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·गौड़िया वैष्णव आचार्य·By प्रमोद कुमार शुक्ला

भक्ति रस सम्राट श्री रूप गोस्वामी: मंत्री पद त्याग की वृंदावन की अलौकिक यात्रा

भक्ति रस सम्राट श्री रूप गोस्वामी: मंत्री पद त्याग की वृंदावन की अलौकिक यात्रा

उनके पूर्वज श्री सर्वज्ञ जगद्गुरु कर्नाटक के राजा थे। कालांतर में उनके वंशज बंगाल में आकर बस गए। रूप गोस्वामी जी तीन भाई थे तीनों भाई बचपन से ही असाधारण बुद्धि और भक्ति भाव के धनी थे।

श्री वृंदावन

भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में श्री रूप गोस्वामी का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे न केवल चैतन्य महाप्रभु के सबसे प्रिय शिष्यों में से एक थे, बल्कि उन्होंने वृंदावन के 'छह गोस्वामियों' का नेतृत्व करते हुए गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय को दार्शनिक और साहित्यिक आधार प्रदान किया। एक समय बंगाल के नवाब के अत्यंत शक्तिशाली मंत्री रहे रूप गोस्वामी ने जिस तरह राजसी वैभव को त्यागकर वृंदावन की धूल को अपना सर्वस्व बनाया, वह वैराग्य और भक्ति की पराकाष्ठा है।

श्री रूप गोस्वामी का जन्म 1489 ई. (कुछ मतों के अनुसार 1493 ई.) के आसपास बंगाल के 'रामकेली' (मालदा जिला) में हुआ था। उनका परिवार मूलतः कर्नाटक के भारद्वाज गोत्रीय सारस्वत ब्राह्मण थे। पूर्वज: उनके पूर्वज श्री सर्वज्ञ जगद्गुरु कर्नाटक के राजा थे। कालांतर में उनके वंशज बंगाल में आकर बस गए। रूप गोस्वामी जी तीन भाई थे सनातन गोस्वामी (बड़े भाई) आप रूप गोस्वामी और अनुपम (छोटे भाई)। तीनों भाई बचपन से ही असाधारण बुद्धि और भक्ति भाव के धनी थे।

मंत्री पद और राजसी जीवन का त्याग

तीनों भाइयों की विद्वता से प्रभावित होकर बंगाल के नवाब अलाउद्दीन हुसैन शाह ने उन्हें जबरन अपनी सेवा में नियुक्त किया। नवाब ने रूप गोस्वामी को 'दबीर खास' (निजी सचिव) और सनातन गोस्वामी को 'साकिर मल्लिक' (राजस्व मंत्री) की उपाधियाँ दीं। यद्यपि वे नवाब के दरबार में ऊंचे पदों पर थे और अपार संपत्ति के स्वामी थे, लेकिन उनका हृदय सदैव भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में लगा रहता था। वे गुप्त रूप से विद्वानों के साथ शास्त्र चर्चा करते थे।

चैतन्य महाप्रभु के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। जब चैतन्य महाप्रभु पुरी से वृंदावन की यात्रा पर निकले और रामकेली पहुँचे, तो रूप और सनातन गोस्वामी ने आधी रात को वेष बदलकर उनसे भेंट की। महाप्रभु के चरणों में गिरकर उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई कि वे नवाब की सेवा में फंस गए हैं। महाप्रभु ने उन्हें धैर्य रखने को कहा और उनका नाम 'रूप' और 'सनातन' रखा।

महाप्रभु के प्रभाव से रूप गोस्वामी का हृदय वैराग्य से भर गया। उन्होंने सबसे पहले अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा ब्राह्मणों और गरीबों में दान कर दिया, कुछ हिस्सा परिवार के लिए रखा और एक छोटी राशि आपातकाल के लिए सुरक्षित कर दी। इसके बाद वे चुपचाप नवाब की नौकरी छोड़कर महाप्रभु की शरण में प्रयाग (इलाहाबाद) पहुँच गए।

प्रयाग में दस दिन की दिव्य शिक्षा व वृंदावन की सेवा

प्रयाग के 'दशाश्वमेध घाट' पर चैतन्य महाप्रभु ने श्री रूप गोस्वामी को लगातार दस दिनों तक भक्ति के गूढ़ रहस्यों की शिक्षा दी। इसे वैष्णव इतिहास में 'रूप-शिक्षा' के नाम से जाना जाता है।

रस शास्त्र की नींव: महाप्रभु ने रूप गोस्वामी को बताया कि किस प्रकार एक साधारण जीव भक्ति के माध्यम से 'रस' (आध्यात्मिक आनंद) की उच्चतम अवस्था को प्राप्त कर सकता है। दस दिनों की शिक्षा के बाद महाप्रभु ने उन्हें आदेश दिया कि वे वृंदावन जाएँ और वहां लुप्त हो चुके कृष्ण लीला स्थलों की खोज करें, मंदिरों का निर्माण करें और भक्ति ग्रंथों की रचना करें। महाप्रभु की आज्ञा मानकर रूप गोस्वामी वृंदावन पहुँचे। उस समय का वृंदावन आज जैसा नहीं था; वह एक घना जंगल था। रूप गोस्वामी ने अपना राजसी जीवन पूरी तरह त्याग दिया। वे वृक्षों के नीचे सोते थे, फटे हुए वस्त्र पहनते थे (कौपीन) और ब्रजवासियों से केवल मुट्ठी भर मधुकरी (भिक्षा) लेकर जीवन यापन करते थे।

गोविंद देव विग्रह का श्री गोविन्द देव जी का प्रकटीकरण

कहा जाता है कि श्री कृष्ण ने स्वयं एक ग्वाले के रूप में आकर उन्हें संकेत दिया कि 'गोमा टीला' के नीचे भगवान का प्राचीन विग्रह दबा हुआ है। खुदाई करने पर वहां से 'श्री गोविंद देव' का अद्भुत विग्रह प्रकट हुआ, जो आज भी गौडिया वैष्णवो का गौरव है।श्री रूप गोस्वामी को 'भक्ति-रसाचार्य' कहा जाता है। उन्होंने संस्कृत में अनेक कालजयी ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं:

भक्तिरसामृतसिंधु: इसे भक्ति का विज्ञान कहा जाता है। इसमें उन्होंने भक्ति के विभिन्न चरणों (श्रद्धा से लेकर प्रेमावस्था तक) का वैज्ञानिक विश्लेषण किया है।

उज्ज्वल नीलमणि: यह ग्रंथ मधुर रस (राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम) का सर्वोच्च विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

विदग्ध माधव और ललित माधव: ये दो महान नाटक हैं जो कृष्ण की वृंदावन और द्वारका लीलाओं पर आधारित हैं।

उपदेशामृत: यह केवल 11 श्लोकों का संग्रह है, जो साधकों के लिए अनिवार्य आचार संहिता है।

वैराग्य और 'सनातन' प्रेम

अपने बड़े भाई सनातन गोस्वामी के साथ मिलकर उन्होंने वृंदावन को वैष्णव भक्ति का केंद्र बनाया। उनके शिष्यों में जीव गोस्वामी (उनके भतीजे) सबसे प्रमुख थे, जिन्होंने बाद में संप्रदाय को आगे बढ़ाया। रूप गोस्वामी की विनम्रता ऐसी थी कि वे स्वयं को कभी बड़ा संत नहीं मानते थे, बल्कि सदैव स्वयं को 'दासानुदास' (दासों का दास) कहते थे।

श्री रूप गोस्वामी ने अपना पूरा जीवन राधा-कृष्ण की सेवा और ग्रंथों की रचना में समर्पित कर दिया। 1564 ई. (श्रावण शुक्ल द्वादशी) को उन्होंने अपनी भौतिक देह त्याग दी और नित्य लीला में प्रविष्ट हुए। उनकी समाधि आज भी वृंदावन के राधा दामोदर मंदिर के प्रांगण में स्थित है। यह स्थान दुनिया भर के वैष्णवों के लिए सबसे पवित्र भजन स्थलों में से एक है।

यहाँ की मिट्टी का स्पर्श आज भी भक्तों को दिव्य प्रेरणा देता है। श्री रूप गोस्वामी का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता पद या प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप (ईश्वर के प्रति प्रेम) को पहचानने में है। एक शक्तिशाली मंत्री का ब्रज की धूल में रम जाना इस बात का प्रमाण है कि कृष्ण प्रेम के सामने संसार का सबसे बड़ा साम्राज्य भी तुच्छ है।

नोट :- यह आर्टिकल निम्नलिखित ग्रंथों के आधार पर लिखा गया है

चैतन्य चरितामृत (मध्य लीला): कृष्णदास कविराज गोस्वामी।

गौड़ीय वैष्णव अभिलेख: वृंदावन शोध संस्थान। भक्ति रत्नाकर: नरहरि चक्रवर्ती।

श्री रूप गोस्वामी की जीवनी: विभिन्न गौड़ीय मठों के प्रकाशन।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.