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·84 कोस धाम·By प्रमोद कुमार शुक्ला

वृषभानुपुर का वैभव एतिहास एवं आध्यात्मिकता का केंद्र बिंदु

वृषभानुपुर का वैभव एतिहास एवं आध्यात्मिकता का केंद्र बिंदु

भगवान श्री कृष्ण के गोलोक गमन के पश्चात ब्रजमंडल की भौतिक लीलास्थली राजा परीक्षित के संरक्षण में आई।

ब्रजमंडल: बरसाना धाम

ब्रजमंडल के केंद्र में स्थित श्री बरसाना धाम सनातन वैष्णव परंपरा की परात्पर चेतना का साक्षात् विग्रह है। भानगढ़ (ब्रह्मगिरी) के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित श्री राधा रानी मंदिर, जिसे संपूर्ण आर्यावर्त में 'लाड़ली जी की ऊँची अटारी' अथवा 'श्रीजी मंदिर' कहा जाता है, महज़ एक पाषाण-निर्मित देवालय नहीं है। यह मंदिर पाँच सहस्र वर्षों (5000 वर्ष) के पौराणिक घटनाक्रमों, मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के पुनर्जागरण, मुगलों और अफ़गानों के भीषण सैन्य प्रतिघातों, अद्वितीय राजपूत-जाट स्थापत्य कला और रसिकाचार्यों की अटूट गुरु-परंपरा का एक जीवंत, प्रामाणिक और शाश्वत महा-दस्तावेज़ है।

ब्रह्मगिरी का प्राकट्य : भौगोलिक एवं पौराणिक उत्पत्ति

पद्म पुराण (पाताल खंड) तथा गर्गाचार्य कृत 'गर्ग संहिता' (गोलोक खंड) में स्पष्ट उल्लेख है कि द्वापर युग में भगवान श्रीहरि के कृष्णावतार से पूर्व, ब्रह्मा जी ने गोलोक धाम के अधिष्ठाता और आद्याशक्ति श्री राधा जी की पार्थिव लीलाओं का साक्षी बनने की इच्छा प्रकट की। ब्रह्मा जी ने प्रार्थना की: "हे प्रभु! जब आप ब्रजमंडल में अपनी रस लीलाएं रचेंगे, तब आपके और श्रीजी के चरण कमलों की धूलि सीधे पृथ्वी पर न पड़े। मुझे वह आसन बनने का सौभाग्य दें।"

भगवान की अनुमति पाकर ब्रह्मा जी ने स्वयं को चार मुखों वाले एक विशाल पर्वत खंड के रूप में स्थापित कर लिया। यही कारण है कि बरसाना का मुख्य पर्वत 'ब्रह्मगिरी' कहलाता है। ब्रह्मगिरी पर्वत के चार प्रमुख शिखर हैं, जिन्हें ऐतिहासिक ग्रंथों में ब्रह्मा जी के चार मुखों का साक्षात् स्वरूप माना गया है:

  • 1. भानगढ़: यह मुख्य और सर्वोच्च शिखर है, जहाँ राजा वृषभानु का महल वर्तमान लाड़ली जी का मुख्य मंदिर (ऊँची अटारी) सुशोभित है।

  • 2. मानगढ़: यह वह स्थल है जहाँ श्री राधा रानी का 'मान' (रूठना) हुआ था और जहाँ सुप्रसिद्ध मान मंदिर स्थित है।

  • 3. दानगढ़: यह वह घाटी और शिखर है जहाँ भगवान श्री कृष्ण गोपियों से छाछ और माखन का 'दान' (महसूल या टैक्स) लिया करते थे।

  • 4. विलासगढ़: यह श्री राधा-कृष्ण की जल-क्रीड़ा, झूला-लीला और एकांत रास-विलास का स्थल है।

रावल से बरसाना और महावन से नंदगांव

'हरिवंश पुराण' और 'श्रीमद्भागवत महापुराण' के समकालीन ब्रज इतिहास के ग्रंथों के अनुसार, मथुरा के राजा कंस के अत्याचार अत्यधिक बढ़ गए थे। पूतना, शकटासुर, और तृणावर्त जैसे महाभयानक राक्षसों के गोकुल पर आक्रमण के कारण नंद बाबा ने अपने संपूर्ण गोप-समाज के साथ गोकुल छोड़कर नंदीश्वर पर्वत (नंदगाँव) जाने का निर्णय लिया।

चूंकि नंद महाराज और राजा वृषभानु परम मित्र थे, अतः सुरक्षा और आपसी सामंजस्य को ध्यान में रखते हुए राजा वृषभानु ने भी रावल गाँव छोड़ दिया। वे अपने समस्त गो-धन, प्रजा और मंत्रियों के साथ नंदीश्वर पर्वत के पास स्थित इस ब्रह्मगिरी पर्वत पर आकर बस गए। राजा वृषभानु के नाम पर ही इस नव-स्थापित नगर का नाम 'वृषभानुपुर' पड़ा। यही 'वृषभानुपुर' समय के साथ अपभ्रंश होकर पहले 'बरसानौ' और वर्तमान में 'बरसाना' के नाम से जगतप्रसिद्ध हुआ।

द्वापर युग की समाप्ति और विग्रहों का लुप्तप्राय

भगवान श्री कृष्ण के गोलोक गमन के पश्चात ब्रजमंडल की भौतिक लीलास्थली राजा परीक्षित के संरक्षण में आई। द्वापर युग की समाप्ति के पश्चात ऐतिहासिक साक्ष्यों (जैसे वाराह पुराण और स्कंद पुराण) के अनुसार, श्री कृष्ण के प्रपौत्र (पोते के बेटे) महाराज वज्रनाभ को द्वारका से लाकर मथुरा का राजा बनाया गया था।

महर्षि शांडिल्य के मार्गदर्शन में राजा वज्रनाभ ने ब्रज के लुप्त तीर्थों की खोज की। उन्होंने ही सर्वप्रथम ब्रह्मगिरी पर्वत के भानगढ़ शिखर पर श्री राधा और कृष्ण के विग्रहों की स्थापना कर एक भव्य प्रस्तर (पत्थर) के मंदिर का निर्माण करवाया था।

ईसा की पाँचवीं शताब्दी (गुप्त साम्राज्य के पतन) के बाद और विशेष रूप से 11वीं से 14वीं शताब्दी के क्रूर तुर्क-इस्लामिक आक्रमणों (महमूद गज़नवी, कुतुबुद्दीन ऐबक और अलाउद्दीन खिलजी) के दौरान, संपूर्ण मथुरा और ब्रज क्षेत्र भयंकर रूप से उजाड़ दिया गया।

मंदिरों को नष्ट किए जाने के भय से, तत्कालीन पुजारियों और वैष्णवों ने लाड़ली जी और लाड़ली लाल के मूल विग्रहों को ब्रह्मगिरी पर्वत की घनी झाड़ियों और कंदराओं (गुफाओं) के भीतर भू-गर्भ में सुरक्षित छिपा दिया। इसके बाद सदियों तक बरसाना का यह पर्वत एक बीहड़, अगम्य और हिंसक पशुओं से युक्त घने जंगल में तब्दील हो गया, और संसार यह भूल गया कि राधा रानी का महल कहाँ था।

महान पुनरुद्धार: चैतन्य महाप्रभु के शिष्य श्रील नारायण भट्ट गोस्वामी

आचार्य नारायण भट्ट जी का जन्म दक्षिण भारत के मदुरा (मदुरै) में एक उच्चकुलीन द्रविड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे वेद, वेदांत और व्याकरण के प्रकांड पंडित थे। बाल्यावस्था में ही उन्हें श्री राधा कृष्ण की ब्रज-लीलाओं के साक्षात् स्वप्न आने लगे। चैतन्य महाप्रभु के शिष्य संप्रदाय से दीक्षा ग्रहण कर वे संवत् 1602 (सन 1545 ईस्वी) के आसपास ब्रजमंडल पहुंचे।

बरसाना के आधुनिक इतिहास का सबसे स्वर्णिम अध्याय 16वीं शताब्दी में शुरू होता है। चैतन्य महाप्रभु के षड्-गोस्वामियों (श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी आदि) के आगमन के पश्चात ब्रजभूमि के उद्धार का कार्य प्रारंभ हुआ। परंतु, बरसाना और लाड़ली जी के मंदिर को पुनर्जीवित करने का संपूर्ण श्रेय दक्षिण भारत से आए एक महान दिव्य नक्षत्र को जाता है।

आचार्य नारायण भट्ट जब बरसाना आए, तो वहाँ केवल एक ऊँची, कंटीली और उजाड़ पहाड़ी थी। उन्होंने ब्रह्मगिरी के भानगढ़ शिखर पर एक वृक्ष के नीचे बैठकर अन्न-जल का त्याग कर दिया और केवल श्री राधा नाम का जप करते हुए घोर तपस्या प्रारंभ की।

ब्रज के प्रामाणिक ग्रंथ 'भक्तमाल' (नाभादास जी कृत) और स्वयं नारायण भट्ट जी द्वारा रचित 'ब्रजभक्तिविलास' के अनुसार, तपस्या के 21वें दिन एक अत्यंत सुंदर अलौकिक ब्रजवासी कन्या प्रकट हुई। उसने भट्ट जी को पहाड़ी के एक विशिष्ट स्थान की ओर संकेत करते हुए कहा, "बाबा! तुम भूखे क्यों बैठे हो? इस झाड़ी के नीचे खुदाई करो, यहाँ तुम्हारी लाड़ली छिपी बैठी हैं।"

भट्ट जी ने स्थानीय ग्रामीणों (गोपों) को एकत्रित किया और उस स्थान की झाड़ियों को साफ कर जब भूमि की खुदाई की, तो वहाँ से दिव्य, हँसते हुए और त्रिभंग मुद्रा में श्री राधा रानी और श्री लाड़ली लाल (कृष्ण) के मूल विग्रह प्रकट हुए। विग्रहों के प्रकट होते ही संपूर्ण ब्रजमंडल 'राधे-राधे' के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।

आगे भाग 2 में पढ़ें :-

  1. आचार्य नारायण भट्ट गोस्वामी जी की परंपरा मौजूदा गोस्वामी गणों का इतिहास

  2. पुराना महल और नई अटारी का इतिहास

  3. राजा बीर सिंह जूदेव पर कृपा

  4. बरसाना के नागा साधुओं जाटों व ब्रजवासियों का छापामार युद्ध

  5. औरंगजेब व अहमद शाह अब्दाली को हराने वाली विजय लाडली जी

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.