
खबर4इंडिया
ओएनई दिल्लीः- एसजीपीसी मतलब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी संस्कृति की रक्षा के नाम पर शुरू हुआ एक संगठन जिसने अपने त्याग पराक्रम और संगठनात्मक अनुशासन से अंग्रेजी हुकूमत से अपनी पहचान और अपनी संस्कृति के लिए गुरूद्वारा एक्ट 1925 को पास करा लिया। गांधीवादी विचारधारा के साथ शुरू हुआ गुरूवार सुधार आंदोलन देखते ही देखते हिंसक होते चले गया। समय बदला देश आजाद हुआ देश का बंटवारा हुआ बंटवारे के दंश को सिख समुदाय ने विषेश रूप से झेला, लेकिन आज हालात बदल रहे हैं बंटवारे का दंश झेल चूकें सिख फिर बंटवारे की आग को हवा दे रहे हैं और जल रहा है देश का भविष्य।
वक्फ बोर्ड से खतरनाक SGPC
जैसा की टाइटल में लिखा है एसजीपीसी वक्फ से भी खतरनाक हो चूका है लेकिन कैसे जिसमें जानने के लिए जरूरी है पहले हम ये जानें की एसजीपीसी क्या है और इसके अधिकार में क्या-क्या आता है उसके बाद हम बात करेंगे की एसजीपीसी कैसे देश को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है और किस तरह से खलिस्तान के पौधे को पानी और सहारा देकर मजबूत कर रहा है।
क्या है एसजीपीसी?
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी भारत में मौजूद संस्था है जो गुरुद्वारों के रख-रखाव के लिये उत्तरदायी है। इसका अधिकार क्षेत्र तीन राज्यों पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश तक है। संघ शासित क्षेत्र चंडीगढ़ भी इसमें सम्मिलित है। अमृतसर स्थित हरिमन्दिर साहिब यही संचालित करते हैं। कमेटी को पंजाब के मुख्यमंत्री शासित करते हैं। यह कमेटी गुरुद्वारों की सुरक्षा, वित्तीय, सुविधा रख-रखाव और धार्मिक पहलुओं का प्रबंधन करता है। साथ ही सिख गुरुओं के हथियार, कपड़े, किताबें और लेखन सहित पुरातात्विक रूप से दुर्लभ और पवित्र कलाकृतियों को सुरक्षित रखती है।
कैसे और क्यों हुआ गठन?
बात 1920 की है जब उभरते अकाली नेतृत्व ने 15 नवंबर को अमृतसर में अकाल तख्त (स्वर्ण मंदिर) के निकट सभी प्रकार की राय रखने वाले सिखों की एक सभा बुलाई । इस महासभा को बुलाने का उद्देश्य हरिमंदिर साहिब परिसर और अन्य महत्वपूर्ण ऐतिहासिक गुरुद्वारों के प्रशासन के लिए सिखों की एक समिति का चुनाव करना था। इस बैठक से ठीक दो दिन पहले ही ब्रिटिश भारत सरकार ने हरिमंदिर साहिब के प्रबंधन के लिए 36 सिखों की अपनी भी समिति का गठन किया। इस महासभा ने 175 लोगो को नेतृत्व के लिए चुना गया और एक संगठन तैयार हुआ जिसका नाम शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी रखा गया ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा नियुक्त समिति के सदस्य भी 175 लोगों में शामिल किए गए। उसके बाद शुरू हुआ एक एक कर गुरूद्वारों का प्रबंध अपने हाथों में लेना।
आगे हम आपको बताएंगे कैसे हिंदू महंतों की हत्या कर गुरूद्वारों को मुक्त कराया गया।