प्राणाधार बाबा श्री श्याम दास जी महाराज – भाग 2 (गुरु मिलन और साधना)

कुछ साधुओं की सहायता से वे बाबा तक पहुँचे और दीक्षा की याचना की, परंतु विष्णु दास बाबा महाराज ने स्पष्ट मना कर दिया। वे अत्यंत विरक्त संत थे
संकेत वट, बरसाना
भाग - 2
उस निर्जन जंगल में, जहाँ महाराज जी चाकू की नोक पर लूट लिए गए थे, वह क्षण उनके लिए प्राणों के संकट का था। परंतु ठाकुर जी की असीम कृपा से उस लुटेरे की मति अचानक पलट गई। वह सारा सामान लेकर उन्हें जीवित छोड़कर भाग गया। महाराज जी खाली हाथ वापस लौट रहे थे,
मन में एक टीस थी—किंतु यह टीस धन खोने की नहीं, बल्कि उस अंतिम भौतिक सहारे के टूट जाने की थी। वे सोच रहे थे कि अब गुरु की खोज कैसे होगी? लौटते समय मार्ग में एक स्थान पर कथा हो रही थी। महाराज जी भारी मन से वहां बैठ गए। तभी कथावाचक के मुख से निकले शब्दों ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। व्यासपीठ से गूंजा:
"ठाकुर जी जिसे अपनी शरण में लेना चाहते हैं, सबसे पहले उसका सबकुछ छीन लेते हैं। वे भक्त के सारे सांसारिक सहारे खत्म कर देते हैं ताकि वह केवल और केवल उनके सहारे रह सके।"
इन शब्दों ने महाराज जी के अंतर्मन में बिजली सा काम किया। उनके दुख के बादल छंट गए और वे आनंद से भर उठे। उन्हें समझ आ गया कि यह लूट नहीं, बल्कि ठाकुर जी का निमंत्रण था। अब वे पूरी तरह निश्चिंत होकर वृंदावन की रज में भजन करने लगे। भक्ति के इसी प्रवाह में आगे चलकर उन्हें एक मंदिर में गौसेवा का पावन अवसर मिला।
वहां वे भगवा वस्त्र धारण कर निष्काम भाव से गैया मैया और हनुमान जी महाराज की सेवा में जुट गए। सूटकेस और घड़ी के रूप में संसार का अंतिम मोह छूटते ही, महाराज जी का हृदय अब पूरी तरह से गुरु मिलन के लिए तैयार हो चुका था।
गुरु मिलन व बृजवासियों की कृपा
हनुमान जी और गौ-माता की अनवरत सेवा करते हुए श्याम दास जी के मन में गुरु प्राप्ति की ज्वाला निरंतर धधक रही थी। कई बार स्नेही बृजवासियों ने उनसे कहा, "बाबा, चल तुझे वृंदावन के फलाने बड़े सिद्ध संत या प्रसिद्ध मंदिर के महंत से दीक्षा दिला दें।" परंतु महाराज जी का हृदय कहीं ठहरता नहीं था।
किंतु नियति ने उनका संबंध सिद्ध श्री रामकृष्ण दास बाबा जी महाराज के परिकर श्री श्री विष्णु दास बाबा महाराज से तय कर रखा था। जब महाराज जी ने प्रथम बार बाबा के दर्शन किए, तो उनके अंतर्मन ने पुकार उठाई—'यही मेरे गुरु हैं।'
जब गुरु जी ने अपनाने से किया मना
कुछ साधुओं की सहायता से वे बाबा तक पहुँचे और दीक्षा की याचना की, परंतु विष्णु दास बाबा महाराज ने स्पष्ट मना कर दिया। वे अत्यंत विरक्त संत थे और उन्होंने पूरे जीवन काल में केवल चार ही शिष्य बनाएं थे। श्याम दास जी पाँचवें शिष्य बनने के लिए व्याकुल थे। प्रथम बार मना हो जाने के बाद भी श्याम दास बाबा हार मानने वालों में से नहीं थे। वे नित्य भागवत निवास आश्रम जाने लगे। बाबा को रिझाने के लिए वे गुपचुप तरीके से आश्रम में झाड़ू लगाते, साफ-सफाई करते और सेवा में लीन रहते। पर बाबा का हृदय नहीं पसीजा।
बृजवासियों की अल्हड़ गवाही
अंततः वह शुभ दिन आया जब भागवत निवास में एक भव्य उत्सव था। श्याम दास जी भी भगवा वस्त्रों में, माथे पर हनुमान जी का सिंदूर लगाए सबकी सेवा में तल्लीन थे। तभी उन्हें कुछ परिचित बृजवासियों ने देख लिया और ठिठोली करते हुए पूछा:
"क्यों बाबा! तोए अब तक कोई गुरु मिलों की न हीं ?"
यह प्रश्न सुनते ही महाराज जी के सब्र का बांध टूट गया और वे फफक कर रो पड़े। उन्होंने रुंधे गले से कहा— "मेरी निष्ठा विष्णु दास बाबा जी महाराज में है, पर वे मुझे अपना नहीं रहे।" बृजवासियों का स्वभाव अल्हड़ और प्रेमपूर्ण होता है। उन्होंने महाराज जी का हाथ पकड़ा और सीधे विष्णु दास बाबा की कुटिया में जा धमके। अपनी ठेठ बृज भाषा में अधिकार पूर्वक बोले:
"क्यों बाबा कहा बात है! तू हमारे या बाबा कू दीक्षा क्यों नाहीं दे रहो है?
कहा बात है? हम याके गारंटर (साक्षी) हैं, हमारो आदमी है ये! इसे दीक्षा दे दे! यू बढ़िया बालक है"
बृजवासियों का यह निष्कपट प्रेम देख परम् पूज्य श्री विष्णु दास बाबा जी का विरक्त हृदय पसीज गया और वे मुस्कुरा उठे। उन्होंने कहा— "जब बृजवासियों ने इसे अपना लिया, तो मेरी क्या हैसियत है कि मैं मना करूँ? आज से यह मेरा शिष्य है।" उसी क्षण श्री विष्णु दास बाबा महाराज ने उन्हें 'श्याम दास' नाम देकर अपना लिया।
साधना और सेवा का संगम (संकेत वट)
महाराज जी वर्तमान में उस स्थान की सेवा संभाल रहे हैं जिसका आध्यात्मिक महत्व अतुलनीय है। श्री राधा संकेत बिहारी जी मंदिर, जिसे श्री राधा और कृष्ण की 'प्रथम मिलन स्थली' माना जाता है, आज महाराज जी के सानिध्य में निरंतर प्रफुल्लित हो रहा है। संकेत धाम के मुख्य महंत के रूप में उनकी कार्यशैली अन्य संतों से भिन्न और प्रेरणादायी है। मुख्य महंत होने के बावजूद भी महाराज जी में रत्ती भर भी अहंकार नहीं है। वे स्वयं मंदिर की साफ-सफाई से लेकर निर्माण कार्यों तक में हाथ बंटाते हैं।
उनका स्वभाव अत्यंत सरल और करुणापूर्ण है। जो भी भक्त उनसे मिलता है, वह उनकी सौम्यता और अपनत्व का कायल हो जाता है। वे केवल एक धार्मिक गुरु नहीं, बल्कि भक्तों के लिए एक मार्गदर्शक और मित्र की भाँति हैं। उनकी वाणी में मधुरता और व्यवहार में जीव गोस्वामी की विनम्रता झलकती है।
धाम की सेवा ही जीवन साधना
महाराज जी का मानना है कि सेवा ही सबसे बड़ी साधना है। संकेत धाम में आने वाले हर आगंतुक को वे प्रेमपूर्वक ठाकुर जी की लीलाओं से अवगत कराते हैं। मंदिर परिसर के विकास और वहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए वे दिन-रात स्वयं कर्मठ रहते हैं। उनके लिए मंदिर का हर पत्थर और ब्रज की हर कुंज एक जीवंत सत्ता है।श्री श्याम दास जी महाराज का जीवन हमें सिखाता है कि भक्ति केवल माला जपने का नाम नहीं है माला तो उनकी सेवा है ही लेकिनअपने आराध्य के धाम को स्वच्छ, सुंदर और जीवंत बनाए रखना भी परम भक्ति है।"
