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·अष्ट सखी बरसाना·By प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रेम और कला की प्रतिमूर्ति: श्री विशाखा सखी का दिव्य जीवन चरित्र

प्रेम और कला की प्रतिमूर्ति: श्री विशाखा सखी का दिव्य जीवन चरित्र

उनका शारीरिक वर्ण (रंग) तड़ित (बिजली) के समान अत्यधिक देदीप्यमान और सुनहरी आभा वाला है।

वे 'तारावली' (तारों के समूह) के समान सुंदर और झिलमिलाते हुए वस्त्र धारण करती हैं।

बरसाना — कमई

ब्रज के रसमय निकुंजों में जब भी प्रेम की चर्चा होती है, तो अष्टसखियों का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिया जाता है। इन आठ सखियों में ललिता जी के बाद जिनका स्थान सबसे महत्वपूर्ण है, वे हैं— श्री विशाखा सखी। विशाखा जी न केवल राधा रानी की प्रिय सखी हैं, बल्कि वे उनकी 'काया' (परछाई) के समान मानी जाती हैं। इनका जन्म, गुण और लीलाएं अद्भुत और आलौकिक हैं।

प्राकट्य और जन्म कथा: कमई गाँव का सौभाग्य

विशाखा सखी का प्राकट्य द्वापर युग में ब्रज मंडल के 'कमई' (Kamai) नामक ग्राम में हुआ था, जो बरसाना के अत्यंत निकट है।

माता-पिता: उनके पिता का नाम पावन और माता का नाम दक्षिणा था।

जन्म समय: शास्त्रों के अनुसार, विशाखा जी का जन्म ठीक उसी समय और उसी नक्षत्र में हुआ था जब श्री राधा रानी का प्राकट्य हुआ था। इसी कारण इन्हें राधा जी की 'सहोदरा' (बहन) के समान माना जाता है।

दिव्य स्वरूप: उनका शारीरिक वर्ण (रंग) तड़ित (बिजली) के समान अत्यधिक देदीप्यमान और सुनहरी आभा वाला है। वे 'तारावली' (तारों के समूह) के समान सुंदर और झिलमिलाते हुए वस्त्र धारण करती हैं।

विशाखा सखी का अद्वितीय स्वभाव और गुण

विशाखा जी का व्यक्तित्व अष्टसखियों में सबसे अधिक संतुलित और प्रेममयी माना गया है। जहाँ ललिता जी का स्वभाव 'प्रखर' (तेज) है, वहीं विशाखा जी का स्वभाव 'मधुर' और 'धैर्यवान' है।

सादृश्यता: विशाखा जी का रूप, लावण्य और गुण श्री राधा रानी से इतने मिलते-जुलते हैं कि कभी-कभी स्वयं श्री कृष्ण भी भ्रमित हो जाते थे कि वे राधा जी से बात कर रहे हैं या विशाखा जी से।

कला निपुणता: वे चित्रकारी (Painting) में अत्यंत निपुण हैं। वे राधा और कृष्ण के चित्र बनाने में माहिर हैं और निकुंज की सजावट का विशेष ध्यान रखती हैं।

दूत कर्म: राधा-कृष्ण के बीच गुप्त संदेश पहुँचाने का कार्य (संदेशवाहिका) प्रमुख रूप से विशाखा जी ही करती हैं।

श्री राधा रानी और विशाखा का संबंध

विशाखा जी और राधा रानी के बीच का प्रेम 'अद्वैत' भाव का है। वे राधा जी की प्रसन्नता में ही अपनी प्रसन्नता देखती हैं। राधा रानी जब कभी विरह की अग्नि में जलती हैं, तब विशाखा जी ही अपनी मधुर वाणी और सांत्वना से उनके हृदय को शीतलता प्रदान करती हैं। वे राधा जी के श्रृंगार में 'अलंकारों' और 'वस्त्रों' के चयन की मुख्य सलाहकार मानी जाती हैं।

विशाखा सखी की दिव्य लीलाएं

चित्रपट लीला (The Painting Pastime) : एक बार श्री कृष्ण के दर्शन की लालसा में राधा रानी व्याकुल थीं। तब विशाखा जी ने अपनी अद्भुत चित्रकारी की कला से श्री कृष्ण का एक सजीव चित्र बनाया। उस चित्र को देखकर राधा जी की व्याकुलता शांत हुई। यह लीला दर्शाती है कि विशाखा जी न केवल बाहरी रूप से बल्कि आंतरिक भावों से भी कृष्ण को जानती थीं।

वस्त्र परिवर्तन लीला: कई बार कृष्ण को चिढ़ाने के लिए विशाखा जी राधा रानी जैसे वस्त्र धारण कर लेती थीं। जब कृष्ण उन्हें राधा जी समझकर पास आते, तो विशाखा जी मुस्कुराते हुए प्रकट होतीं, जिससे कृष्ण लज्जित हो जाते और सखियां खिलखिलाकर हँस पड़ती थीं।

कुसुमायुध सेवा: विशाखा जी का मुख्य कार्य निकुंजों में फूलों से बनी मालाएं और आभूषण तैयार करना है। वे 'कपूर' और 'तांबूल' (पान) की सेवा में भी अग्रणी रहती हैं।

विशाखा कुंड की महिमा

गोवर्धन की तलहटी और राधा कुंड के समीप 'विशाखा कुंड' स्थित है। यह कुंड विशाखा जी की तपस्या और उनकी सेवा का प्रतीक है। कहा जाता है कि इस कुंड के जल का आचमन करने मात्र से व्यक्ति के भीतर 'सखी भाव' जाग्रत हो जाता है। ब्रज के संत बताते हैं कि आज भी मध्यरात्रि के समय विशाखा जी अपनी सखियों के साथ यहाँ अदृश्य रूप में विचरण करती हैं।

कलियुग में अवतार: श्री हरिराम व्यास जी

गौड़ीय और वैष्णव मत के अनुसार, जिस प्रकार ललिता सखी ने स्वामी हरिदास जी के रूप में अवतार लिया, उसी प्रकार विशाखा सखी ने कलियुग में 'श्री हरिराम व्यास' जी के रूप में अवतार लिया।

ओरछा के भक्त: हरिराम व्यास जी ओरछा के रहने वाले थे लेकिन वे वृंदावन आकर बस गए।

संत समाज के रत्न: इन्हें 'व्यास जी' कहा जाता है। उन्होंने राधा-कृष्ण की मधुर उपासना की और ब्रज भाषा में हजारों पदों की रचना की।

रासलीला का प्रचार: उन्होंने विशाखा भाव में रहकर ही ठाकुर जी की सेवा की और निकुंज उपासना को जन-जन तक पहुँचाया।

विशाखा सखी की उपासना का आध्यात्मिक महत्व

जो साधक भक्ति मार्ग पर चलना चाहता है, उसके लिए विशाखा जी का आशीर्वाद अनिवार्य है। विशाखा जी ज्ञान और प्रेम दोनों की प्रतीक हैं। वे सिखाती हैं कि कैसे अपनी बुद्धि का उपयोग केवल ईश्वर की सेवा में करना चाहिए। विशाखा जी का जीवन पूर्णतः राधा-मय है। वे जीव को सिखाती हैं कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए 'अहंकार' का त्याग और 'सखी भाव' का उदय आवश्यक है। श्री विशाखा सखी ब्रज की उस दिव्य चेतना का नाम है, जो भक्त और भगवान के बीच सेतु का कार्य करती हैं। उनकी सेवा भावना, उनकी

कलात्मकता और राधा जी के प्रति उनका अनन्य अनुराग उन्हें अष्टसखियों में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करता है। 'कमई' गाँव की गलियों से लेकर 'विशाखा कुंड' के जल तक, उनकी मधुर स्मृतियां आज भी भक्तों को रोमांचित कर देती हैं। विशाखा सप्तमी (भाद्रपद शुक्ल सप्तमी) के पावन पर्व पर उनका पूजन विशेष फलदायी होता है। जो भक्त विशाखा जी का आश्रय लेता है, उसे राधा रानी की गोदी में स्थान प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता।

विशाखा सखी नित्य सिद्ध पराशक्ति की अंश हैं। पुराणों के अनुसार, जब द्वापर युग में भगवान कृष्ण ने अपनी लीला संवरण की, तब विशाखा जी ने भी अपने भौतिक स्वरूप को त्याग दिया। वे योगमाया की शक्ति से पुनः अपने नित्य स्वरूप को प्राप्त कर गोलोक धाम चली गईं। वहाँ वे आज भी राधा जी की दक्षिण भुजा के समान उनके साथ रहती हैं। वे समय-समय पर पृथ्वी पर भक्त हृदय में 'भाव' के रूप में प्रकट होती रहती हैं।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.