जब कान्हा के दर्शन की आशा में कैलाश छोड़ ब्रज आ बैठे महादेव जानिए आशेश्वर मंदिर का अनोखा इतिहास

भगवान शिव जिस स्थान पर बैठकर दर्शन की 'आशा' में प्रतीक्षा कर रहे थे, उसी स्थान को आशेश्वर कहा गया।
ब्रजमंडल के अंतर्गत नंदगांव (मथुरा, उत्तर प्रदेश) में स्थित श्री आशेश्वर महादेव मंदिर वैष्णव और शैव संप्रदायों के मधुर मिलन का एक अद्वितीय और अत्यंत पवित्र प्रतीक है। भगवान शिव, जो कि साक्षात 'वैष्णवानां यथा शंभुः' (वैष्णवों में श्रेष्ठ) हैं, उनके नंदगांव आगमन और वहां स्थापित होने की कथा सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में वर्णित है। नीचे आशेश्वर महादेव मंदिर का संपूर्ण इतिहास, पौराणिक कथाएं, उत्पत्ति, आचार्य परंपरा और राजवंशों के योगदान का प्रमाणिक विवरण प्रस्तुत है।
पौराणिक पृष्ठभूमि एवं उत्पत्ति की कथा
श्री आशेश्वर महादेव की उत्पत्ति द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी है। भगवान शिव के मन में अपने आराध्य बालकृष्ण के दर्शन की तीव्र अभिलाषा (आशा) जागी, जिसके कारण इस स्थान का नाम 'आशेश्वर' पड़ा। गर्ग संहिता (नन्दमहोत्सव खण्ड) में वर्णन आता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य गोकुल (और बाद में नंदगांव) में हुआ, तब महादेव समाधि से जागृत होकर बालकृष्ण के बाल रूप का दर्शन करने कैलाश से ब्रज आए।
शिवजी एक जटाधारी, भस्मधारी अघोरी साधु का रूप धारण करके नंद भवन के द्वार पर पहुंचे। माता यशोदा ने जब द्वार पर एक भयानक रूप वाले साधु को देखा, तो वे डर गईं। उन्हें लगा कि इस रूप को देखकर उनका लाला (कृष्ण) डर जाएगा और नजर लग जाएगी। इसलिए माता यशोदा ने शिवजी को भीतर आने और बालक के दर्शन करने से मना कर दिया।
माता यशोदा ने उन्हें दान-दक्षिणा देनी चाही, लेकिन शिवजी ने कहा, "मुझे धन-दौलत नहीं चाहिए, मुझे केवल आपके लाला के दर्शन करने हैं। निराश होकर शिवजी नंदगांव की पहाड़ी के नीचे, उत्तर-पूर्व दिशा में एक सरोवर (वर्तमान 'आशेश्वर सरोवर ') के समीप जाकर बैठ गए और ध्यानमग्न हो गए। उन्होंने प्रण लिया कि जब तक प्रभु दर्शन नहीं देंगे, वे वहां से नहीं हिलेंगे।
भगवान शिव जिस स्थान पर बैठकर दर्शन की 'आशा' में प्रतीक्षा कर रहे थे, उसी स्थान को आशेश्वर कहा गया। बाद में, बालकृष्ण जोर-जोर से रोने लगे और किसी भी उपाय से चुप नहीं हुए। तब माता यशोदा की सखी ने माता यशोदा से कहा कि द्वार पर आए उस सिद्ध महात्मा को लौटाने के कारण ही लाला रो रहा है। माता यशोदा ने तुरंत शिवजी को ससम्मान बुलवाया।
जैसे ही शिवजी ने कृष्ण को देखा और कृष्ण ने शिवजी को देखा, दोनों मुस्कुरा उठे और कृष्ण का रोना बंद हो गया। कृतार्थ होकर शिवजी पुनः उसी स्थान पर आकर लिंग रूप में स्थापित हो गए, ताकि वे नित्य नंदगांव में रहकर कृष्ण लीलाओं का दर्शन कर सकें।
आशेश्वर कुंड (सरोवर) का प्राचीन इतिहास और महत्व
मंदिर के परिसर से बिल्कुल सटा हुआ 'आशेश्वर कुंड' (या आशेश्वर सरोवर) स्थित है, जिसका जल आज भी गहरा पन्ना हरा (Emerald Green) दिखाई देता है पौराणिक काल में इस स्थान को नंद साम्राज्य की उत्तर-पूर्वी सीमा माना जाता था। ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान शिव माता यशोदा द्वारा बालकृष्ण के दर्शन से मना किए जाने पर निराश हुए, तो वे इसी कुंड के किनारे शमी वृक्षों की ओट में आकर बैठ गए थे। शिवजी की आँखों से बहे विरह-अश्रुओं और उनकी तपस्या के तेज से यह स्थल 'कुंड' के रूप में और अधिक पवित्र हो गया।
पर्जन्य महाराज (श्रीकृष्ण के दादा) की तपस्या
'ब्रजभक्ति विलास' और 'गर्ग संहिता' के अनुसार, नंद बाबा के पिता (भगवान श्रीकृष्ण के दादा) महाराज पर्जन्य ने इसी कुंड के किनारे और आशेश्वर महादेव की शरण में संतान प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की थी।
महादेव ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पाँच पुत्रों (उपनांद, अभिनंद, नंद, सुनंद और नंदन) का वरदान दिया, जिनमें से 'नंद बाबा' के घर स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ। प्राचीन समय से ही मान्यता है कि इस कुंड में स्नान कर आशेश्वर महादेव के दर्शन करने से निःसंतान दंपतियों की गोद भरती है और सभी आशाएं पूर्ण होती हैं।

यदुवंश और जाटों का संबंध
नंदगांव के राजसी जीर्णोद्धार के समय (जाट राजाओं के शासनकाल में) मंदिर और मुख्य नंद भवन परिसर में पत्थर के शिलालेख (Stone Inscriptions) उत्कीर्ण करवाए गए थे। इस शिलालेख में भरतपुर के सिंसिनवार जाट राजवंश की वंशावली को 'यदुवंश' (कृष्ण के वंश) से जोड़कर प्रामाणिक रूप से लिखा गया है।
ऐतिहासिक रूप से, ब्रज के जाट स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र 'वज्रनाभ' और यदुवंशियों का प्रत्यक्ष वंशज मानते हैं। ब्रिटिश पुरातत्वविद् एफ. एस. ग्रोउस (F. S. Growse) ने अपनी पुस्तक 'Mathura: A District Memoir' (1874) में नंदगांव और इसके आसपास के शिलालेखों का व्यापक विवरण दिया है।
आचार्य परंपरा और संप्रदाय
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से, नंदगांव और आशेश्वर महादेव का क्षेत्र गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय श्री रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी की भजन स्थली से गहराई से जुड़ा हुआ है। 16वीं शताब्दी में चैतन्य महाप्रभु के शिष्य श्री सनातन गोस्वामी और श्री रूप गोस्वामी ने ब्रज के लुप्त तीर्थों का जीर्णोद्धार किया। सनातन गोस्वामी और श्री रूप गोस्वामी ने नंदगांव की चरण पहाड़ी और आशेश्वर महादेव के समीप रहकर दीर्घकाल तक भजन किया था।
मंदिर की सेवा-पूजा पारंपरिक रूप से स्थानीय नागा संन्यासी या दसनाम जूना अखाड़े के संतों और ब्रजवासी गोस्वामियों (नंदगांव के सेवायत) के समन्वय से चलती आई है। वैष्णव संप्रदाय के संत भी इस शिव मंदिर को 'गोपीश्वर' की भांति पूजते हैं, क्योंकि बिना शिव की आज्ञा के ब्रज रस में प्रवेश असंभव माना जाता है।
राजपरिवारों का इतिहास और जीर्णोद्धार
नंदगांव का आधुनिक इतिहास और यहां के मंदिरों का विशाल स्वरूप मुख्य रूप से जयपुर राजघराने और भरतपुर (जाट) राजवंश के संरक्षण में विकसित हुआ। 18वीं शताब्दी में भरतपुर के महाराजाओं ने ब्रज संस्कृति और मंदिरों के पुनरुत्थान में सबसे बड़ी भूमिका निभाई महाराजा सूरजमल ने नंदगांव को अपनी विशेष श्रद्धा का केंद्र बनाया।
उन्होंने नंद भवन (नंद किला) के साथ-साथ तलहटी में स्थित आशेश्वर महादेव मंदिर के आसपास घाटों और कुंडों का जीर्णोद्धार कराया। महाराजा जवाहर सिंह और रूप सिंह भरतपुर राजपरिवार के इन शासकों ने मंदिर के रख-रखाव के लिए भूमि दान (माफ़ी भूमि) दी थी, जिससे मंदिर की दैनिक पूजा-अर्चना सुचारू रूप से चल सके। जयपुर के कछवाहा राजा (विशेषकर सवाई जयसिंह) गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के परम अनुयायी थे। उन्होंने सनातन गोस्वामी के भजनों से जुड़े इस क्षेत्र (नंदगांव और आशेश्वर) के पुजारियों और संतों को संरक्षण प्रदान किया तथा मंदिर की सुरक्षा हेतु सैनिक व्यवस्था व जागीरें सुनिश्चित की थीं
मंदिर से जुड़ी अन्य लोक-कथाएं एवं मान्यताएं
नंद बाबा की कांवड़: एक लोक-कथा के अनुसार, नंद बाबा स्वयं प्रतिवर्ष कांवड़ लाकर या सावन के महीने में आशेश्वर महादेव का जलाभिषेक करते थे। इसी कारण ब्रजवासी आज भी भगवान शिव को नंदगांव का 'कोतवाल' (रक्षक) मानते हैं।
इच्छा पूर्ति शिवलिंग: 'आशेश्वर' का एक अर्थ यह भी है कि जो भक्तों की सभी 'आशाएं' (मनोकामनाएं) पूरी करते हैं। सावन मास और शिवरात्रि पर यहां विशाल मेला लगता है, जहां ब्रज के गोप-गोपियां और देश-विदेश के श्रद्धालु मन्नतें मांगते हैं।
प्रमाणिक ग्रंथ और संदर्भ सूची (References)
आशेश्वर महादेव और नंदगांव के इस इतिहास की पुष्टि निम्नलिखित प्रामाणिक ग्रंथों और ऐतिहासिक अभिलेखों से होती है:
गर्ग-संहिता (महामुनि गर्ग विरचित): नन्दमहोत्सव और ब्रज यात्रा प्रसंग में शिव-कृष्ण मिलन का मुख्य स्रोत।
पद्म पुराण (पाताल खण्ड - ब्रज महिमा): मथुरा मंडल के अंतर्गत नंदगांव के आशेश्वर महादेव को ब्रज के दिक्पाल/रक्षक के रूप में वर्णित किया गया है।
भक्ति-रत्नाकर (श्री नरहरि चक्रवर्ती कृत): 17वीं-18वीं शताब्दी का यह ग्रंथ ब्रज के तीर्थों का भौगोलिक और ऐतिहासिक विवरण देता है। इसमें सनातन गोस्वामी की नंदगांव और आशेश्वर महादेव के समीप भजन स्थली का स्पष्ट उल्लेख है।
मथुरा: ए डिस्ट्रिक्ट मेमोइर (Mathura: A District Memoir - एफ. एस. ग्रोउस, 1874):ब्रिटिश काल के इस आधिकारिक गजेटियर में नंदगांव के इतिहास, भरतपुर के जाट राजाओं द्वारा किए गए निर्माण और आशेश्वर महादेव मंदिर की स्थिति का ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण है
ब्रज भक्ति विलास (श्री नारायण भट्ट कृत):ब्रज के लुप्त तीर्थों की प्रामाणिक सूची में आशेश्वर महादेव का नाम प्रमुखता से दर्ज है।
'ब्रज का इतिहास' (डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल): इस ऐतिहासिक शोध ग्रंथ में भरतपुर के जाट राजाओं द्वारा नंदगांव, बरसाना और गोवर्धन के कुंडों के जीर्णोद्धार की तिथियों और शिलालेखों का ऐतिहासिक विश्लेषण किया गया है
Related News
- इतिहास कुशल बिहारी जी मंदिर जिसे बनने के लिए मथुरा से बरसाना तक चलाई गई ट्रेन
- वृषभानुपुर का वैभव एतिहास एवं आध्यात्मिकता का केंद्र बिंदु (भाग 2)
- श्री राधा संकेत बिहारी जी मन्दिर का इतिहास एवं जीवंत परंपराएं
- श्रीकृष्ण का कोकिला स्वरूप और शनिदेव की तपोस्थली अद्भुत है कोकिलावन का इतिहास!
- कृष्ण युग का साक्षी नंदभवन जहां आज भी दिखता है नंदबाबा का वैभव
