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भाग तीन तक में अपने पढ़ा कि कैसे देश का बटवारा हुआ और फिर कैसे पंजाब का गठन हुआ उसके बाद भी पंजाब में इसे लेकर लोगों में संतुष्टि नहीं है। इन सब लड़ाईयों से सिक्खिस्तान आंदोलन कब खालिस्तान में बदल गया किसी को पता नहीं चला हालांकि खालिस्तान की मांग की असली शुरुआत इससे नहीं हुआ उस पर हम एक अलग आर्टिकल में बात करेंगे।
1966 में पंजाब के फिर 4 टूकडे हुए इस बार सिखों को अपना एक राज्य तो मिला लेकिन राजधानी चंडीगढ़ अब भी केंद्र शासित है। 1966 के बाद पंजाब में राजनीतिक हल तेज रही। इस बीच बहुत से झगड़े हुए इसमें से अमृतसर युद्ध खास माना जाता है। मास्टर ताराचंद के बाद बहुत से सिख नेताओं ने पंजाब के लिए लड़ाई लड़ी। जनरेल सिंह भिंडरावाले जैसे बड़े प्रभावशाली नेतृत्व ने पंजाब की क्रांति को धार दी उनकी हत्या ओप्रेशन ब्लू स्टार के दौरान हुई यह खालिस्तान आंदोलन की कहानी से कुछ जुडा हुआ है।
जिसके बारे में हम दूसरे आर्टिकल में बात करेंगे, क्योंकि अभी हमारा मुख्य उद्देश्य एसजीपीसी को एक्सपोज करना है। 1984 के दंगों के बाद इंदिरा गांधी की हत्या हुई और खालिस्तान मैटर को शांत रखने के लिए सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया।
देश का प्रधानमंत्री सिख समुदाय से होने के कारण बहुत हद तक खालिस्तान समर्थकों की बोलती बंद रही। समय बीतता रहा और एसजीपीसी फंड जुटाता रहा लगभग 80% गुरूद्वारों की गुल्लक पर आज एसजीपीसी का कब्जा है। साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में देश में नरेंद्र मोदी की वाली सरकार बनी।
जिसके बाद एक बार फिर खालिस्तान की आग दोबारा भड़की इस वक्त एसजीपीसी के सहयोग से खालिस्तान समर्थक तेजी से बढ़ रहें हैं एसजीपीसी सिखों को हिंदू से अलग साबित करने के लिए नया इतिहास बनाने में लगी हुई है। इतिहास के साथ छेड़छाड़ के साथ ही मुख्य गुरूद्वारों से हिंदू विरोधी बातें होने लगी है।
एसजीपीसी कर रहा है इतिहास से छेड़छाड़ ?
सिखों के मन में हिंदुओं के नफरत भरने के लिए व नई पीढ़ी को खालिस्तान का समर्थक बनाने के लिए एसजीपीसी काम कर रहा है। किसी भी व्यक्ति को एक दूसरे का दुश्मन बनाने के लिए इतिहास का बदला बहुत मायने रखता है। आज से करीब 5 वर्ष पहले सरदार कृपाल सिंह को सिख इतिहासकार के पद से हटा दिया गया और इसके पीछे कारण दिया गया की वो इतिहास ठीक से नहीं लिख रहे हैं।
दरअसल सरदार कृपाल सिंह सिख इतिहास पर रिसर्च करने वाली कमेटी के हेड थे। वह इतिहास में दर्ज सही चीजों को किताबों में छपते थे जो बात एसजीपीसी को बर्दाश्त नहीं थी। एसजीपीसी चाहती थी एक ऐसा इतिहास जो सिखों को हिंदुओं से अलग घोषित कर सके और इसीलिए एसजीपीसी ने सदा कृपाल सिंह को न सिर्फ पद से हटाया बल्कि उनको सोशल मीडिया पर बहुत अधिक ट्रोल भी किया गया। लोगों ने उन्हें हिंदुओं का एजेंट, मोदी का एजेंट आदि शब्द कहे।