ी पहचान होती है अहंकार का अभाव और दैन्य (विनम्रता)। जब कोई साधारण मनुष्य तनिक सा ज्ञान या शक्ति प्राप्त कर लेता है, तो उसमें अहंकार आ जाता है। परंतु संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी होने, वेदों का ज्ञाता होने और करोड़ों वर्षों की आयु पाने के बाद भी ब्रह्मा जी के भीतर रंच मात्र भी अहंकार नहीं है। श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध में आता है कि जब ब्रह्मा जी से 'वत्स-हरण' (ग्वालबालों और बछड़ों को चुराने) की भूल हुई और बाद में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के ऐश्वर्य को देखा, तब वे अपने चारों मुखों से भगवान के चरणों में गिर पड़े।
उन्होंने जो स्तुति की (जिसे ब्रह्म-स्तुति कहा जाता है), वह दास्य भक्ति का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। ब्रह्मा जी प्रार्थना करते हुए कहते हैं:
"हे प्रभु! मैं तो रजोगुण से उत्पन्न हुआ एक छोटा सा जीव हूँ। मेरे चार मुख हैं और मेरा शरीर सात हाथ का है। भला मेरी क्या बिसात आपके सामने? आप तो अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी हैं।हे कृष्ण! मुझे इस ब्रह्मांड का 'ब्रह्मा' पद नहीं चाहिए। यदि आप मुझ पर कृपा करना चाहते हैं, तो मुझे वृंदावन की किसी झाड़ी, लता या भूमि की धूल बना दीजिए, ताकि आपके भक्तों के चरणों की धूल मेरे सिर पर पड़ती रहे।"
संसार का सबसे बड़ा पद 'ब्रह्मा पद' है। जिस पद को पाने के लिए बड़े-बड़े ऋषि-मुनि युगों-युगों तक तपस्या करते हैं, ब्रह्मा जी उस पद को त्यागकर भगवान के चरणों की धूली बनने की इच्छा रखते हैं। यही दैन्य भाव उन्हें साधारण साधुओं और तपस्वियों से कहीं ऊँचा उठा देता है
निष्काम कर्मयोगी और आज्ञाकारी सेवक
साधारण संत या साधक साधना के बाद मोक्ष, मुक्ति या समाधि की स्थिति में लीन होना चाहते हैं। वे संसार के झंझटों से दूर भागते हैं। परंतु ब्रह्मा जी का चरित्र देखिए वे भगवान की आज्ञा शिरोधार्य करके सृष्टि रचने के अति-जटिल और विशाल कार्य (Project) को संभालते हैं।
भगवान की आज्ञा ही सर्वोपरि: ब्रह्मा जी जानते हैं कि सृष्टि निर्माण का कार्य रजोगुण से भरा है और इसमें जीव मोह-माया में फँस सकते हैं। फिर भी, केवल और केवल 'अपने प्रभु की आज्ञा पालन' के लिए वे इस कठिन दायित्व को स्वीकार करते हैं।
अनासक्त भाव: वे सृष्टि का निर्माण करते हैं, अरबों जीवों के भाग्य लिखते हैं, परंतु कभी स्वयं को "कर्ता" नहीं मानते। वे हर कार्य को श्रीहरि की सेवा (भगवद-सेवा) मानकर करते हैं। जो साधक केवल अपनी मुक्ति चाहता है, उससे श्रेष्ठ वह भक्त है जो प्रभु की प्रसन्नता के लिए संसार के सबसे बड़े दायित्व को भी निष्काम भाव से निभाता है। यही ब्रह्मा जी को संतों में श्रेष्ठ 'कर्मयोगी भक्त' बनाता है।
शास्त्रों में प्रामाणिकता: क्यों हैं वे भक्तों में शिरोमणि?
श्रीमद्भागवत महापुराण (12.13.16) में स्पष्ट रूप से कहा गया है: "वैष्णवानां यथा शम्भुः..."
(जिस प्रकार वैष्णवों में भगवान शिव श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार ज्ञानियों और भक्तों के मूल आधार ब्रह्मा जी हैं।) इसके अतिरिक्त,'महज्जन' या 'द्वादश भागवत' (12 परम भागवत) की सूची में ब्रह्मा जी का नाम सबसे ऊपर आता है:
भगवान ब्रह्मा (अज)
भगवान शिव
देवर्षि नारद
महर्षि कपिल
स्वयंभुव मनु
प्रहलाद महाराज ... (इत्यादि) |
शास्त्रों की इस तालिका से यह स्वयं सिद्ध होता है कि प्रहलाद, नारद और जनक जैसे महान भक्तों के भी अग्रणी और मार्गदर्शक स्वयं ब्रह्मा जी ही हैं।
जब प्रभु की बाल-लीला के साक्षी बने ब्रह्मा
भक्ति की चरम पराकाष्ठा होती है—'भगवान की लीलाओं में रस लेना'। जब भगवान श्रीराम या श्रीकृष्ण इस धरती पर अवतार लेते हैं, तो ब्रह्मा जी केवल स्वर्ग में बैठकर फूल नहीं बरसाते, बल्कि वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभु की बाल-लीलाओं और दिव्य चरित्रों के रसास्वादन के लिए आतुर रहते हैं।
ब्रह्म-विमोहन लीला: जब ब्रह्मा जी ने श्रीकृष्ण के ग्वालबालों और बछड़ों का हरण किया, तो उनका उद्देश्य केवल परीक्षा लेना नहीं था, बल्कि वे देखना चाहते थे कि भगवान कैसे अपने भक्तों से प्रेम करते हैं। जब उन्होंने देखा कि श्रीकृष्ण स्वयं ही प्रत्येक ग्वालबाल और बछड़ा बन गए हैं, तो ब्रह्मा जी प्रभु की इस अति-वत्सलता को देखकर भाव-विभोर हो गए।
रासलीला में वंदना: श्रीमद्भागवत के अनुसार, रासलीला के समय भी ब्रह्मा जी आकाश मार्ग से प्रभु की इस परम मधुर लीला का दर्शन कर अश्रुपात कर रहे थे। एक ज्ञानी केवल ब्रह्म के निराकार रूप का ध्यान करता है, परंतु ब्रह्मा जी भगवान के 'सगुण-साकार' रूप और उनकी बाल-लीलाओं के अनन्य प्रेमी हैं।
क्यों कम हैं ब्रह्मा जी के मंदिर? — भक्ति का एक और गूढ़ रहस्य
समाचार माध्यमों और जनमानस में प्रायः यह प्रश्न उठता है कि 'सृष्टि के रचयिता होने के बाद भी ब्रह्मा जी के मंदिर बहुत कम (जैसे पुष्कर) क्यों हैं?' लौकिक दृष्टि से इसके पीछे शाप की कथाएँ प्रचलित हैं, परंतु आध्यात्मिक और भक्ति की दृष्टि से इसका उत्तर अत्यंत गूढ़ है भक्ति दर्शन के अनुसार ब्रह्मा जी 'आचार्य' और 'भक्त' की भूमिका में हैं। एक सच्चा भक्त कभी यह नहीं चाहता कि भगवान को छोड़कर उसकी स्वयं की पूजा हो। ब्रह्मा जी ने स्वयं भगवान श्रीहरि और श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार किया। वे जीवों को अपनी ओर आकर्षित करने के बजाय सीधे 'हरि-चरणों' की ओर भेजते हैं। इसलिए, उनका संपूर्ण जीवन स्वयं पूजा पाने के लिए नहीं, बल्कि प्रभु की पूजा सिखाने के लिए समर्पित रहा।
सर्वश्रेष्ठ भक्त का सर्वोच्च उदाहरण
संक्षेप में कहें तो, भगवान अज (ब्रह्मा जी) का चरित्र केवल एक 'सृष्टिकर्ता' तक सीमित नहीं है। वे भक्ति के उस शिखर पर विराजमान हैं जहाँ अहंकार शून्य हो जाता है।प्रभु की आज्ञा ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाती है। संसार के सबसे बड़े पद पर रहकर भी प्रभु-चरणों की धूल बनने की लालसा रहती है।
जहाँ साधारण संत और साधक अपनी तपस्या और साधना के बल पर मोक्ष की कामना करते हैं, वहीं पितामह ब्रह्मा सब कुछ पाकर भी केवल श्रीकृष्ण-भक्ति और दास्य-भाव की याचना करते हैं। उनका यह अलौकिक दैन्य, अनन्य प्रेम, और निष्काम सेवा-भाव ही उन्हें ब्रह्मांड के समस्त भक्तों, सिद्धों और संतों में 'परम श्रेष्ठ और सर्वोपरि' सिद्ध करता है।
