कला और अनुराग की अधिष्ठात्री: श्री चित्रलेखा सखी का दिव्य जीवन चरित्र

चित्रलेखा जी का शारीरिक वर्ण (रंग) 'केसर' के समान पीला और कांतिमान है।
वे 'कांचन' (स्वर्ण) के समान चमकते हुए वस्त्र धारण करती हैं, जो उनके कलात्मक व्यक्तित्व को और भी निखारता है।
बरसाना. चिक्सौली
ब्रज के रसमय निकुंजों में श्री राधा-कृष्ण की अष्टसखियों का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन आठ सखियों में से प्रत्येक एक विशिष्ट कला और भाव की स्वामिनी हैं। इनमें श्री चित्रलेखा (चित्रा) सखी का नाम विशेष रूप से उनकी अद्भुत चित्रकला, चतुरता और सेवा भाव के लिए लिया जाता है। वे राधा रानी की सखी होने के साथ-साथ उनके अंतर्मन के भावों को चित्रों में उकेरने वाली महान कलाकार भी हैं।
प्राकट्य और जन्म कथा: 'चिक्सौली' गाँव का गौरव
चित्रलेखा सखी का प्राकट्य द्वापर युग में ब्रज के 'चिक्सौली' (Chiksauli) ग्राम में हुआ था, जो बरसाना के अत्यंत समीप और मानगढ़ की तलहटी में स्थित है। माता-पिता: उनके पिता का नाम चतुर और माता का नाम चर्चितिका था। उनके नाम के अनुरूप ही उनके माता-पिता भी अत्यंत विद्वान और कलाप्रेमी थे। दिव्य स्वरूप: चित्रलेखा जी का शारीरिक वर्ण (रंग) 'केसर' के समान पीला और कांतिमान है। वे 'कांचन' (स्वर्ण) के समान चमकते हुए वस्त्र धारण करती हैं, जो उनके कलात्मक व्यक्तित्व को और भी निखारता है। विशिष्ट गुण: वे अष्टसखियों में 'मृदु' (कोमल) स्वभाव की मानी जाती हैं। उनकी वाणी अत्यंत मधुर है और वे संगीत व चित्रकला में निपुण हैं।
चित्रलेखा सखी का अद्वितीय व्यक्तित्व
चित्रलेखा जी को राधा-कृष्ण की 'चित्रकार सखी' कहा जाता है। वे केवल कागज या पट पर ही चित्र नहीं बनाती थीं, बल्कि वे अपनी दृष्टि मात्र से किसी के भी मन के भावों को पढ़ लेती थीं।
संकेत कला: वे संकेतों और इशारों की भाषा में इतनी निपुण थीं कि राधा-कृष्ण के बीच बिना कुछ बोले ही संवाद स्थापित करवा देती थीं। श्रृंगार सेवा: निकुंजों में श्री राधा जी के अंगों पर 'पत्रावली' (चंदन और कस्तूरी से बनाए जाने वाले बारीक चित्र) बनाने का मुख्य कार्य चित्रलेखा जी का ही होता है।
रत्न परीक्षा: वे रत्नों और मणियों की पारखी भी थीं। वे राधा जी के लिए श्रेष्ठ आभूषणों का चयन करती थीं।
श्री राधा रानी और चित्रलेखा का अटूट संबंध
चित्रलेखा जी का राधा रानी के प्रति प्रेम समर्पण की पराकाष्ठा है। वे राधा जी की 'ललिता' और 'विशाखा' जैसी प्रधान सखियों की सहायक के रूप में कार्य करती हैं, लेकिन उनकी सेवा का अपना एक अलग महत्व है।
मन की बात जानने वाली सखी: जब भी राधा रानी कृष्ण के विरह में व्याकुल होती थीं, तो चित्रलेखा जी अपनी कला का उपयोग करती थीं। वे कृष्ण के ऐसे सजीव चित्र बनाती थीं जिन्हें देखकर राधा जी को साक्षात कृष्ण की उपस्थिति का अनुभव होता था। वे राधा जी के 'भाव-जगत' की संरक्षिका मानी जाती हैं।
चित्रलेखा सखी की दिव्य लीलाएं
अद्भुत चित्रकला और कृष्ण का विस्मय : एक बार श्री कृष्ण वन में विहार कर रहे थे। चित्रलेखा जी ने चुपके से झाड़ियों के पीछे छिपकर कृष्ण के विभिन्न मुद्राओं में चित्र बनाए। जब उन्होंने वे चित्र राधा जी को दिखाए, तो राधा जी भाव-विभोर हो गईं। बाद में जब कृष्ण ने स्वयं वे चित्र देखे, तो वे चकित रह गए कि कोई उनकी भंगिमाओं को इतनी सूक्ष्मता से कैसे उकेर सकता है।
पत्रावली रचना लीला : निकुंजों में जब राधा रानी का श्रृंगार होता था, तब चित्रलेखा जी अपनी बारीक तूलिका (ब्रश) से राधा जी के कपोलों (गालों) और ललाट पर कस्तूरी से मकर, शंख और पुष्पों की आकृतियां बनाती थीं। कहा जाता है कि उनके द्वारा बनाए गए चित्र साक्षात जीवित प्रतीत होते थे।
राधा-कृष्ण का मिलन और चतुरता : चित्रलेखा जी अपनी चतुराई के लिए प्रसिद्ध थीं। वे अक्सर कृष्ण को ऐसे तर्कों में उलझा देती थीं कि कृष्ण निरुत्तर हो जाते थे। वे सखियों की उस टोली का नेतृत्व करती थीं जो कृष्ण से दान (टैक्स) मांगती थी या उनकी मटकी फोड़ने का उत्तर मांगती थी।
चित्रलेखा (चित्रा) कुंड और चिक्सौली की महिमा
बरसाना के पास चिक्सौली गाँव में आज भी चित्रलेखा सखी का मंदिर और उनसे जुड़ी स्मृतियां मौजूद हैं। यहाँ का 'चित्रा कुंड' अत्यंत पवित्र माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इस कुंड के दर्शन और स्नान से व्यक्ति की कलात्मक बुद्धि प्रखर होती है और उसे राधा-कृष्ण की नित्य सेवा का अधिकार प्राप्त होता है। यहाँ की मिट्टी को आज भी 'कलात्मक मिट्टी' कहा जाता है।
कलियुग में अवतार: श्री वनचंद्र जी और अन्य मत
वैष्णव संप्रदायों की मान्यता के अनुसार, अष्टसखियों ने कलियुग में विभिन्न संतों के रूप में अवतार लिया ताकि वे जीव को भक्ति मार्ग दिखा सकें। चित्रलेखा जी के अवतार के रूप में श्री वनचंद्र जी (हित संप्रदाय के आचार्य) के साथ उनका गहरा संबंध जोड़ा जाता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में चित्रलेखा सखी के भावों को अत्यंत सुंदरता से वर्णित किया है।
चित्रलेखा सखी की उपासना का आध्यात्मिक फल
चित्रलेखा जी की उपासना उन लोगों के लिए विशेष है जो कला, संगीत और रचनात्मकता के क्षेत्र में हैं।
भाव की शुद्धि: उनकी कृपा से साधक के हृदय में गंदे विचारों के स्थान पर दिव्य भावों के चित्र बनने लगते हैं।
एकाग्रता: जिस प्रकार एक चित्रकार एकाग्र होकर चित्र बनाता है, वैसे ही चित्रलेखा जी साधक को कृष्ण के चरणों में एकाग्र होना सिखाती हैं।
अनन्य भक्ति: वे सिखाती हैं कि अपनी हर कला को भगवान के चरणों में समर्पित कर देना ही जीवन की सार्थकता है।
श्री चित्रलेखा सखी ब्रज की उस दिव्य कलात्मकता का स्वरूप हैं जो निर्जीव को भी सजीव बना देती है। चिक्सौली की पावन धरा से शुरू हुई उनकी प्रेम यात्रा आज भी करोड़ों भक्तों के हृदय में 'चित्रा' के रूप में जीवित है। उनकी चतुराई, उनका केसरिया स्वरूप और उनकी तूलिका से निकले राधा-कृष्ण के चित्र ही ब्रज की असली संपत्ति हैं।
चित्रलेखा सप्तमी (भाद्रपद मास) के अवसर पर उनका स्मरण करने से साधक को वैराग्य और प्रेम की अद्भुत अनुभूति होती है। जो भक्त चित्रलेखा जी के माध्यम से राधा रानी की शरण में जाता है, उसे श्री कृष्ण का सान्निध्य अत्यंत सुलभ हो जाता है।
चित्रलेखा सखी भगवान की 'ह्लादिनी शक्ति' (राधा जी) की काय-व्यूह रूपा हैं। जब द्वापर युग में भगवान कृष्ण की लीला का भौतिक समापन हुआ, तब चित्रलेखा जी ने भी अपनी पार्थिव लीला संवरण की। वे अपनी दिव्य योगमाया शक्ति से पुनः गोलोक के नित्य निकुंजों में प्रविष्ट हो गईं।
वहाँ वे आज भी 'चित्र-सेवा' में लीन हैं। वे निरंतर राधा-कृष्ण की नई-नई लीलाओं के चित्र बनाती हैं और उन्हें युगल सरकार को भेंट करती हैं। उनकी उपस्थिति राधा जी के 'वाम' (बाएं) भाग में सदैव बनी रहती है।
