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·Bhatkmal·By प्रमोद कुमार शुक्ला

महर्षि वेदव्यास: ज्ञान के क्षितिज और भक्ति के परम आदर्श

महर्षि वेदव्यास: ज्ञान के क्षितिज और भक्ति के परम आदर्श

व्यास जी की लीलाएँ हमें सिखाती हैं कि चाहे मनुष्य कितना भी बड़ा विद्वान, तपस्वी या शास्त्रज्ञ क्यों न बन जाए, यदि उसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम, करुणा, नम्रता और अनन्य शरणागति नहीं है, तो उसका सारा ज्ञान व्यर्थ है।

भारतीय संस्कृति, दर्शन और सनातन परंपरा में महर्षि वेदव्यास का स्थान सर्वोच्च आचार्यों और ज्ञानियों में परिगणित होता है। प्रायः संसार उन्हें एक अद्वितीय ग्रंथकार, महाकाव्य ‘महाभारत’ के रचयिता, अठारह पुराणों के संकलनकर्ता और वेदों के विभाग करने वाले ‘ज्ञान-अवतार’ के रूप में ही देखता है। परंतु व्यास जी का व्यक्तित्व केवल शुष्क ज्ञान, कर्मकांड या दार्शनिक मीमांसा तक सीमित नहीं है; वे ज्ञान के उत्तुंग शिखर होने के साथ-साथ भक्ति रसायन के परम रसिक और भक्तों की श्रेणी में अग्रणी भी हैं।

व्यास जी का जीवन यह सिद्ध करता है कि सच्चा ज्ञान अंततः पराभक्ति (सर्वोच्च प्रेम) में ही विश्राम पाता है। ज्ञान जब अपने चरम पर पहुँचता है, तो वह शुष्क तर्क न रहकर ईश्वर के चरणों में अनन्य अनुराग बन जाता है। इस विस्तृत लेख में हम महर्षि व्यास के 'भक्त रूप' का अनुशीलन करेंगे और उन लीलाओं व प्रसंगों को समझेंगे जो उन्हें भक्तों की श्रेणी में श्रेष्ठ और मूर्धन्य साबित करते हैं।

अवतरण और पृष्ठभूमि: ज्ञान-अवतार में भक्ति का अंकुरण

श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान के चौबीस अवतारों का वर्णन आता है, जिसमें महर्षि व्यास को भगवान श्रीहरि का ही अंश (ज्ञान-अवतार) स्वीकार किया गया है:

"ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात्। वेदवृक्षस्य शाखोन्नि दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः॥"

महर्षि पराशर और माता सत्यवती के योग से प्रकट हुए कृष्णद्वैपायन व्यास का जन्म ही लोक-कल्याण के लिए हुआ था। उन्होंने वेदों का विभाजन कर साम, ऋग्, यजुर और अथर्व के रूप में चार भाग बनाए, जिससे मंदबुद्धि जीव भी वेद-ज्ञान को सुलभता से समझ सकें। इसके पश्चात् उन्होंने वेदांतसूत्र की रचना की और महाभारत जैसा महान ग्रंथ रचा, जिसे 'पंचम वेद' कहा जाता है। परंतु इतने विराट साहित्य के निर्माण के बाद भी व्यास जी के हृदय में एक अजीब सी तृप्ति और अशांति बनी हुई थी। यहीं से उनके ‘साधक से सिद्ध भक्त’ बनने की यात्रा और उनकी भक्ति लीलाओं का प्राकट्य होता है।

व्यास जी का संताप और देवर्षि नारद का आगमन: ज्ञान से भक्ति की ओर मोड़

यह प्रसंग महर्षि व्यास के भक्ति-चरित्र का आधार स्तंभ है। अठारह पुराण, वेदांतसूत्र और महाभारत जैसे विशाल ग्रंथ रचने के बाद भी सरस्वती नदी के तट पर स्थित अपने आश्रम में व्यास जी अत्यंत खिन्न और उदास बैठे थे। उनके मन में विचार आ रहा था

"मैंने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों का निरूपण कर दिया। मैंने वेदों के अर्थ को सुगम बनाया। फिर भी मेरा अंतःकरण प्रसन्न क्यों नहीं है? मेरी आत्मा में यह शून्यता कैसी?" इसी समय वहाँ स्वेच्छा से भ्रमण करते हुए देवर्षि नारद का आगमन हुआ। व्यास जी ने देवर्षि का यथाविधि पूजन किया और अपनी मनःस्थिति उनके सम्मुख रखी।

देवर्षि नारद ने व्यास जी की उदासी का मूल कारण बताते हुए कहा: "हे व्यासजी! आपने महाभारत आदि ग्रंथों में धर्म, अर्थ, काम आदि का बहुत विस्तार से वर्णन किया, परंतु भगवान श्रीकृष्ण के केवल यश, उनकी लीलाओं और अनन्य भक्ति का जैसा निष्काम निरूपण होना चाहिए था, वैसा नहीं किया। जिस वाणी में भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन नहीं होता, वह वाणी कौओं के विश्राम-स्थल के समान मानी जाती है, जबकि भक्तजन हंस की भाँति प्रभु-गुणरूपी मानसरोवर में रमण करते हैं।"

यहाँ व्यास जी की महानता और भक्ति-श्रेष्ठता दिखाई देती है। वे कोई साधारण विद्वान नहीं थे जो अहंकार में आकर नारद जी की बात को टाल देते। उन्होंने पूर्ण नम्रता के साथ स्वीकार किया कि केवल ज्ञान और धर्म का निरूपण जीव को पूर्ण शांति नहीं दे सकता। जब तक उसमें ‘भगवद्-रसानुभूति’ न हो, तब तक सब अधूरा है। व्यास जी ने अपने समस्त अर्जित ज्ञान को प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया और अनन्य भक्ति का मार्ग चुन लिया।

श्रीमद्भागवत का प्राकट्य: व्यास जी की पराभक्ति का चरमोत्कर्ष

देवर्षि नारद के उपदेश के पश्चात् महर्षि व्यास ने समाधि भाषा में प्रवेश किया। उन्होंने भक्ति योग के माध्यम से अपने अंतःकरण को पूर्णतः भगवान श्रीहरि में लीन कर दिया। समाधि अवस्था में उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण और उनकी आह्लादनी शक्ति (राधा-तत्व एवं भक्ति) के प्रत्यक्ष दर्शन हुए। इस अलौकिक अनुभूति के बाद व्यास जी ने ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ की रचना की। यह ग्रंथ व्यास जी की ज्ञान-निष्ठा का नहीं, बल्कि उनकी काष्ठा-भक्ति (पराभक्ति) का प्रमाण है।

भागवत रचना में व्यास जी का 'भक्त हृदय'

  • निष्काम भक्ति का निरूपण: भागवत के प्रारंभ में ही व्यास जी घोषणा करते हैं—‘धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र’ अर्थात इस ग्रंथ में कपट-रहित, निष्काम परम धर्म (केवल और केवल भगवान से प्रेम) का वर्णन है।

  • सगुण-साकार रस की प्रतिष्ठा: ज्ञानी व्यास यहाँ पूर्णतः रसिया भक्त बन जाते हैं। वे गोपियों के प्रेम, नन्दबाबा के वात्सल्य, और श्रीदामा आदि सखाओं के सख्य भाव का ऐसा सजीव वर्णन करते हैं कि स्वयं भगवान भी इस ग्रंथ के वशीभूत हो जाते हैं।

  • भक्तों की महिमा का गान: व्यास जी ने इस ग्रंथ में स्वयं से भी बड़ा स्थान भगवान के भक्तों (ध्रुव, प्रहलाद, अमरीष, वृत्रासुर, उद्धव और गोपियों) को दिया। यह एक सच्चे भक्त का लक्षण है कि वह अपने प्रभु के भक्तों का यश गाने में परम आनंद का अनुभव करता है।

वे लीलाएँ जो व्यास जी को 'श्रेष्ठ भक्त' सिद्ध करती हैं

महर्षि व्यास केवल ग्रंथ रचयिता नहीं थे, उनके जीवन में ऐसी अनेक लीलाएँ और घटनाएँ घटीं जो यह सिद्ध करती हैं कि वे ज्ञानियों में ही नहीं, अपितु भक्तों की श्रेणी में भी अत्यंत श्रेष्ठ हैं। जब व्यास जी समाधिस्थ हुए, तो उन्होंने देखा कि संपूर्ण सृष्टि माया के वशीभूत होकर त्रिगुणों के चक्र में पिस रही है। परंतु उस माया का नियंता कौन है? स्वयं भगवान श्रीहरि।

"भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितोऽमले। अपश्यत्पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयम्॥"

व्यास जी ने देखा कि भक्ति ही एकमात्र ऐसा साधन है जो जीव को माया के बंधन से मुक्त कर सकती है। ज्ञानी केवल ब्रह्म की लीनता चाहता है, परंतु भक्त भगवान की सेवा और उनकी लीलाओं का आनंद चाहता है। व्यास जी ने अपने समाधि-दर्शन से यह सिद्ध कर दिया कि ज्ञान का अंतिम फल केवल भक्ति ही है। उन्होंने स्वयं को भगवान का अनन्य दास मानकर अपनी समाधि को भक्ति-रस में परिवर्तित कर दिया।

काशी में व्यास जी का कोप और विश्वनाथ का भक्ति-पाठ

एक समय महर्षि व्यास अपने शिष्यों के साथ भगवान शिव की नगरी काशी में निवास कर रहे थे। वहाँ उनकी भक्ति और धैर्य की एक अद्भुत परीक्षा हुई। व्यास जी ने कई दिनों तक काशी में भिक्षाटन किया, परंतु भगवान विश्वनाथ की लीला से उन्हें और उनके शिष्यों को किसी भी घर से भिक्षा नहीं मिली। भूखे-प्यासे व्यास जी को अत्यंत क्रोध आ गया। क्रोध के आवेश में आकर व्यास जी काशी नगरी को सरापने (शाप देने) उद्यत हो गए:

"इस काशी नगरी में लोगों की विद्या, धन और मोक्ष का नाश हो जाए!"

तभी माता पार्वती और भगवान शिव एक ब्राह्मण दंपत्ति के रूप में प्रकट हुए। माता पार्वती ने व्यास जी को आदरपूर्वक भोजन के लिए बुलाया और स्वादिष्ट भोजन कराकर उनकी क्षुधा शांत की। इसके बाद भगवान शिव ने प्रकट होकर व्यास जी से कहा "हे व्यास! तुम ज्ञान के सागर हो, परंतु क्षुधा के एक छोटे से वेग में तुमने धैर्य खो दिया और मेरी प्रिय काशी को शाप देने चले? जिस हृदय में पूर्ण भक्ति और शरणागति होती है, वहाँ कभी क्रोध और अधीरता का वास नहीं होता।"

भगवान शिव की इस उक्ति ने व्यास जी की आँखें खोल दीं। उन्हें ग्लानि हुई कि ज्ञानी होने का सूक्ष्म अहंकार अभी भी उनके भीतर बचा हुआ था। व्यास जी ने तुरंत भगवान शिव और माता पार्वती के चरणों में गिरकर क्षमा या मांगी और प्रार्थना की कि उन्हें काशी से निष्कासित न किया जाए। भगवान शिव ने मुस्कुराकर कहा—"तुम काशी में व्यासकासी (व्यासशैली) के रूप में रहोगे, परंतु तुम्हारा वास्तविक निवास केवल भगवद्-भक्ति में ही होगा।" इस लीला के माध्यम से व्यास जी ने संपूर्ण संसार को यह सिखाया कि केवल ज्ञान मनुष्य को अभिमानी बना सकता है, परंतु जब तक उसमें शिव-विष्णु भक्ति का नम्र भाव नहीं आता, तब तक वह पूर्ण नहीं होता। व्यास जी ने स्वयं को नीचा मानकर प्रभु की भक्ति को सर्वोपरि सिद्ध किया।

महाभारत युद्ध के पश्चात् युधिष्ठिर को संंत्वना और 'हरि-नाम' की महत्ता

महाभारत के भीषण युद्ध के बाद चारों ओर शोक का वातावरण था। लाखों योद्धा मारे गए थे। धर्मराज युधिष्ठिर अत्यंत ग्लानि और शोक में डूब गए थे। वे स्वयं को इस महाविनाश का दोषी मान रहे थे और संन्यास लेने की सोच रहे थे। बड़े-बड़े ऋषियों और मुनियों के वेदांत और नीति-शास्त्र के उपदेश भी युधिष्ठिर के संताप को मिटा न सके। तब महर्षि व्यास वहाँ पधारे। व्यास जी ने युधिष्ठिर से कहा:

"हे राजन्! कर्म, धर्म और राजनीति का ज्ञान मनुष्य को केवल कर्तव्य का बोध कराता है, परंतु शोक और मोह से मुक्ति केवल 'श्रीहरि' के चरणों में आत्म-समर्पण और उनके नाम-संकीर्तन से ही मिलती है।"

व्यास जी ने युधिष्ठिर को भीष्म पितामह के पास जाने का परामर्श दिया और स्वयं भी उनके साथ गए। भीष्म पितामह के माध्यम से व्यास जी ने संसार को ‘विष्णु सहस्रनाम’ (भगवान विष्णु के एक हजार नाम) का अनमोल रत्न प्रदान करवाया। व्यास जी का यह आचरण दिखाता है कि वे केवल शुष्क उपदेशक नहीं थे, बल्कि वे जानते थे कि दुःखी हृदय का एकमात्र मलहम ‘हरि-भक्ति’ और ‘हरि-नाम’ ही है। उन्होंने युधिष्ठिर को ज्ञान के शुष्क सिद्धांतों में न उलझाकर प्रभु के शरणारविंद में भेज दिया।

व्यास पीठ और व्यास पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) का आध्यात्मिक मर्म

सनातन धर्म में व्यास जी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आषाढ़ पूर्णिमा को ‘गुरु पूर्णिमा’ या ‘व्यास पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है। जब भी कोई कथावाचक, संत या आचार्य भगवान की कथा सुनाने के लिए बैठता है, तो उस आसन को ‘व्यास पीठ’ कहा जाता है। इसका आध्यात्मिक अर्थ यह है कि: कथा कहने वाला व्यक्ति अपने अहंकार को मिटाकर स्वयं व्यास जी का प्रतिनिधि बनता है, और व्यास जी का प्रतिनिधि वही हो सकता है जिसके हृदय में व्यास जी जैसी अनन्य भगवद्-भक्ति हो।

व्यास पीठ केवल ज्ञान का आसन नहीं है, यह भक्ति-रस के प्रवाह का आसन है। व्यास जी ने स्वयं को इतना नम्र बना लिया था कि वे हर भक्त के हृदय में व्यास रूप से विराजमान होकर प्रभु-लीला का गान करते हैं।

यदि महर्षि व्यास न होते, तो आज संसार के पास भक्ति का इतना विशाल भंडार न होता। उन्होंने भारतीय जनमानस को भक्ति के कई स्वरूप दिए:

  • श्रीमद्भागवत महापुराण: यह भक्ति-साहित्य का मुकुटमणि है। इसमें नौ प्रकार की भक्ति (नवधा भक्ति) का जैसा विशद वर्णन है, वैसा कहीं नहीं मिलता।

  • अठारह पुराण: इनमें विभिन्न देवी-देवताओं (शिव, विष्णु, देवी, गणेश, सूर्य) की भक्ति का निरूपण करके व्यास जी ने जन-जन के लिए उपासना का मार्ग खोला।

  • महाभारत एवं भगवद्गीता: महाभारत के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता को समाविष्ट करके व्यास जी ने कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का त्रिवेणी संगम प्रस्तुत किया। गीता के १२वें अध्याय (भक्तियोग) और १८वें अध्याय के अंतिम श्लोकों (सर्वधर्मान्परित्यज्य...) में व्यास जी ने भक्ति को ही सर्वोपरि साधन घोषित किया है।

श्रेष्ठ भक्तों में व्यास जी का स्थान

संक्षेप में कहा जाए तो महर्षि वेदव्यास जी का भक्ति-चरित्र अत्यंत दिव्य, प्रेरणादायी और वंदनीय है। प्रायः लोग व्यास जी को केवल एक महर्षि, लेखक या ज्ञानी मानते हैं, परंतु वास्तव में वे ‘भक्तों के सिरमौर’ हैं। वे उस ज्ञानी के प्रतीक हैं जो अपने ज्ञान के अभिमान को मिट्टी में मिलाकर प्रभु के चरणों की धूल बन जाता है।

  • जब उन्होंने वेद बाँटे, तो वे कर्मकांडी थे।

  • जब उन्होंने वेदांतसूत्र लिखा, तो वे परम ज्ञानी थे।

  • परंतु जब उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से श्रीमद्भागवत की रचना की और श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं व गोपी-प्रेम का वर्णन किया, तब वे 'परम भागवत भक्त' बन गए।

व्यास जी की लीलाएँ हमें सिखाती हैं कि चाहे मनुष्य कितना भी बड़ा विद्वान, तपस्वी या शास्त्रज्ञ क्यों न बन जाए, यदि उसके हृदय में भगवान के प्रति प्रेम, करुणा, नम्रता और अनन्य शरणागति नहीं है, तो उसका सारा ज्ञान व्यर्थ है। महर्षि व्यास का जीवन इस बात का अमर प्रमाण है कि ज्ञान का सर्वोत्कृष्ट फल केवल और केवल ‘श्रीहरि-चरणों में अनन्य भक्ति’ ही है। ऐसे परम वैष्णव, ज्ञान-भास्कर और भक्ति-रस-शिरोमणि महर्षि वेदव्यास जी के चरणों में बारंबार प्रणाम है।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.