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·बृजमंडल : चौबीस उपवन·By प्रमोद कुमार शुक्ला

श्री विहार वन: जहाँ थिरकते हैं युगल सरकार के चरण और गूँजती है नित्य रास की मधुर ध्वनि

श्री विहार वन: जहाँ थिरकते हैं युगल सरकार के चरण और गूँजती है नित्य रास की मधुर ध्वनि

"विहारं नाम तद्वनं सर्वसौख्यप्रदायकम्। यत्र क्रीडति देवेशो राधया सह सर्वदा॥"

(विहार नाम का यह वन सभी सुखों को देने वाला है। यहाँ देवेश श्रीकृष्ण सदैव श्रीराधा के साथ क्रीड़ा करते हैं।)

वृंदावन/ब्रजमंडल

ब्रज के चौरासी कोस की यात्रा में २४ वनों का अपना-अपना महात्म्य है, परंतु 'श्री विहार वन' (जिसे अक्सर विहारी वन भी कहा जाता है) वह स्थली है जहाँ प्रेम की कोई सीमा नहीं है। जैसा कि नाम से ही सिद्ध है— 'विहार' अर्थात क्रीड़ा या भ्रमण। ग्रंथों के अनुसार, यह वह दिव्य उपवन है जहाँ प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) अपनी अष्ट सखियों के साथ एकांत में प्रेम विलास करते हैं।

ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

विहार वन का इतिहास द्वापर युग की उन लीलाओं से जुड़ा है जिन्हें 'नित्य लीला' कहा जाता है। ऐतिहासिक रूप से यह वन वृंदावन और चतुःसीमा के अंतर्गत आने वाले उन सघन कुंजों का हिस्सा है जहाँ आधुनिक काल में भी संतों ने अपनी साधना से साक्षात दर्शन प्राप्त किए हैं।

धार्मिक मान्यता: गर्ग संहिता के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में अवतार लिया, तब उन्होंने अपनी आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा के साथ विहार करने के लिए विशिष्ट उपवनों का निर्माण अपनी संकल्प शक्ति से किया था। विहार वन उसी संकल्प का प्रतिफल है। यहाँ की विशेषता यह है कि यहाँ 'विप्रलंभ' (विरह) का प्रवेश नहीं है; यहाँ केवल 'संयोग' और 'आनंद' का साम्राज्य है।

1. आध्यात्मिक महत्व: रसिक संतों की दृष्टि में : रसिक संतों, विशेषकर स्वामी हरिदास जी और श्री हित हरिवंश महाप्रभु की परंपरा में 'विहार' शब्द का अर्थ अत्यंत गहरा है। उनके अनुसार, विहार वन वह स्थान है जहाँ समय ठहर जाता है और केवल राधा-नाम की गूँज सुनाई देती है

2.केलि कुंज: इस वन को 'केलि कुंज' का हृदय माना जाता है। यहाँ की प्रत्येक लता और वृक्ष के बारे में यह विश्वास है कि वे दिव्य सखियाँ हैं जो युगल सरकार की सेवा के लिए वृक्ष रूप में स्थित हैं।

3.निकुंज सेवा: विहार वन निकुंज उपासना का केंद्र है, जहाँ बाहरी जगत का कोलाहल पूरी तरह वर्जित माना गया है।

प्रमुख दर्शनीय स्थल और उनकी महिमा

1. विहार कुंड (विहार सरोवर) : वन के भीतर एक अति प्राचीन और शांत सरोवर है जिसे 'विहार कुंड' कहा जाता है। आदि वराह पुराण के अनुसार, इस कुंड के जल में श्रीराधा-कृष्ण ने जल-विहार किया था। मान्यता है कि इस कुंड के आचमन मात्र से व्यक्ति की बुद्धि सात्विक हो जाती है और उसे कृष्ण-भक्ति सुलभ होती है।

2. रास चबूतरा : विहार वन के मध्य में एक ऊँचा स्थान है जिसे रास चबूतरा कहा जाता है। माना जाता है कि यहाँ पूर्णिमा की रात्रियों में आज भी अलौकिक रास संपन्न होता है। यहाँ की शांति और दिव्यता श्रद्धालुओं को स्वतः ही ध्यान की अवस्था में ले जाती है।

3. प्राचीन कदम्ब और तमाल के वृक्ष : विहार वन अपने 'युगल वृक्षों' के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ अक्सर एक कदम्ब (श्वेत/पीत) और एक तमाल (श्याम) वृक्ष आपस में लिपटे हुए मिलते हैं, जो राधा और कृष्ण के आलिंगन बद्ध स्वरूप का प्रतीक माने जाते हैं।

ग्रंथों के आधार पर विहार वन का विस्तृत विवेचन

1 आदि वराह पुराण का साक्ष्य : वराह पुराण के 'मथुरा महात्म्य' में भगवान वराह पृथ्वी देवी को इस वन की महिमा बताते हुए कहते हैं

"विहारं नाम तद्वनं सर्वसौख्यप्रदायकम्। यत्र क्रीडति देवेशो राधया सह सर्वदा॥"

(विहार नाम का यह वन सभी सुखों को देने वाला है। यहाँ देवेश श्रीकृष्ण सदैव श्रीराधा के साथ क्रीड़ा करते हैं।)

2. श्री नारायण भट्ट कृत 'ब्रज भक्ति विलास' : १६वीं शताब्दी के महान अन्वेषक श्री नारायण भट्ट जी ने, जिन्होंने ब्रज के लुप्त तीर्थों को पुनः स्थापित किया, 'विहार वन' को ब्रज के सबसे ऊर्जावान केंद्रों में से एक माना है। उनके अनुसार, यहाँ की रज का सेवन करने से 'रास-पंचाध्यायी' के रहस्यों का स्वतः स्फुरण होता है।

3. भक्ति रत्नाकर का संदर्भ : नरहरि चक्रवर्ती ने अपने ग्रंथ भक्ति रत्नाकर में उल्लेख किया है कि जब चैतन्य महाप्रभु के शिष्य इस वन से गुजरते थे, तो वे प्रेम में मूर्छित हो जाते थे क्योंकि यहाँ की वायु में श्रीकृष्ण के अंगों की सुगंध (मृगमद और चन्दन) का अनुभव होता था।

4. गर्ग संहिता के अनुसार : गर्ग संहिता के 'गोलोक खंड' में विहार वन को 'गोलोक का भू-लोक पर विस्तार' कहा गया है। इसमें वर्णन है कि इस वन में पक्षी भी 'राधे-राधे' का गान करते हैं और हिंसक पशु भी अपनी प्रकृति त्याग कर शांत हो जाते हैं।

सांस्कृतिक धरोहर और वर्तमान प्रासंगिकता

वर्तमान में विहार वन का क्षेत्र अपनी प्राकृतिक हरियाली और आध्यात्मिक एकांत के लिए जाना जाता है। यहाँ आधुनिक चकाचौंध से दूर भक्त केवल नाम-जप और कीर्तन के लिए आते हैं। यहाँ की 'वन विहार' की परंपरा आज भी कई संप्रदायों में जीवित है, जहाँ भक्त समूह में आकर पदों का गायन करते हैं।

श्री विहार वन ब्रज की वह अमूल्य निधि है जो हमें ईश्वरीय प्रेम के 'नित्य' और 'आनंदमयी' पक्ष से परिचित कराती है। ग्रंथों की मर्यादा और संतों के साक्ष्य इस वन को एक भौगोलिक स्थान से ऊपर उठाकर एक आध्यात्मिक अवस्था बना देते हैं। जो भी जिज्ञासु इस वन की शरण में आता है, वह संसार के क्लेशों को भूलकर परमानंद की अनुभूति करता है।

प्रमुख सन्दर्भ (References)

आदि वराह पुराण (मथुरा महात्म्य खंड - वन महिमा)। गर्ग संहिता (गोलोक खंड एवं वृंदावन खंड)। ब्रज भक्ति विलास - श्री नारायण भट्ट (तीर्थ अन्वेषण)। भक्ति रत्नाकर - श्री नरहरि चक्रवर्ती। पद्म पुराण (पाताल खंड - ब्रज यात्रा महात्म्य)। उज्ज्वल नीलमणि - श्री रूप गोस्वामी (विहार प्रसंग)।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....[यहाँ क्लिक करें](https://khabar4india.com/blog/pramodkumarshuklaeditorkhabar4indai "यहाँ क्लिक करें")