श्री श्री नरहरियानन्द जी: भक्ति और वैराग्य के प्रकाशपुंज

धन्य धन्य नरहरि गुरु, ज्ञान रूप अवतार। तुलसी से जगमग किये, दे भक्ति को सार
श्रीधाम वृंदावन (उत्तर प्रदेश)
भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में 'भक्तमाल' मात्र एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भक्तों के चरित्र का वह दिव्य दर्पण है जिसमें भगवान के साक्षात दर्शन होते हैं। श्री नाभादास जी विरचित 'श्री भक्तमाल' के प्रमुख चरित्रों में श्री नरहरियानन्द जी (जिन्हें नरहरि दास जी के नाम से भी जाना जाता है) का स्थान अत्यंत विलक्षण है। वे स्वामी रामानन्दाचार्य जी के द्वादश महाभागवत शिष्यों में से एक थे। उनका जीवन ज्ञान, भक्ति और शरणागति का एक ऐसा त्रिवेणी संगम है, जिसने मध्यकालीन भक्ति आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की।
प्रकटीकरण और प्रारंभिक जीवन
श्री नरहरियानन्द जी का प्राकट्य उत्तर भारत की पवित्र धरा पर हुआ। शास्त्रों और परंपराओं के अनुसार, उनका जन्म एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाल्यावस्था से ही उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक तेज था, जो उनके भविष्य के आध्यात्मिक उत्कर्ष का संकेत देता था।ग्रंथ 'भक्तमाल' की टीकाओं और 'रामानंद संप्रदाय' के इतिहास ग्रंथों (जैसे श्रीरामानंद दिग्विजय) में उल्लेख मिलता है कि वे उन चुनिंदा आत्माओं में से थे जो संसार में केवल भगवत कार्य के लिए अवतरित हुए थे।
उनका प्रारंभिक जीवन शास्त्रानुशीलन में बीता। वे वेदों, पुराणों और उपनिषदों के प्रकांड विद्वान थे, किंतु उनके हृदय में केवल कोरा ज्ञान नहीं, बल्कि प्रभु के दर्शन की व्याकुलता थी। इसी व्याकुलता ने उन्हें उस समय के महान संत जगद्गुरु श्री रामानन्दाचार्य जी की शरण में पहुँचाया।
गुरु कृपा और दीक्षा
स्वामी रामानन्द: जी ने जब काशी के पंचगंगा घाट पर भक्ति का द्वार सबके लिए खोल दिया था, तब नरहरियानन्द जी ने उनसे दीक्षा ग्रहण की
दीक्षा का रहस्य: स्वामी जी ने उन्हें 'राम' मंत्र की दीक्षा दी। उनके जीवन में गुरु का स्थान सर्वोपरि था।
द्वादश शिष्यों में स्थान: भक्तमाल के छप्पय संख्या 34 में नाभादास जी ने स्वामी रामानन्द जी के 12 प्रमुख शिष्यों का वर्णन किया है:
अनंतानंद कबीर सुखा सुरसुरा पद्मावती नरहरी।
पीपा भावानंद रैदास धना सेन सुरसुर की घरहरी।।
श्री भक्तमाल, श्री नाभादास यहाँ 'नरहरी' शब्द श्री नरहरियानन्द जी के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। गुरु की सेवा में रहकर उन्होंने अष्टांग योग और अनन्य भक्ति की पराकाष्ठा को प्राप्त किया।
प्रमुख लीलाएँ और आध्यात्मिक प्रसंग
श्री नरहरियानन्द जी के जीवन की लीलाएँ चमत्कारिक होने के साथ-साथ गंभीर दार्शनिक संदेश देती हैं।
शरणागति का सिद्धांत : नरहरियानन्द जी का मत था कि जीव चाहे कितना भी विद्वान क्यों न हो, जब तक वह श्री रघुनाथ जी के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण नहीं करता, तब तक उसे शांति नहीं मिल सकती। उन्होंने अपने उपदेशों में बार-बार 'अनन्य भाव' पर बल दिया।
गोस्वामी तुलसीदास जी के गुरु के रूप में पहचान
इतिहासकारों और भक्तों के बीच यह सर्वमान्य है कि श्री नरहरियानन्द जी ही वे महापुरुष थे जिन्होंने बालक 'रामबोला' (गोस्वामी तुलसीदास जी) को संरक्षण दिया और उन्हें राम कथा का अमृत पान कराया। 'रामचरितमानस' के बालकांड में तुलसीदास जी स्वयं अपने गुरु की वंदना करते हुए कहते हैं:
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।
( श्रीरामचरितमानस, बालकांड, सोरठा ) यहाँ 'नररूप हरि' का अर्थ स्पष्ट रूप से नरहरि दास जी (नरहरियानन्द जी) की ओर संकेत करता है। उन्होंने ही तुलसीदास जी को सुकरखेत (शूकरक्षेत्र) में ले जाकर राम कथा सुनाई थी।
शूकरक्षेत्र (सोरो) का वास : नरहरियानन्द जी का अधिकांश समय कासगंज जिले के पवित्र शूकरक्षेत्र (सोरो) में बीता। यहाँ उन्होंने वराह अवतार की महिमा का गान किया और भक्तों को राम भक्ति का मार्ग दिखाया। उनके सानिध्य में रहने वाले भक्तों का अनुभव था कि उनके मुख से निकलने वाली वाणी साक्षात सरस्वती का रूप होती थी।
दार्शनिक विचार और उपदेश : श्री नरहरियानन्द जी केवल एक सिद्ध पुरुष ही नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के चिंतक भी थे। उनके उपदेशों का सार निम्नलिखित बिंदुओं में समाहित है
नाम महिमा:वे मानते थे कि कलियुग में केवल 'राम' नाम ही आधार है। मंत्राक्षर की शुद्धता और हृदय की पवित्रता पर उनका विशेष बल था।
समदर्शिता: गुरु रामानन्द जी के शिष्य होने के नाते, उन्होंने जाति-पाँति के भेदभाव को त्याग कर 'हरि को भजै सो हरि का होई' के सिद्धांत को अपनाया।
मर्यादा: उन्होंने भक्ति में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों को सर्वोपरि रखा। उनका जीवन स्वयं एक मर्यादा की प्रतिमूर्ति था।
प्रचलित मान्यताएँ और पूर्ण अवतार की चर्चा
भक्त समाज में ऐसी मान्यता है कि श्री नरहरियानन्द जी साक्षात 'वराह अवतार' के अंश थे। उनके व्यक्तित्व में एक ऐसी निर्भीकता और शक्ति थी जो केवल ईश्वर के अवतार में ही संभव है।
विशेष मान्यता: कुछ ग्रंथों में उन्हें दिव्य पार्षद का अवतार माना गया है, जो भूतल पर सोए हुए जीवों को जगाने के लिए आए थे। उनकी दृष्टि मात्र से पापी से पापी व्यक्ति का हृदय परिवर्तित हो जाता था।
काव्य और साहित्य में स्थान : यद्यपि उन्होंने स्वयं को सदैव प्रचार-प्रसार से दूर रखा, किंतु उनके प्रभाव से जो साहित्य सृजन हुआ, वह आज भी अमर है। 'भक्तमाल' की प्रियादास जी कृत 'भक्तिबोधनी' टीका में उनके धैर्य और गुरुभक्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। एक प्रामाणिक दोहा जो उनके और उनके शिष्यों के संबंध में प्रसिद्ध है:
धन्य धन्य नरहरि गुरु, ज्ञान रूप अवतार। तुलसी से जगमग किये, दे भक्ति को सार।
यह दोहा स्पष्ट करता है कि उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि गोस्वामी तुलसीदास जैसा शिष्य संसार को देना था, जिन्होंने हिंदू धर्म की रक्षा हेतु 'मानस' रूपी अभेद्य दुर्ग खड़ा किया। श्री श्री नरहरियानन्द जी का जीवन एक जलती हुई मशाल की भाँति था, जिसने अज्ञान के अंधकार को मिटा दिया। उन्होंने सोरो की पावन धरा को अपनी तपस्या से अभिमंत्रित किया और राम भक्ति की उस धारा को प्रवाहित किया, जो आज भी करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। भक्तमाल के पन्नों में उनका चरित्र सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।
महत्वपूर्ण संदर्भ सूची (References)
1. श्री भक्तमाल - श्री नाभादास जी (मूल छप्पय)।
2. भक्तमाल टीका (भक्तिबोधनी) - श्री प्रियादास जी।
3. श्रीरामचरितमानस- गोस्वामी तुलसीदास (गुरु वंदना प्रसंग)।
4. श्रीरामानंद दिग्विजय - स्वामी रामानन्दाचार्य के जीवन पर आधारित ग्रंथ।
5. मध्यकालीन संत परंपरा - विभिन्न ऐतिहासिक शोध पत्र।
