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·बृजमंडल : चौबीस उपवन·By प्रमोद कुमार शुक्ला

श्री अंजन वन: आजनौख जहाँ श्यामसुंदर ने स्वयं अपने हाथों से श्रीजी के लगाया था काजल

श्री अंजन वन: आजनौख जहाँ श्यामसुंदर ने स्वयं अपने हाथों से श्रीजी के लगाया था काजल

वराह पुराण के 'मथुरा महात्म्य' में भगवान वराह पृथ्वी देवी को संबोधित करते हुए कहते हैं:

"अंजनं नाम तद्वनं सर्वसौभाग्यवर्धनम्। तत्र स्नात्वा नरो देवि मम रूपमवाप्नुयात्॥"

ब्रजमंडल (मथुरा)

ब्रज की रज का प्रत्येक कण किसी न किसी दिव्य लीला का साक्षी है। इसी श्रृंखला में अंजन वन (Anjanvan) वह अलौकिक स्थली है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा रानी के नेत्रों में 'अंजन' (काजल) लगाया था। यह वन न केवल रसिक संतों की साधना स्थली है, बल्कि यह प्रेम की उस पराकाष्ठा का प्रतीक है जहाँ स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम परमेश्वर अपनी प्रियतमा के 'श्रृंगार सेवक' बन जाते हैं।

ऐतिहासिक एवं भौगोलिक पृष्ठभूमि

अंजन वन वर्तमान उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में कोसी-नंदगाँव मार्ग पर स्थित 'अंजनौक' ग्राम के समीप स्थित है। यह वन नंदगाँव से लगभग ७-८ किलोमीटर की दूरी पर है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह क्षेत्र द्वापर युग के सघन वनों का हिस्सा था। मध्यकाल में जब मुगल आक्रांताओं ने ब्रज के वनों को नष्ट करने का प्रयास किया, तब भी अंजन वन अपनी दिव्यता और दुर्गमता के कारण रसिक संतों की शरण स्थली बना रहा।

धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व: 'अंजन' लीला का रहस्य

अंजन वन का नामकरण ही भगवान की एक विशिष्ट लीला के कारण हुआ है। गर्ग संहिता और ब्रज भक्ति विलास के अनुसार, एक बार श्रीराधा जी और उनकी सखियाँ इस वन में विहार कर रही थीं। श्रीजी का श्रृंगार करते समय सखियाँ उनके नेत्रों में काजल (अंजन) लगाना भूल गईं या काजल कम रह गया।

तब श्रीकृष्ण ने स्वयं एक शिला को काजल (अंजनशिला) बना दिया था और अंजन तैयार करके अपने हाथों से श्रीराधा के नेत्रों को सुशोभित किया। वह अंजन शिला आज भी मंदिर में वैसे ही रखी है। आज भी उस शिला से काजल निकलता है। यह वन इस बात का प्रमाण है कि ब्रज में भगवान 'ईश्वर' नहीं, बल्कि 'प्रेमी' और 'सेवक' के रूप में रहते हैं। सखी भाव की सिद्धि: अंजन वन को सखी भाव की उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यहाँ सखियों ने प्रभु को श्रृंगार सेवा करते देखा था।

प्रमुख दर्शनीय स्थल और उनकी महिमा

1. आजनौख कुंड : वन के मध्य में स्थित यह प्राचीन कुंड अत्यंत पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने इसी कुंड के जल से अपने हाथ धोए थे और यहीं बैठकर अंजन तैयार किया था। आदि वराह पुराण में इस कुंड के दर्शन मात्र से नेत्र रोगों के शमन और दिव्य दृष्टि प्राप्त होने का उल्लेख है।

2. श्री राधा-कृष्ण मंदिर (श्रृंगार स्थली) : अंजनौक ग्राम में स्थित प्राचीन मंदिर में युगल सरकार की वह झाँकी है, जिसमें कृष्ण राधा जी के नेत्रों में अंजन लगा रहे हैं। यह विग्रह अत्यंत दुर्लभ और चित्त को आकर्षित करने वाला है।

3. सखी कुंज और प्राचीन वृक्ष : अंजन वन के वृक्षों की बनावट अन्य वनों से भिन्न है। यहाँ के वृक्ष नीचे की ओर झुके हुए हैं, जिसे भक्त 'श्रृंगार की मुद्रा' कहते हैं। संतों का मानना है कि ये वृक्ष द्वापर युग की उन सखियों के स्वरूप हैं जो आज भी उस लीला को निहार रही हैं। ग्रंथों के आधार पर अंजन वन का विस्तृत विवेचन

आदि वराह पुराण का साक्ष्य : वराह पुराण के 'मथुरा महात्म्य' में भगवान वराह पृथ्वी देवी को संबोधित करते हुए कहते हैं:

"अंजनं नाम तद्वनं सर्वसौभाग्यवर्धनम्। तत्र स्नात्वा नरो देवि मम रूपमवाप्नुयात्॥"

(हे देवि! अंजन नाम का वह वन सभी प्रकार के सौभाग्य को बढ़ाने वाला है। उस वन के कुंड में स्नान करने से मनुष्य को मेरे दिव्य स्वरूप का सानिध्य प्राप्त होता है।)

श्री नारायण भट्ट कृत 'ब्रज भक्ति विलास' का संदर्भ : १६वीं शताब्दी के महान आचार्य श्री नारायण भट्ट जी ने, जिन्होंने ब्रज के लुप्त तीर्थों का अन्वेषण किया, 'अंजनौक' को ब्रज की परिक्रमा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बताया है। उनके अनुसार, यह वन 'श्रृंगार रस' की साक्षात मूर्ति है।

गर्ग संहिता के अनुसार : गर्ग संहिता के 'गिरिराज खंड' में वर्णन आता है कि जब गोपियाँ मान करती थीं, तब श्रीकृष्ण उन्हें इसी अंजन वन में लाकर उनका श्रृंगार कर उन्हें प्रसन्न करते थे। यहाँ का वातावरण काम-क्रोध को शांत कर शुद्ध प्रेम का संचार करता है। भक्ति परंपरा और सांस्कृतिक महत्व अंजन वन में आज भी 'रसिया' गायन और 'समाज गायन' की परंपरा जीवित है। यहाँ के स्थानीय लोग गीतों के माध्यम से गाते हैं:

"अंजन वन में अंजन कीन्हों, सखियन देखत सुख अति लीन्हों।"

यह वन विशेष रूप से उन साधकों के लिए महत्वपूर्ण है जो 'माधुर्य भाव' की उपासना करते हैं। यहाँ चैतन्य महाप्रभु के आगमन के भी प्रमाण मिलते हैं, जब उन्होंने ब्रज यात्रा के दौरान इस गोपनीय स्थल पर भाव-विभोर होकर नृत्य किया था।

श्री अंजन वन ब्रज की उस सूक्ष्म चेतना का हिस्सा है जहाँ भगवान अपने ऐश्वर्य को भुलाकर केवल प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं। ग्रंथों और पुराणों की मर्यादा को समेटे यह वन आज भी भक्तों को निस्वार्थ सेवा और अनन्य प्रेम का संदेश दे रहा है। यहाँ की यात्रा केवल एक शारीरिक भ्रमण नहीं, बल्कि हृदय के श्रृंगार की यात्रा है।

प्रमुख सन्दर्भ (References)

आदि वराह पुराण (मथुरा महात्म्य खंड - अंजन वन महिमा)। गर्ग संहिता (गोलोक खंड एवं विश्वजीत खंड)। ब्रज भक्ति विलास - श्री नारायण भट्ट (तीर्थ अन्वेषण प्रसंग)। भक्ति रत्नाकर - श्री नरहरि चक्रवर्ती (ब्रज यात्रा प्रसंग)। पद्म पुराण (पाताल खंड - ब्रज मंडल वर्णन)।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....[यहाँ क्लिक करें](https://khabar4india.com/blog/pramodkumarshuklaeditorkhabar4indai "यहाँ क्लिक करें")