वृषभानुपुर का वैभव एतिहास एवं आध्यात्मिकता का केंद्र बिंदु (भाग 2)

इस युद्ध में सैकड़ों ब्रजवासी और सैनिक मंदिर की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यद्यपि अफ़गानों ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए नीचे की बस्तियों में आग लगा दी...
ब्रजमंडल: बरसाना धाम
पिछले भाग में हम लोगों ने ब्रह्मांचल पर्वत की उत्पत्ति, श्रीजी के रावल गांव से आकर बरसाना निवास व आक्रांताओं के कारण बरसाना के पुनः खंडहर हो जानें और पुनः स्थापना तक की लीला पढ़ी। अब आगे......
नारायण भट्ट जी ने तात्कालिक रूप से मिट्टी और पत्थरों की एक छोटी सी कुटिया (मड़ैया) बनाकर विग्रहों को स्थापित किया और स्वयं उनकी अष्टयाम (चौबीस घंटे के आठ भाग) सेवा प्रारंभ की। उन्होंने अपने शिष्यों और पुत्रों को इस सेवा में नियुक्त किया। आज वर्तमान में भी श्रीजी मंदिर की जो सेवा-पूजा संभाली जाती है, वह पूर्णतः आचार्य नारायण भट्ट जी के वंशज गोस्वामी समाज द्वारा ही की जाती है। इस परंपरा को 'भट्ट जी का घराना' या 'बरसाना का गोस्वामी समाज' कहा जाता है। सेवा के नियम अत्यंत कड़े हैं और यहाँ केवल इसी वंश परंपरा के दीक्षित गोस्वामियों को ही गर्भगृह में प्रवेश और सेवा का अधिकार प्राप्त है।
पुराने महल (मूल प्रस्तर मंदिर) का इतिहास एवं निर्माता
ओरछा (वर्तमान मध्य प्रदेश) के प्रतापी बुंदेला शासक राजा बीर सिंह देव (वीरसिंह जू देव), जो मुगल सम्राट जहांगीर के परम मित्र थे, कला और भव्य मंदिरों के निर्माण के लिए विख्यात थे। उन्होंने ही मथुरा का भव्य 'केशवदेव मंदिर' (जिसे बाद में औरंगज़ेब ने तुड़वा दिया) बनवाया था। आचार्य नारायण भट्ट जी की गुरु-परंपरा के संतों के संपर्क में आने के बाद, राजा बीर सिंह देव ने बरसाना के भानगढ़ शिखर पर लाड़ली जी के लिए एक अभेद्य और भव्य महलनुमा मंदिर का निर्माण शुरू करवाया, जो सन् 1675 के आसपास पूर्ण हुआ।
इसे आज हम 'पुराना महल' कहते हैं। इसकी दीवारें कई फीट चौड़ी हैं, जो किसी किले (Fort) जैसी प्रतीत होती हैं। इस पुराने महल को इस तरह डिजाइन किया गया था कि संकट के समय इसे तुरंत एक सैन्य दुर्ग में बदला जा सके। इसमें गुप्त रास्ते, संकरी सीढ़ियाँ और ऊपरी बुर्ज बनाए गए थे जहाँ से आक्रमणकारियों पर नज़र रखी जा सके।
ब्रिटिश इतिहासकार एफ. एस. ग्राउस (F.S. Growse) ने अपनी पुस्तक 'Mathura: A District Memoir' (1874) में स्पष्ट लिखा है कि बीर सिंह देव से पूर्व भी इस पहाड़ी पर निर्माण के प्रयास हुए थे। अकबर के प्रसिद्ध दीवान और नवरत्न राजा टोडरमल ने आचार्य नारायण भट्ट जी के प्रभाव में आकर बरसाना के इस स्थल के प्रशासनिक अधिकार और राजस्व (Tax) को मंदिर के नाम मुक्त करने की शाही सनद (आदेश) जारी करवाई थी, तथा प्रारंभिक गर्भगृह के निर्माण हेतु स्वर्ण मुद्राएं दान की थीं।
औरंगजेब का क्रुर फरमान और बृजवासियों की युद्ध नीति
सन् 1669 में मुगल आक्रांता opiljk,nm ने संपूर्ण मथुरा मंडल के हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करने का क्रूर शाही फरमान जारी किया। मथुरा का केशवदेव मंदिर तोड़े जाने के बाद मुगल सेना गोवर्धन और बरसाना की तरफ बढ़ी। जब मुगल सेनापति अपनी टुकड़ी के साथ ब्रह्मगिरी पर्वत पर चढ़ने लगा, तब बरसाना और आसपास के गाँवों के स्थानीय जाट योद्धाओं, अखाड़ों के नागा साधुओं और लाठैत ब्रजवासियों ने लाड़ली जी के मंदिर की घेराबंदी कर ली।
पहाड़ी रास्ता संकरा होने के कारण मुगलों के घुड़सवार ऊपर नहीं चढ़ पा रहे थे। ब्रजवासियों ने ऊपर से भारी पत्थर लुढ़काकर और गोफनों (पत्थर फेंकने का पारंपरिक हथियार) से हमला करके मुगल सेना के छक्के छुड़ा दिए। हालांकि सैन्य बल कम होने के कारण आक्रांतियों ने मंदिर के बाहरी हिस्सों को आंशिक क्षति पहुंचाई
परंतु चतुर गोस्वामियों ने मुगलों के ऊपर पहुंचने से पहले ही श्री राधा रानी और लाड़ली लाल के मूल विग्रहों को पहाड़ी के नीचे बनी एक गुप्त कंदरा (जिसे आज 'गुप्त घाट' या 'छिपनी कुंड' के समीप माना जाता है) में छिपा दिया। इस प्रकार विग्रहों को अपवित्र होने से बचा लिया गया।
अहमद शाह अब्दाली का भीषण आक्रमण (मार्च 1757 ईस्वी)
प्रख्यात इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तक 'Fall of the Mughal Empire' (Vol. II) में समकालीन मुग़ल और अफ़गान इतिहासकारों के पत्रों के आधार पर इस युद्ध का रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण दिया है बरसाना के इतिहास का सबसे भयानक और प्रामाणिक युद्ध मार्च 1757 में लड़ा गया, जब अफ़गान आक्रांता अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर आक्रमण किया। दिल्ली को लूटने के बाद अब्दाली ने प्रतिज्ञा की थी कि वह हिंदुओं के पवित्र तीर्थों (मथुरा-वृंदावन) का समूल नाश कर देगा।
भरतपुर सेना का मोर्चा: उस समय बरसाना और डीग का क्षेत्र भरतपुर के महान जाट महाराजा सूरजमल के अधीन था। महाराजा सूरजमल के पुत्र राजकुमार जवाहर सिंह ने अफ़गानों को रोकने के लिए बरसाना की पहाड़ियों को अपना मुख्य रक्षा कवच बनाया। भरतपुर के कुशल सैनिकों की एक टुकड़ी ने बरसाना मंदिर की प्राचीर पर तोपें तैनात कर दीं।
अब्दाली के सिपहसालार जहांदान खान ने 20,000 अफ़गान घुड़सवारों के साथ बरसाना पर धावा बोला। पहाड़ी के नीचे और मंदिर की सीढ़ियों पर भयंकर युद्ध हुआ। स्थानीय ब्रजवासियों और जाट सैनिकों ने "हर-हर महादेव" और "राधे-राधे" के उद्घोष के साथ अफ़गानों की सेना पर प्राणघातक प्रहार किए।
इस युद्ध में सैकड़ों ब्रजवासी और सैनिक मंदिर की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। यद्यपि अफ़गानों ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए नीचे की बस्तियों में आग लगा दी, परंतु वे पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित मुख्य गर्भगृह को पूर्णतः नष्ट नहीं कर सके, क्योंकि भरतपुर सेना और लाठैत ब्रजवासियों ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
नई अटारी (वर्तमान भव्य परिसर): वास्तुकला और ऐतिहासिक निर्माता
आज जो भी श्रद्धालु बरसाना जाता है, उसे पहाड़ी पर दूर से ही एक विशाल, भव्य और कई मंजिला राजप्रासाद जैसा मंदिर दिखाई देता है। इसे ही 'नई अटारी' कहा जाता है। यह मध्यकालीन 'पुराने महल' के अग्रभाग और ऊपरी भाग का अभूतपूर्व विस्तार है। बरसाना की नई अटारी की स्थापत्य शैली राजपूत (राजस्थानी) शैली और उत्तर-मुगल कालीन स्थापत्य का एक चरमोत्कर्ष है। बीर सिंह देव बुंदेला के पुराने ढांचे को वर्तमान विशाल रूप देने में किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि विभिन्न कालखंडों के दानवीरों का योगदान रहा है
इसमें निम्नलिखित स्थापत्य विशेषताएं
लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) का प्रयोग: पूरा मंदिर राजस्थान के धौलपुर और बयाना से मंगाए गए उच्च गुणवत्ता वाले लाल बलुआ पत्थरों से निर्मित है। पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए लोहे की छड़ों और चूने-गुड़-उड़द की दाल के पारंपरिक लेप का प्रयोग किया गया है, जो इसकी दीर्घायु का मुख्य कारण है।
अष्टकोणीय खंभे और नक्काशीदार मेहराब: मंदिर के मुख्य प्रांगण (आंगन) को संभालने वाले स्तंभ अष्टकोणीय (Octagonal) हैं। इन पर बेल-बूटे, मयूर (मोर), और लताओं की इतनी सूक्ष्म नक्काशी की गई है कि पाषाण भी जीवंत प्रतीत होते हैं। इसके मेहराब 'कुंज' के आकार के हैं, जो ब्रज की निकुंज लीलाओं को प्रदर्शित करते हैं।
झरोखे और छतरियां: राजपूत किलों की तर्ज पर इसमें सुंदर झरोखे (Balconies) और चारों कोनों पर हवादार छतरियां बनाई गई हैं। ये छतरियां केवल सुंदरता के लिए नहीं हैं, बल्कि यहाँ से ब्रजमंडल का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
गर्भगृह और संगमरमर का काम: मंदिर का सबसे भीतरी भाग यानी गर्भगृह अत्यधिक वातानुकूलित और अलंकृत है। यहाँ फर्श और दीवारों पर इतालवी और मकराना के सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है, जिस पर कीमती पत्थरों की पच्चीकारी (Pietra Dura) की गई है।
निर्माताओं का प्रामाणिक इतिहास (18वीं-19वीं शताब्दी)
1. भरतपुर राजपरिवार (1760-1800 ईस्वी): अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण के बाद क्षतिग्रस्त हुए हिस्सों का जीर्णोद्धार महाराजा सूरजमल के उत्तराधिकारियों (महाराजा जवाहर सिंह और महाराजा रणधीर सिंह) ने करवाया। उन्होंने मंदिर के परकोटे (बाउंड्री वॉल) को मजबूत किया और नीचे से ऊपर तक जाने वाली 250 से अधिक सीढ़ियों का निर्माण करवाया।
2. हाथरस के राजा और अहमदाबाद के सेठ (19वीं शताब्दी): सन् 1840 के दशक में हाथरस के स्थानीय शासकों और अहमदाबाद के कतिपय समृद्ध जैन व हिंदू व्यापारियों (जैसे सेठ कस्तूरभाई के पूर्वज) ने मंदिर के विशाल अग्र-मंडप (जहाँ भक्त बैठते हैं) और मुख्य द्वार के निर्माण के लिए भारी वित्तीय सहायता प्रदान की। इन व्यापारियों ने मंदिर की छतों पर सोने के पत्तर (Gold Plating) चढ़ाने का कार्य भी करवाया था।
3. दानवीरों का योगदान : श्री राधा रानी मंदिर केवल ऐतिहासिक राजाओं के बल पर नहीं बल्कि विभिन्न कालखंडों के दानवीरों का योगदान रहा है
आगे भाग 3 में पढ़ें:-
रसिकाचार्यों की गुरु-परंपरा वर्तमान स्वरूप
'गहवर' का रहस्य एवं अलौकिक लीलाएँ
अष्टयाम सेवा का समय एवं व्यवस्था का पूरा विवरण
ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक साक्ष्य
