परम भागवत महर्षि वशिष्ठ: ज्ञान, गुरुता एवं अनन्य भक्ति का दिव्य स्वरूप

भक्ति मार्ग में साधक का ध्येय भगवान की शरणागति और उनके चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त करना होता है। ज्ञानी प्रायः 'सोऽहम्' (मैं वह हूँ) के भाव में लीन रहता है, परंतु परम भक्त 'दासोऽहम्' (मैं प्रभु का दास हूँ) के भाव में आनंद का अनुभव करता है। म
भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक परंपरा में महर्षि वशिष्ठ का नाम अत्यंत श्रद्धा, गौरव और वंदनीय भाव से लिया जाता है। सामान्यतः जनमानस महर्षि वशिष्ठ को केवल एक महान ब्रह्मर्षि, सप्तर्षियों में अग्रणी, वेद-मंत्रों के द्रष्टा, योग-शास्त्र के प्रकांड विद्वान और सूर्यवंश (इक्ष्वाकु वंश) के पूज्य कुलगुरु के रूप में ही जानता है। परंतु यदि सनातन ग्रंथों—विशेषकर श्रीमद्भागवत पुराण, वाल्मीकि रामायण, तथा संतशिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस—का गहन अनुशीलन किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि महर्षि वशिष्ठ केवल ज्ञान के सागर ही नहीं थे, अपितु वे ‘परम भागवत’ अर्थात भगवान के अनन्य और श्रेष्ठतम भक्तों की श्रेणी में भी सर्वोच्च स्थान रखते हैं।
ज्ञान और भक्ति का ऐसा अद्भुत समन्वय इतिहास में विरल ही देखने को मिलता है। जहाँ एक ओर उनका ब्रह्मज्ञान अगाध था, वहीं दूसरी ओर परब्रह्म श्री राम के प्रति उनका अनुराग निष्काम, अव्यभिचारी और अलौकिक था। यह विस्तृत लेख महर्षि वशिष्ठ के इसी अलौकिक ‘भक्त चरित्र’ को उद्घाटित करता है और उन पावन लीलाओं तथा प्रसंगों का सविस्तार वर्णन करता है, जो उन्हें भक्तों की श्रेणी में सर्वोपरि एवं श्रेष्ठ सिद्ध करते हैं।
वशिष्ठ जी के भक्ति-स्वरूप का तात्त्विक एवं आध्यात्मिक विवेचन
भक्ति मार्ग में साधक का ध्येय भगवान की शरणागति और उनके चरणों में अनन्य प्रेम प्राप्त करना होता है। ज्ञानी प्रायः 'सोऽहम्' (मैं वह हूँ) के भाव में लीन रहता है, परंतु परम भक्त 'दासोऽहम्' (मैं प्रभु का दास हूँ) के भाव में आनंद का अनुभव करता है। महर्षि वशिष्ठ के जीवन का सबसे सुंदर पहलू यह है कि वे 'सोऽहम्' की स्थिति में प्रतिष्ठित होते हुए भी 'दासोऽहम्' की पराकाष्ठा पर विराजमान थे।
वे जानते थे कि अयोध्या के राजा दशरथ के महल में अवतरित होने वाले बालक कोई साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं अखिल ब्रह्मांड नायक, सच्चिदानंदघन परब्रह्म श्री हरि हैं। इस तत्त्वज्ञान के होने के बावजूद, वशिष्ठ जी ने कभी अपने ज्ञान का अहंकार नहीं किया। उन्होंने सर्वदा स्वयं को प्रभु श्री राम का नीच-अतिनीच सेवक और दास माना। "ज्ञानिनामग्रगण्यं" होते हुए भी जब हृदय में राम-नाम का स्फुरण होता, तो उनके नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह निकलती थी। यही लक्षण एक सिद्ध भक्त की पहचान है।
इक्ष्वाकु वंश का पुरोहितत्व स्वीकारना — केवल प्रभु अवतार की अभिलाषा
महर्षि वशिष्ठ के परम भक्त होने का प्रथम एवं सबसे बड़ा प्रमाण उस समय मिलता है जब उन्होंने सूर्यवंश की कुलगुरुता (पुरोहिताई) स्वीकार की। शास्त्रों में पुरोहित कर्म (याजकता) को आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत प्रशंसनीय नहीं माना गया है, क्योंकि इसमें यजमान के अधीन रहना पड़ता है और अनेक प्रकार के सांसरिक वेश-भूषा तथा नियमों का पालन करना पड़ता है। जब ब्रह्मा जी ने अपने मानस पुत्र वशिष्ठ जी को इक्ष्वाकु वंश का पुरोहित बनने का आदेश दिया, तो वशिष्ठ जी ने प्रारंभ में इसे अस्वीकार कर दिया।
वशिष्ठ जी कहते हैं—"हे नाथ! जब ब्रह्मा जी ने मुझे पुरोहिताई करने की आज्ञा दी, तब मैंने मन में विचार किया कि यह कार्य तो अत्यंत निकृष्ट है। वेद, शास्त्र और पुराण सभी पुरोहित कर्म की निंदा करते हैं क्योंकि यह आत्म-कल्याण के मार्ग में बाधा डालता है।" परंतु इसके पश्चात ब्रह्मा जी ने वशिष्ठ जी को एक अत्यंत गोपनीय रहस्य बताया। ब्रह्मा जी ने कहा:
विधि तब कहा मोहि समुझाई। परिम लाभ अति होइहि भाई॥
ब्रह्म निरंजन निर्गुण रूपी। सेइहहिं सगुन ब्रह्म भूपती॥
जाके पद पंकज मुनि ध्याहीं। सोइ प्रभु अवध भूप घर आई॥
ब्रह्मा जी ने कहा—"हे वशिष्ठ! तुम जिसे नीच कर्म समझ रहे हो, उसमें तुम्हें एक ऐसा परम लाभ मिलने वाला है जिसकी कल्पना भी कोई मुनि नहीं कर सकता। जिस निर्गुण, निराकार ब्रह्म का ध्यान बड़े-बड़े योगी-मुनि जंगलों में भटककर भी नहीं कर पाते, वही परब्रह्म स्वयं राजा दशरथ के यहाँ पुत्र रूप में सगुण अवतार लेगा। तुम्हें उन प्रभु का सानिध्य मिलेगा, उनके बालचरित्र का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा और तुम उनके गुरु बनकर उन्हें अपनी गोद में खिला सकोगे।"
यह सुनते ही महर्षि वशिष्ठ का संपूर्ण दृष्टिकोण बदल गया। जिस पुरोहित कर्म को वे लोक-निंद्य समझकर ठुकरा रहे थे, केवल "प्रभु श्री राम का सानिध्य और भक्ति" प्राप्त करने के लिए उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। वशिष्ठ जी कहते हैं:
तौ मैं हृदयँ बिचारा तबा। कहुँ अस अवसर पाइहउँ कबा॥
उर धरि राम चरन अनुरागा। कीन्ह्यउँ काज लोक अनुरागा॥
यह लीला सिद्ध करती है कि वशिष्ठ जी के लिए लोक-लाज, प्रतिष्ठा या शास्त्रों के सामान्य नियम कोई मायने नहीं रखते थे। यदि प्रभु की भक्ति और उनका दर्शन मिलता हो, तो वे संसार का सबसे छोटा काम करने को भी सहर्ष तैयार थे। यही अनन्य भक्ति का प्रथम और श्रेष्ठ लक्षण है।
श्री राम जन्म के समय वशिष्ठ जी की भाव-विभोर दशा
जब अयोध्या में चैत्र मास की नवमी तिथि को प्रभु श्री राम का प्राकट्य हुआ, तो संपूर्ण अयोध्या आनंद-सागर में निमग्न हो गई। राजा दशरथ ने तुरंत अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ को बुलवाया। एक ज्ञानी मुनि के रूप में वशिष्ठ जी को शांत और गभीर रहना चाहिए था, परंतु जैसे ही उन्होंने राजभवन में प्रवेश किया और कौशल्या की गोद में नन्हें बाल-राम का दर्शन किया, उनका सारा ज्ञान और ब्रह्म-भाव बह गया। वे केवल एक प्रेमातुर भक्त बनकर रह गए। जब नामकरण का समय आया, तो वशिष्ठ जी ने बालकों के जो नाम रखे, वे केवल साधारण नाम नहीं थे, बल्कि उनमें वशिष्ठ जी का अगाध भक्ति-भाव छिपा था:
राम (रमि रमेश): वशिष्ठ जी ने कहा—"जो आनंद के समुद्र हैं, जिन आनंद-सिंधु के एक कण से संपूर्ण सृष्टि आनंदित होती है, उन सर्वसुखदाता का नाम 'राम' है।"
भरत (विश्व-भरण): "जो संपूर्ण विश्व का भरण-पोषण करने वाले हैं, उनका नाम 'भरत' होगा।"
लक्ष्मण (शुभ लक्षण): "जो समस्त शुभ लक्षणों के धाम और श्री राम के अनन्य सेवक हैं, उनका नाम 'लक्ष्मण' होगा।"
शत्रुघ्न (रिपु दमन): "जो भक्तों के आंतरिक और बाह्य शत्रुओं का नाश करने वाले हैं, वे 'शत्रुघ्न' कहलाएँगे।"
नामकरण करते समय वशिष्ठ जी के नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह रही थी। वे मन ही मन कह रहे थे—"हे प्रभु! आप संपूर्ण जगत् के नाम और रूप के रचयिता हैं, और आज मैं तुच्छ जीव आपका नामकरण कर रहा हूँ! यह केवल आपकी अहेतुकी कृपा है।" ज्ञानी का ऐसा विगलित हो जाना उनकी भक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
अध्यापन की लीला — गुरु पद में भी दास-भाव का निर्वहन
जब चारों राजकुमार थोड़े बड़े हुए, तो उन्हें वेद-वेदांग और धनुर्विद्या की शिक्षा देने के लिए वशिष्ठ जी के आश्रम भेजा गया। यहाँ एक अत्यंत अद्भुत और रसपूर्ण लीला घटित होती है। शास्त्र कहते हैं कि भगवान श्री राम सर्वज्ञ हैं, समस्त विद्याओं के आद्य स्रोत हैं। स्वयं वेद जिनकी श्वास हैं, वे वशिष्ठ जी से विद्या अध्ययन करने का नाटक कर रहे थे। वशिष्ठ जी इस सत्य को भली-भांति जानते थे।
जब श्री राम अपने गुरु वशिष्ठ जी के चरण दबाते, उनके लिए समिधा (हवन की लकड़ी) और कुश लाते, तो वशिष्ठ जी का हृदय संकोच और प्रेम से भर जाता था। बाहर से वे एक कठोर अनुशासक और गुरु की भूमिका निभाते थे, परंतु भीतर से वे प्रभु के चरणों के दास बने रहते थे। जब राम जी हाथ जोड़कर गुरुदेव से आज्ञा माँगते, तो वशिष्ठ जी मन ही मन काँप उठते थे और सोचते—"हे नाथ! यह आप कैसी लीला कर रहे हैं? सारा जगत् आपकी एक भृकुटि के विलास से उत्पन्न और नष्ट होता है, और आप मेरे सामने शिष्य बनकर खड़े हैं!" गुरु के पद पर रहते हुए भी अपने शिष्य में परब्रह्म का दर्शन करना और निरंतर दास-भाव बनाए रखना, केवल महर्षि वशिष्ठ जैसे महान भागवत के लिए ही संभव था।
श्री राम वनगमन एवं वशिष्ठ जी का महा-विरह
जब कैकेयी के वरदान के कारण श्री राम को १४ वर्ष का वनवास मिला, तो संपूर्ण अयोध्या शोक के महासागर में डूब गई। राजा दशरथ ने प्राण त्याग दिए। उस समय वशिष्ठ जी की जो स्थिति थी, वह उनके भक्त चरित्र का सबसे मार्मिक अध्याय है। सामान्यतः ज्ञानी पुरुष सुख और दुख में समभाव रखते हैं। गीता में कहा गया है—
"दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः"
परंतु श्री राम के वन जाते ही महर्षि वशिष्ठ का सारा 'वैराग्य' और 'ज्ञान' प्रेम के अश्रुओं में पिघल गया। जब भरत जी ननिहाल से लौटे और उन्होंने अयोध्या को अनाथ पाया, तो वे वशिष्ठ जी के चरणों में गिरकर रोने लगे। वशिष्ठ जी ने भरत को गले से लगाया। उस समय वशिष्ठ जी की आँखों से इतने आँसू बहे कि उनका संपूर्ण वस्त्र भीग गया।
सोचनीय सबहि बिधि भूपऊ। काजिह करिय ग्यान गुणि रूपऊ॥
करत विचार न जात बखाने। राम विरह दुख सब जग जाने॥
वशिष्ठ जी ने भरत से कहा—"हे भरत! राजा दशरथ के लिए शोक करना व्यर्थ है, क्योंकि उन्होंने राम के विरह में अपने प्राण त्यागकर अपने प्रेम की सत्यता सिद्ध कर दी। परंतु वास्तविक शोचनीय तो मैं हूँ, जो राम के बिना भी जीवित हूँ! मेरा ज्ञान, मेरा ब्रह्मचिंतन सब धिक्कार है यदि वह मुझे राम के विरह के दुख से न बचा सके या मुझे राम के साथ वन न भेज सके!" एक महान ब्रह्मर्षि का स्वयं के ज्ञान को तुच्छ कहना और राम के विरह में एक साधारण भक्त की तरह तड़पना यह सिद्ध करता है कि उनके लिए 'राम-प्रेम' ही सर्वोपरि सिद्धान्त था।
चित्रकूट प्रसंग — भक्ति और शरणागति की अनूठी मिसाल
श्रीरामचरितमानस का अयोध्याकांड वशिष्ठ जी के भक्त चरित्र का स्वर्ण पृष्ठ है। जब भरत जी के नेतृत्व में समस्त अयोध्यावासी, माताएँ और कुलगुरु वशिष्ठ श्री राम को वापस अयोध्या लाने के लिए चित्रकूट जाते हैं, तब वहाँ ज्ञान और भक्ति का जो अद्भुत संवाद होता है, वह दर्शनीय है। चित्रकूट में जब यह प्रश्न उठा कि अब क्या किया जाए, राम वापस अयोध्या लौटेंगे या वन में रहेंगे? तब सबने महर्षि वशिष्ठ से निर्णय देने को कहा। सबने कहा कि गुरुदेव जो आज्ञा देंगे, वही सबको मान्य होगा।उस समय वशिष्ठ जी ने जो कहा, वह उनके 'दास-भाव' और 'भक्त-शिरोमणि' होने की मोहर लगाता है। वशिष्ठ जी ने कहा:
सुनहु भरत हमार मत एहू। राम चंद पद पदुम सनेहू॥
जोग बिराग ग्यान गुनि नाना। करिअ सो राम भगति सुभ जाना॥
वशिष्ठ जी ने भरी सभा में घोषणा की—"हे भरत! मेरा तो स्पष्ट मत है कि जीवन का एकमात्र सार श्री राम के चरणकमलों में अनन्य प्रेम होना ही है। योग, वैराग्य, ज्ञान और जितने भी साधन हैं, उनका अंतिम फल केवल राम-भक्ति प्राप्त करना ही है। यदि ज्ञान से राम-भक्ति न मिले, तो वह ज्ञान व्यर्थ है।" आगे वशिष्ठ जी अत्यंत दीनतापूर्वक श्री राम से कहते हैं:
राम कहाउं सबु कोउ मोही। करउं सो काज राहहु रति तोही॥
सुरुचि समरस समथ समेता। एवमस्तु कहि राम सचेता॥
वशिष्ठ जी कहते हैं—"हे राम! संसार मुझे आपका 'गुरु' कहता है। यह सुनकर मुझे अत्यंत लज्जा आती है, क्योंकि वास्तव में तो मैं आपके दासों का दास हूँ। मैं कोई आदेश देने की योग्यता नहीं रखता। आप जो निर्णय लेंगे, वही धर्म है, वही सत्य है।" एक सर्वसमर्थ गुरु का अपने शिष्य के सामने इस प्रकार समर्पित हो जाना और अपनी गुरुता को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना, भक्ति की पराकाष्ठा है। यहाँ वशिष्ठ जी ज्ञानी गुरु से ऊपर उठकर एक निष्काम शरणागत भक्त के रूप में प्रकट होते हैं।
विश्वामित्र-वशिष्ठ प्रसंग — क्षमा और हरि-कृपा का अवलंबन
महर्षि वशिष्ठ के जीवन की एक अत्यंत प्रसिद्ध लीला महर्षि विश्वामित्र के साथ उनका संघर्ष है। यह लीला दर्शाती है कि वशिष्ठ जी की शक्ति का मूल आधार उनका राजसी तपोबल नहीं, बल्कि उनका 'हरि-विश्वास' और 'अहिंसात्मक भक्ति' थी।
कथा का संक्षेप: जब राजा विश्वामित्र (ब्रह्मर्षि बनने से पूर्व) वशिष्ठ जी के आश्रम में आए, तो उन्होंने वशिष्ठ जी की दिव्य गाय 'नंदिनी' (कामधेनु की पुत्री) को बलपूर्वक छीनना चाहा। विश्वामित्र के पास विशाल सेना और अस्त्र-शस्त्र थे। उन्होंने वशिष्ठ जी पर आक्रमण कर दिया। विश्वामित्र ने वशिष्ठ जी के 100पुत्रों का वध कर दिया। एक पिता के लिए इससे बड़ा दुख क्या हो सकता है? परंतु वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र पर न तो कोई क्रोधाग्नि छोड़ी और न ही बदला लेने की चेष्टा की। वे अत्यंत शांत रहे। जब विश्वामित्र ने अत्यंत दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया, तो वशिष्ठ जी ने केवल अपने 'ब्रह्मदंड' (जो भगवान के नाम और भक्ति का प्रतीक है) को भूमि में गाड़ दिया। विश्वामित्र के सारे आग्नेयास्त्र, वारुणास्त्र और ब्रह्मास्त्र उस ब्रह्मदंड के सामने शांत हो गए।
वशिष्ठ जी जानते थे कि 'जाको राखे साइयाँ, मारि सके न कोई'। वे भगवान के अनन्य भक्त थे, इसलिए उनके हृदय में किसी के प्रति द्वेष नहीं था। उन्होंने अपने 100पुत्रों के हत्यारे विश्वामित्र को न केवल क्षमा किया, बल्कि अंत में जब विश्वामित्र ने कठोर तपस्या की, तो वशिष्ठ जी ने ही सबसे पहले उन्हें 'ब्रह्मर्षि' कहकर स्वीकार किया। विश्वामित्र ने रोते हुए वशिष्ठ जी के चरण पकड़ लिए और कहा—"हे वशिष्ठ! आपका तपोबल और आपकी शांति इसलिए महान है क्योंकि आपके हृदय में सदैव सर्वेश्वर श्री हरि का वास है। मेरा राजसी बल आपके हरि-बल के सामने तिनके के समान उड़ गया।"
यह प्रसंग सिद्ध करता है कि भक्त कभी हिंसा या प्रतिशोध से नहीं जीतता, वह क्षमा, सहनशीलता और प्रभु-विश्वास से जीतता है। वशिष्ठ जी इस कसौटी पर शत-प्रतिशत खरे उतरते हैं।
श्री राम राज्याभिषेक और वशिष्ठ जी का परम वरदान
14 वर्ष के वनवास के पश्चात जब भगवान श्री राम अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ, तो संपूर्ण लोक में आनंद छा गया। राज्याभिषेक के पश्चात श्री राम ने अपने गुरु वशिष्ठ जी की पूजा की, उन्हें दिव्य वस्त्र, आभूषण और गौएँ भेंट कीं। इसके पश्चात उत्तरकांड में एक अत्यंत हृदयस्पर्शी प्रसंग आता है, जो वशिष्ठ जी के भक्त चरित्र का 'मुकुटमणि' है।
वशिष्ठ जी का माँगा गया वरदान: श्री राम ने वशिष्ठ जी से कहा—"हे गुरुदेव! आपने हमारे वंश पर अपार कृपा की है। आपकी कृपा से ही हमने रावण आदि दुष्टों का संहार किया और धर्म की स्थापना की। मैं आपके ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकता। आप मुझसे जो चाहें वरदान माँग लें।" सोचिए! यदि कोई सामान्य व्यक्ति होता या केवल कर्मकांडी पुरोहित होता, तो वह संपत्ति, स्वर्ग, अमरता या सिद्धि माँगता। परंतु वशिष्ठ जी ने जो माँगा, उसने सिद्ध कर दिया कि वे संसार के श्रेष्ठतम भागवत हैं। वशिष्ठ जी ने श्री राम के चरण पकड़ लिए, उनके नेत्रों से अश्रुओं की जलधारा बहने लगी, उनका शरीर रोमांचित हो गया। वशिष्ठ जी ने कहा:
बार बार कर जोरी करि मागत निरुपधि दान।
सुकृपाधम अनुकुल प्रभु मोहि दीजै यह वरदान॥
मागु सत भावं मोहि कृपाला। मोरे मन अति बड़े अति लाला॥
पद कमल अनुरागा। अविरल भगति राम मोहि दीजै॥
वशिष्ठ जी ने कहा—"हे कृपाधान प्रभु! हे नाथ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मुझे वरदान देना ही चाहते हैं, तो मुझे संसार की कोई संपत्ति, मोक्ष या सिद्धि नहीं चाहिए। मुझे केवल यह वरदान दीजिए कि जन्म-जन्मांतर तक मेरे हृदय में आपके चरणकमलों की अनपायिनी (अचल) और अविरल भक्ति बनी रहे!" वशिष्ठ जी कहते हैं—"हे राम! ब्रह्मा जी का बनाया हुआ यह सारा संसार, वेद, शास्त्र, ज्ञान और विवेक—इन सबको मैं एक तरफ रखता हूँ। मुझे तो केवल आपके चरणों का प्रेम चाहिए।"प्रभु
श्री राम की प्रतिक्रिया:जब वशिष्ठ जी ने यह वरदान माँगा, तो स्वयं भगवान श्री राम भाव-विभोर हो गए। उन्होंने अपने गुरुदेव को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। यह प्रसंग प्रमाण है कि जो गुरु पूरे संसार को ज्ञान बाँटता फिरता था, वह अंत में भगवान के सामने एक याचक बनकर केवल 'राम-भक्ति' माँग रहा था। यही एक परम भागवत की सबसे बड़ी पहचान है।
महर्षि वशिष्ठ के भक्त चरित्र के मुख्य आयाम
यदि हम महर्षि वशिष्ठ के संपूर्ण जीवन का विश्लेषण करें, तो उनके भक्त चरित्र के निम्नलिखित प्रमुख आयाम उभरकर सामने आते हैं:
दास्य भाव का चरमोत्कर्ष (Supreme Servant Attitude) : यद्यपि वशिष्ठ जी पद में गुरु थे, परंतु उनका आभ्यंतर भाव सर्वदा 'दास' का रहा। वे जानते थे कि परब्रह्म के सामने गुरुता का अहंकार टिक नहीं सकता। उन्होंने सर्वदा प्रभु की इच्छा में अपनी इच्छा को विलीन कर दिया
निष्काम एवं अव्यभिचारिणी भक्ति (Unmotive Devotion) : वशिष्ठ जी की भक्ति में कोई सांसारिक कामना नहीं थी। उन्होंने पुरोहिताई भी केवल इसलिए स्वीकार की ताकि प्रभु का सानिध्य मिल सके। उन्होंने राज्याभिषेक के समय भी केवल 'चरण-अनुराग' माँगा, मोक्ष भी नहीं माँगा
ज्ञान और भक्ति का समरस समन्वय (Integration of Knowledge and Devotion): वे इस बात के प्रतीक हैं कि सच्चा ज्ञान मनुष्य को शुष्क या कठोर नहीं बनाता, बल्कि वह हृदय को अत्यंत कोमल और भक्तिमय बना देता है। उनका 'योग वाशिष्ठ' का ज्ञान और 'रामचरितमानस' का विरह-अश्रु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
परम सहनशीलता एवं क्षमाशीलता (Supreme Forgiveness): एक सच्चे भक्त के हृदय में भगवान की भाँति ही अगाध क्षमा होती है। पुत्रों के वध के बाद भी विश्वामित्र के प्रति उनका दया-भाव और क्षमाशीलता यह सिद्ध करती है कि उनका हृदय भगवद्-रंग में पूरी तरह रंगा हुआ था।
महर्षि वशिष्ठ का चरित्र केवल एक ऋषि का चरित्र नहीं है, बल्कि वह 'ज्ञान की पराकाष्ठा पर भक्ति के ध्वज' की भांति लहराता हुआ परम पावन चरित्र है। वे हमें सिखाते हैं कि व्यक्ति चाहे कितना भी विद्वान, तपस्वी, मुनि या गुरु क्यों न बन जाए, जब तक उसके हृदय में भगवान श्री राम के चरणों के प्रति अनन्य, अचल और अविरल प्रेम उत्पन्न नहीं होता, तब तक उसकी साधना पूर्ण नहीं मानी जा सकती। जब वशिष्ठ जी जैसा सर्वसमर्थ ब्रह्मर्षि यह कहता है कि:
"जोग बिराग ग्यान गुनि नाना। करिअ सो राम भगति सुभ जाना॥"
तो यह सिद्ध हो जाता है कि भक्ति ही समस्त साधनों का साध्य है। महर्षि वशिष्ठ ने अपने आचरण, अपनी वाणी, अपनी सहनशीलता और प्रभु श्री राम के प्रति अपने अगाध अनुराग से यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया कि वे सनातन परंपरा में भक्तों की श्रेणी में ‘श्रेष्ठ, वंदनीय और सर्वोपरि’ हैं।
ऐसे परम भागवत, ब्रह्मर्षि, कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ जी के पावन चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम!
