दिल्ली में ब्रज: लाडली जी का बड़ा मंदिर और ललित संप्रदाय का इतिहास

राजा सवाई जयसिंह की सभा में मात्रा 10 वर्ष की आयु में श्री वंशी अली जी ने अपनी विद्वत्ता का ऐसा परिचय दिया कि राजा जयसिंह ने इन्हें अपने गुरु-तुल्य स्थान दिया
पुरानी दिल्ली का चांदनी चौक केवल व्यापार का केंद्र नहीं है, बल्कि यह इतिहास, संस्कृति और अध्यात्म की अनगिनत परतों को खुद में समेटे हुए है। इसी चांदनी चौक की ऐतिहासिक तंग गलियों में बसा है 'कटरा नील'। कपड़ा व्यापार के लिए प्रसिद्ध इस कटरे के भीतर कदम रखते ही इतिहास एक अलग रूप में जीवंत हो उठता है। इसी कटरा नील के हृदय में स्थित है 'लाडली जी का बड़ा मंदिर' (श्री राधा रानी मंदिर), जो शाहजहाँनाबाद (पुरानी दिल्ली) के सबसे प्राचीन, भव्य और ऐतिहासिक हिंदू मंदिरों में से एक है।
प्रकटीकरण एवं प्रवर्तक आचार्य
बरसाना स्थित श्री लाडली जी का प्रकटीकरण श्री नारायण भट्ट गोस्वामी जी महाराज ने संवत 1602 (सन् 1602 ईस्वी) में किया था। ठीक वैसी ही लीला अठारहवीं शताब्दी में श्री जी ने दिल्ली में की और भक्तों में श्रेष्ठ, बरसाना धाम निष्ठ परम पूज्य गोस्वामी श्री वंशीधर जी महाराज के आंगन में प्रकट हुईं। वह आंगन अब पूरी दिल्ली में ब्रज भक्तों की ठोर (ठिकाना) के तौर पर 'श्री लाडली जी का बड़ा मंदिर' नाम से प्रसिद्ध है। जो सेवा पद्धति बरसाना में श्री जी की सेवा में है, बिल्कुल वैसी ही दिल्ली स्थित लाडली जी की सेवा में भी है। बरसाने की तरह ही यहाँ भी ब्रज और वैष्णव संप्रदाय के सभी उत्सवों—होली उत्सव, दीपावली उत्सव, झूलन उत्सव और नौका विहार को खूब धूमधाम से मनाया जाता है। दिल्ली स्थित लाडली जी के इस मंदिर में ललित संप्रदाय की सेवा चल रही है।
लाहौर से वृंदावन और फिर दिल्ली आने का इतिहास
भक्तमाल के पावन चरित्र, लाहौर निवासी श्री श्री मिश्र नारायण गोस्वामी जी महाराज, जो श्री किशोर रमण जी के सेवक और ब्रज के प्रेम के प्रति समर्पितउनके बाद की सभी पीढ़ियाँ वर्षों तक ठाकुर सेवा, पूजा-पाठ, कथा आदि में संलग्न रहीं। इनकी सातवीं पीढ़ी में भागवत जी के परम वक्ता श्री श्री प्रद्युम्न मिश्र गोस्वामी जी का जन्म हुआ। इनके हजारों शिष्य थे, जिनमें से बड़ी संख्या दिल्ली शहर में रहने वाले भक्तों की थी
अपने दिल्ली निवासी शिष्यों के आग्रह पर प्रद्युम्न जी लाहौर से दिल्ली में आकर रहने लगे। इनके शिष्यों ने इनके निवास और किशोरी रमण जी की सेवा के लिए दिल्ली के कटरा नील के 'गली घंटेश्वर' इलाके में एक हवेलीनुमा मंदिर बनवा कर दिया। इसी कटरा नील वाली हवेली में ललित संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य श्री श्री वंशी अली का जन्म हुआ था।
वंशी अली जी की विद्वत्ता व जयपुर आगमन
आचार्य प्रद्युम्न जी लाहौर से दिल्ली आ तो गए थे, लेकिन ब्रज का प्रेम उन्हें वृंदावन ले गया, जहाँ उन्होंने अपने किशोरी रमन जी को वृंदावन में के सी घाट के पास एक सुंदर कुंज में विराजमान किया और वृंदावन में रहकर अष्टयाम सेवा में लग गए। संवत 1764 विक्रमी को एक संदेशवाहक ने उन्हें बताया कि श्री जी की कृपा से आपको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। यह पुत्र कोई और नहीं, ललित संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य श्री बंशीधर गोस्वामी जी थे।
ज्योतिषियों ने बताया कि यह बालक कोई सामान्य पुरुष नहीं है, यह तो सांसारिक माया को तोड़ने वाला आचार्य होगा; घर-परिवार, धन व रिश्ते-नातों से ऊपर उठकर यह बालक संन्यास धारण करेगा।आचार्य वंशीधर गोस्वामी जी का राधा रानी के प्रति समर्पण भाव उनकी उम्र से कई गुना तेज़ी से बढ़ने लगा। वह रोज़ सुबह उठते ही पूछते कि राधा अष्टमी कब है, जन्माष्टमी कब है, झूला उत्सव में कितने दिन शेष हैं। आचार्य वंशीधर गोस्वामी को धन की तृष्णा कभी तनिक छूकर भी नहीं गई थी। उनके पावन चरित्र में आता है कि वह हर वर्ष राधा अष्टमी पर कई हजार रुपये बधाई में बाँट दिया करते थे।
दिल्ली की हवेली में वंशीधर जी प्रतिदिन पठन-पाठन करते और विद्वत्ता में श्रेष्ठ होते गए। एक बार जयपुर जाने पर, वहाँ के राजा सवाई जयसिंह की सभा में मात्रा 10 वर्ष की आयु में श्री वंशी अली जी ने अपनी विद्वत्ता का ऐसा परिचय दिया कि राजा जयसिंह ने इन्हें अपने गुरु-तुल्य स्थान दिया एवं इन्हें जयपुर में राधा रानी का एक मंदिर भी बनवा कर सौंपा। साथ ही, मंदिर की सेवा और संचालन के लिए आठ गाँवों की जमींदारी भी प्रदान की।
श्री जी का दर्शन और ललिता सखी से दीक्षा
जयपुर में राजा सवाई जयसिंह ने श्री वंशी अली जी को रोके रखने के लिए सभी सुख सुविधा प्रदान की लेकिन यह धन जागीरदारी और राजमहलों की चकाचौंध उन्हें तनिक भी छू ना सकी जैसे तैसे कुछ वर्ष बीते और अब श्री वंशी अली जी 16 वर्ष के हो गए और बाबा महाराज की प्रेम व्याकुलता इतनी बढ़ गई की वो अक्सर श्री जी को याद करते हुए अचेत हो जाते।
नारायण भट्ट गोस्वामी पाद की तरह ही वंशीधर गोस्वामी जी ने भी प्रेम की वह अवस्था प्राप्त कर ली कि भोजन-पानी भी उन्हें याद नहीं रहता था। एक बार श्री वंशीधर गोस्वामी जी विरह में व्याकुल होकर दिल्ली स्थित हवेली पर अचेत हो गए, तभी श्री राधा रानी ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और कहां कि,
"मैं तुम्हारे आंगन में जामुन के पेड़ के नीचे विराजमान हूँ, मुझे वहाँ से निकाल कर सेवा करो।"
जिसके बाद जैसे ही वंशीधर गोस्वामी जी को होश आया वो ने जामुन के पेड़ की तरफ दौड़े और नीचे से श्री जी के विग्रह को प्राप्त किया।
कुछ समय उपरांत लगभग 20 वर्ष की आयु में श्री वंशीधर गोस्वामी जी दिल्ली से सबकुछ छोड़कर ब्रज में आ गए। वृंदावन में चीर घाट पर उसी स्थान पर रुके, जहां किशोरी रमण जी विराजमान थी। जो आगे चलकर बाबा महाराज के प्रताप से यह स्थान 'ललित कुंज' कहलाया। इन्होंने ब्रज में वृंदावन, बरसाना और ऊँचागाँव आदि स्थानों पर रहते हुए श्रीजी की उपासना शुरू कर दी।
बरसाना में गाँव के घूरे (कचरे का ढेर) पर रहकर इन्होंने बारह वर्ष तक तपस्या की थी। एक बार वृंदावन में जब ये यमुना स्नान करके लौट रहे थे, तब राधा रानी की प्रधान सखी श्री ललिता जी ने इन्हें दर्शन दिए और मंत्र-दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया—
“जय जय राधा ललिता वंशी श्याम! श्री वृंदावन निज सुख धाम!!”
ललिता जी से मंत्र-दीक्षा लेने के उपरान्त गोस्वामी श्री वंशीधर मिश्र जी 'श्री वंशी अली' कहलाने लगे। 'अली' का अर्थ होता है सखी या सहेली। इन्होंने राधा रानी की सखी के भाव के साथ उपासना शुरू कर दी, जिसके बाद से इनके शिष्य व वंशज 'ललित संप्रदाय' से पहचाने जाते हैं।
इन्होंने अनेकों भक्ति के पद रचे, जो आज भी भक्तों को भावुक कर देते हैं। आज भी सिर्फ दिल्ली स्थित मंदिर में ही नहीं, बल्कि ब्रज के लगभग सभी देवालयों में समाज-गायन में श्री वंशी अली गोस्वामी जी के भाव गाए जाते हैं। इनकी एक हस्तलिखित पुस्तक दिल्ली स्थित मंदिर में आज भी सुरक्षित रखी है।
ललित संप्रदाय के भक्त सखी भाव से राधा रानी की उपासना करते हैं। आज भी श्री वंशी अली के वंशज श्री नवीन गोस्वामी जी और उनके पुत्र श्री पार्थ अली गोस्वामी जी दिल्ली स्थित लाडली जी का बड़ा मंदिर में सेवा कार्य उसी तरह कर रहे हैं जैसे श्री वंशी अली जी बाबा महाराज ने वर्षों पहले नियम बनाया था।
