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·बृजमंडल : चौबीस उपवन·By प्रमोद कुमार शुक्ला

श्री मथुरा वन—ब्रजमंडल का वह द्वार जहाँ इतिहास और आध्यात्म का संगम होता है

 श्री मथुरा वन—ब्रजमंडल का वह द्वार जहाँ इतिहास और आध्यात्म का संगम होता है

आज के आधुनिक युग में, जिसे हम 'मथुरा शहर' कहते हैं, वह कभी इन्ही वनों का हिस्सा था। यद्यपि कंक्रीट के जंगलों ने प्राकृतिक वनों की जगह ले ली है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों में वर्णित इसकी पवित्रता आज भी अक्षुण्ण है।

वृंदावन/मथुरा

भारतीय वांग्मय में 'मथुरा' शब्द केवल एक नगर का बोध नहीं कराता, बल्कि यह 'मथते इति मथुरा' (जो अज्ञान को मथ दे) के भाव को प्रकट करता है। ब्रज के 24 उपवनों में 'मथुरा वन' का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सीधे तौर पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान और उनकी प्रारंभिक बाल-लीलाओं के विस्तार से जुड़ा है।

पौराणिक उद्भव और तात्विक अर्थ

'मथुरा वन' के महत्व को समझने के लिए हमें 'पद्म पुराण' के पाताल खंड का आश्रय लेना पड़ता है। ग्रंथों के अनुसार, मथुरा नगर के चारों ओर जो वन क्षेत्र था, उसे ही 'मथुरा वन' की संज्ञा दी गई थी। यह वन भगवान की ऐश्वर्यमयी लीला और माधुर्यमयी लीला के बीच के सेतु का कार्य करता है।

ग्रंथों के अनुसार महिमा

गर्ग संहिता' के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस वध के बाद मथुरा का शासन संभाला, तब उन्होंने इसी वन क्षेत्र में गौ-चारण और संतों के साथ सत्संग किया था। इस वन को 'मोक्ष प्रदायक' माना गया है। शास्त्रों का मत है:

"मथुरायां च संभूतौ वनं मथुरा संज्ञकम्। यत्र दृष्ट्वा नरो भक्त्या पुनर्जन्म न विन्दति॥"

अर्थात्: मथुरा वन में भक्तिपूर्वक प्रवेश करने वाले मनुष्य को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व

वाराह पुराण का साक्ष्य : भगवान वाराह ने पृथ्वी देवी को संबोधित करते हुए कहा है कि मथुरा वन साक्षात वैकुंठ का ही एक अंश है जो पृथ्वी पर अवतरित हुआ है। वाराह पुराण (मथुरा महात्म्य) में इस वन को 24 उपवनों में प्रथम श्रेणी में रखा गया है। इसका कारण यह है कि यह क्षेत्र 'आदि-तीर्थ' है।

श्रीमद्भागवत और बाल लीला का विस्तार : यद्यपि मुख्य बाल लीलाएं गोकुल और वृंदावन में हुईं, किंतु श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध में उल्लेख मिलता है कि मथुरा की सीमा पर स्थित वनों में कृष्ण और बलराम अक्सर विहार करने आते थे। मथुरा वन वह स्थान है जहाँ मथुरा की प्रजा ने पहली बार कृष्ण के 'गोपाल' रूप के दर्शन किए थे।

मौर्य और गुप्तकालीन संदर्भ : ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो चीनी यात्री फाह्यान और ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में मथुरा के चारों ओर फैले घने वनों का उल्लेख मिलता है। उन्होंने इन वनों को 'पवित्र वाटिका' कहा है। पुरातात्विक खुदाई में प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि मथुरा वन क्षेत्र में कई प्राचीन स्तूप और मठ स्थित थे, जो इसके धार्मिक महत्व की पुष्टि करते हैं।

मथुरा वन की आध्यात्मिक विशिष्टताएँ

ऐश्वर्य और माधुर्य का मिलन: वृंदावन के अन्य वन जहाँ पूरी तरह से प्रेम और माधुर्य (Sweetness) को समर्पित हैं, वहीं मथुरा वन भगवान के 'न्याय' और 'धर्म' की स्थापना (ऐश्वर्य) का प्रतीक है।

ऋषियों की तपोस्थली: ऐतिहासिक रूप से यह वन ध्रुव जी की तपस्या और सप्तर्षियों के आगमन का साक्षी रहा है। 'स्कंद पुराण' के अनुसार, ध्रुव ने जिस मधुवन क्षेत्र में तपस्या की थी, उसका विस्तार मथुरा वन तक फैला हुआ था।

यमुना तट की दिव्यता: इस वन का एक बड़ा हिस्सा प्राचीन काल में यमुना नदी के किनारे स्थित था, जिसे 'विश्राम घाट' के आसपास का वन क्षेत्र भी माना जाता है।

वर्तमान परिदृश्य और संरक्षण

आज के आधुनिक युग में, जिसे हम 'मथुरा शहर' कहते हैं, वह कभी इन्ही वनों का हिस्सा था। यद्यपि कंक्रीट के जंगलों ने प्राकृतिक वनों की जगह ले ली है, लेकिन धार्मिक ग्रंथों में वर्णित इसकी पवित्रता आज भी अक्षुण्ण है। ब्रज की सप्तपुरियों में मथुरा का स्थान होने के कारण, मथुरा वन के प्रतीकात्मक अवशेषों को बचाना अनिवार्य है।

परिक्रमा के दौरान भक्त आज भी इस क्षेत्र की मानसिक वंदना करते हैं, जो इसे जीवंत बनाए हुए है। श्री मथुरा वन हमें याद दिलाता है कि भक्ति केवल एकांत निकुंजों में ही नहीं, बल्कि संसार के बीच (मथुरा जैसे नगर) में रहकर धर्म का पालन करने में भी है। यह वन 'मुक्ति' और 'भक्ति' का वह द्वार है, जहाँ से जीव अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू करता है। ग्रंथों के आधार पर, इस वन की सेवा और इसका स्मरण साक्षात श्रीकृष्ण की सेवा के समान है।

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प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमोद कुमार शुक्ला

प्रमुख सम्पादक

प्रमोद शुक्ला केवल एक पत्रकार ही नहीं, बल्कि ब्रह्म-मध्व-गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय की समृद्ध आध्यात्मिक विरासत के संवाहक भी हैं। पत्रकारिता की पारिवारिक पृष्ठभूमि और इंजीनियरिंग की शिक्षा....Click here.