Home उत्तर प्रदेश अकबरपुर 'गोदी मीडिया' ने इस तरह बनाया हमें और आपको बेवकूफ

‘गोदी मीडिया’ ने इस तरह बनाया हमें और आपको बेवकूफ

अभिनेता सुशांत सिंह केस में अबतक रिया चक्रवर्ती समेत कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और अभी भी कई एयर गिरफ्तारियां और भी हो सकती हैं। लेकिन इन सबके बीच हमारा यानी आम आदमी से जुड़े मुद्दे को गोदी मीडिया द्वारा दबा दिया गया है। तो आइए हम आपको बताते हैं कि किस तरह से आम आदमी के मामले को गोदी मीडिया द्वारा दबा दिया गया है।

सुशांत सिंह राजपूत और रिया चक्रवर्ती (फाइल फोटो)

कोरोना का डर

पड़ोसी देश चीन से एक महामारी का जन्म होता है। नाम है कोरोना। वैसे तो इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि कोरोना नही है। कोरोना है लेकिन जिस तरह से कोरोना को लेकर गोदी मीडिया ने भूमिका तैयार की वह काबिले तारीफ है।

जब देश में हजार दो हजार केस कोरोना के आते थे तब सेना ने डॉक्टरों पर फूल बरसाया लेकिन अब जब एक एक लाख रोज केस कोरोना के आ रहे हैं और कुछ डॉक्टर रोगियों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं तो इसके लिए अब कोई जवाबदेह नहीं है

वहीं दूसरी कोरोना को बहने के लिए ताली थाली से लेकर मोमबत्ती, टॉर्च तक हम जला चुके हैं। इतना ही नहीं देश की सेना कोरोना योद्धाओं का सम्मान आसमान से फूल बरसाकर उस समय कर चुकी है जब कोरोना के 10-20 हजार केस थे। ये अलग बात है कि कई कोरोना मरीज दवाओं, इलाज और डॉक्टरों को संवेदनहीनता की वजह से जान गवां चुके हैं।

ताली थाली बजाकर कोरोना को भगाने का भी प्रयास किया गया

हमारी हुकूमत ने हद तो तब कर दी जब 1000 या 2000 केस होने पर श्रमिकों को महानगरों से पलायन करने पर मजबूर कर दिया औऱ स्थानीय प्रशासन व पुलिस को उनका दुश्मन बन दिया। लोग अपने परिवार को पैदल ही दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, पंजाब से लेकर निकलते है और आज जब 1 लाख से अधिक मामले प्रतिदिन सामने आ रहे हैं तब अनलॉक के चौथे चरण में हैं हम। अब तो यूपी सरकार ने साप्ताहिक लोकडाउन पर से भी पाबंदी हटा ली है।

कोरोना काल में पुलिस भी मजबूरों और मजदूरों पर लाठियां भांजने के लिए मजबूर थी

हुकूमत गरीबों का पलायान तक नहीं रोक सकी और सारे आवागमन के रास्ते व वाहन बंद कर दिए गए थे। ये हाल तब था जब हजार पांच सौ केस प्रतिदन आते थे आज जब प्रतिदन एक लाख से ज्याजा मामले सामने आ रहे हैं तो सब खुल्लम खुल्ला है और हर तरह की छूट दी गई है और इसे नाम दिया गया है अनलॉक ।

बहरहाल, हम ‘कोरोना से डरना नहीं, लड़ना है’, ‘कोरोना को है धोना’, ‘कोरोना हारेगा, देश जीतेगा’ जैसे नारों आए ‘कोरोना के साथ है जीना’ तक के नारे तक पहुँच चुके हैं। इतना ही नहीं कोरोना नियंत्रण ना कर पाने में फेल रही हमारी हुकूमत की वजह से भारत कोरोना संक्रमितों की संख्या में जल्द ही विश्वगुरु बनने वाला है। बस हम सिर्फ इस मामले में अमेरिका से पीछे हैं और जल्द ही अमेरिका हमारे सामने घुटने टेक देगा।

कोरोना के मामले में भारत की लड़ाई ताली थाली बजाने से शुरू हुई और अब लगता है विश्व गुरू बन जाएगा। क्योंकि भारत सिर्फ अमेरिका से ही पीछे है कोरोना के मामले में।

कुल मिलाकर पेड और गोदी मीडिया ने आम जनता से जुड़े मुद्दे स्क्रीन से गायब कर दिए और ऐड के चक्कर में एकाध चैनल को छोड़कर बाकी सब सरकारी तोते बने रहे। जो सरकार बोलती रही वही मीडिया बोलती रही। ना तो आम आदमी की तकलीफे स्क्रीन पर आई और ना ही विपक्ष की आवाज। नतीजन भाड़ मीडिया की जमकर कोरोना काल में कमाई हुई, कुछ संस्थान अपने पुराने कर्मियों को हटाने में कामयाब हुए लेकिन आम आदमी परेशान होता रहा।

सच्ची पत्रकारिता को रोका गया

लॉक डाउन में सरकार द्वारा जनता की मदद का भरोसा दिलाया गया। जनता को मुफ्त राशन देने की योजना चलाई गई। लेकिन कोटेदारों ने जमकर चांदी काटी। जब जब कोई पत्रकार जनता की समस्या उठाने के लिए आगे बढ़ा तो उसपर अवैध उगाही/वसूली/प्रयास व लॉक डाउन के नियमों को तोड़ने से जुड़े कई मुकदमें लाद दिए गए। नतीजन आम लोगों की आवाज दबती रही और कोटेदार लोगों को 5 किलो प्रति यूनिट के की जगह 3 किलो प्रति यूनिट वितरित करते रहे। यानी प्रति यूनिट 2 किलो का फायदा लेते रहे। यह भी ध्यान रहे कि सिर्फ चावल और गेंहूं ही वितरित की जाती थी या फिर एकाध किलो दाल। सब्जी मिर्च, दाल, मसाला राम भरोसे ही था। सरकारी राशन की कालाबाजारे से जुड़े सच्चाईयों से नीचे दिए गए कार्टून जरूर रूबरू करा रहे हैं।

सुशांत केस के बहाने दबे कई मुद्दे

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण गोदी और भांड मीडिया के दमपर के मामले दबा ले गया। अभी कोरोना काल में भांड मीडिया गोदी मीडिया बनकर सेवा कर रही थी कि सुशांत केस मामले के साथ साथ सीमा पर भारत चीन सैनिकों के झड़प की खबर आ जाती है।

गलवन घाटी में शहीद हुए हमारे जवान

भारतीय जवानों के साथ चीनी सैनिकों की झड़प का मुद्दा

गोदी मीडिया तमाम तरह के फर्जी रिपोर्ट दिखा दिखाकर देश को गुमराह करती रहती है। एक प्रतिष्टित समाचार चैनल ‘… तक’ की एक शीर्ष एंकर ने तो गोदी मीडिया की सारी पराकाष्ठा दिखाते हुए जवानों पर ही सवाल खड़े कर दिए। मोहतरमा के मुताबिक वहां सरकार की नही जवानों की गलती थी।

वीडियो में आप देख सकते हैं कि किस तरह से जवानों पर प्रश्नचिन्ह पूर्णतय: वातानुकुलित न्यूज रूम से की जा रही है

बता दें कि इस झड़प में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। वहीं गोदी मीडिया में चीन के कब्रिस्तानों की पुरानी वीडियो को दिखाकर देश का गुस्सा शान्त किया। गोदी मीडिया द्वारा दावा किया गया कि सरकार ने भारतीय जवानों की शहादत का बदला ले लिया है औऱ इतने चीनी सैनिक मार गिराए हैं कि कब्रिस्तान में शवों को दफनाने के लिए जगह ही कम पड़ रही है।

लल्लनटॉप के मुताबिक भारत सरकार ने किसी भी प्रकार की बदले की कार्रवाई की जानकारी नहीं दी है

गिरती अर्थव्यस्था का मुद्दा

कोरोना काल में लगभग सभी देशों की अर्थव्यस्था गिरी है। लेकिन भारत की सबसे ज्यादा। भारत वह देश है जो अपनी पुरानी जीडीपी नही बचा सका और -24 फीसदी पर आ गया। यानी देश एक दशक से ज्यादा पीछे जीडीपी के मामले में चला गया। लेकिन भक्त लोग तमाम तरीके के मैसेजेस फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मोदी सरकार की साख बचाने में जुटे हैं।

इस तिमाही की रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश की जीडीपी गिरकर 23.9 फीसदी रह गई है। भारतीय अर्थव्यवस्था में इसे 1996 के बाद ऐतिहासिक गिरावट माना जा रहा है और इसकी वजह है कोरोना वायरस की वजह से हुआ दुनिया का सबसे बड़ा लॉकडाउन। खैर, सच तो ये है कि इस लॉकडाउन से पहले ही देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई थी। कार से लेकर कालीन उद्योग तक बार्बाद और बंद होने लगे थे। रही-सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी। जीडीपी 40 साल में पहली बार इतनी नीचे गिरी।

कोरोना काल के बीच अगर सबसे ज्यादा किसी देश की जीडीपी गिरी है तो वह है भारत। लेकिन किसी भी चैनल नो (दो-एक) को छोड़कर किसी ने भी जीडीपी में आई गिरावट को लेकर डिबेट नहीं किया। सिर्फ सुशांत सिंह राजपूत, कंगना रनावत, रिया चक्रवर्ती, कोरोना के फर्जी आंकड़े ही टीवी चैनल दिखाते रहे।

देश की अर्थव्यवस्था को अगर किसी ने संभाला है तो वह हमारे किसान हैं। इस तिमाही में सिर्फ कृषि क्षेत्र से ही अच्छी खबर आई है। इस साल मानसून की अच्छी बारिश के कारण कृषि सेक्टर में 3 फीसदी से 3.4 फीसदी के दर से बढ़ोत्तरी हुई, इसीलिए सब्जी और किराना बाजार पर मंदी का असर नहीं दिख रहा है और कोरोना काल में सिर्फ इन्हीं चीजों की मांग और सप्लाई है। लेकिन बाकी हर तरफ तंगहाली है।

छोटे व्यवसाइयों से जाकर पूछिए क्या हाल है उनका। शोरूम में मध्यमवर्गीय बिजनैसमैन से जाकर पूछिए कितने टीवी फ्रिज आदि बिक रहे हैं? होटल वालों से पूछिए। व्यापार, होटल और ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्र में 47 फीसदी की गिरावट आई है।एक समय भारत का सबसे मजबूत रहा निर्माण उद्योग 39 फीसदी तक सिकुड़ गया है। शहरों में फैल्टस के दाम 20 फीसदी तक गिर गए हैं। कोई खरीददार नहीं है। पिछले साल अगस्त में कार बिक्री में 32 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई जो दो दशकों में सबसे अधिक थी।

ये कोरे आंकड़े नहीं हैं, जमीनी हकीकत है। बेशक आपको कार और होटल से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन आपके पड़ोसी के बच्चे कल तक वहां नौकरी करते थे। आज वे बेकार हैं, क्योंकि उनके मालिक ने उन्हें घर बैठा दिया है। अब आप कह रहे हैं पूरी दुनिया का यही हाल है। बिलकुल यही हाल है, लेकिन इतना बुरा नहीं जितना भारत का है. अमेरिका की अर्थव्यवस्था में जहां इसी तिमाही में 9.5 फीसदी की गिरावट है, वहीं जापान की अर्थव्यवस्था में 7.6 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।

चीन में 6 फीसदी गिरावट के बाद 2 फीसदी की वृद्धि हुई, लेकिन हम 23 फीसदी नीचे चले गए। और सबसे दुखद बात ये कि फिलहाल ऊपर आने के कोई संभावनाएं नहीं दिख रही हैं।

बेरोजगारी का मुद्दा

कोरोना काल में हजारों छोटे मझौले कंपनियां बंद हो गयी। लाखों लोग बेरोजगार हुए लेकिन ‘सरकार की रखैल’ व भांड मीडिया ने कभी भी इन आंकड़ों को स्क्रीन पर दिखाना उचित नही समझा।इतना ही नहीं लाखों लोग अपने कर्मभूमि से सरकार द्वारा लिए गए गलत फैसलों की वजह से दूर हो गए। वहीं, युवाओं का और खासकर ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं का तो ब्रेन ही वाश कर दिया गया है। उनका कहना है देश में अच्छी सरकार है हम पेट्रोल 1000 रुपए लीटर खरीदेंगे, हम बेरोजगार रहेंगे, किसान खुश है और क्या चाहिए? हालांकि वही युवा खुद के रोजगार के मुद्दे से जुड़े सवाल, महंगी बिजली, महंगी यूरिया व अन्य खाद से जुड़े सवालों पर चुप हो जाता है।

जिस किसी ने भी ये फेसबुक पर शेयर किया है बहुत ही सही किया है। आज युवा नौकरी के लिए परेशान है और किसान को यूरिया के लिए दाम से अधिक पैसे चुकाने पड़ रहे हैं

आजकल के युवाओं में जो शिक्षकों द्वारा चीजें पढ़ाई गयी थी वह दीमाग से निकल चुकी है और अब दीमाग में सिर्फ फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम जैसे कूड़े कचरे जगह ले चुके हैं। नीचे दिए गए कार्टून से आज के युवाओं की मानसिकता का अंदाजा आप लगा सकते हैं।

आज के युवाओं का ब्रेन वाश बखूबी कर दिया गया है। आज उनके दीमाग में पढ़ाई लिखाई, नौकरी पेशा की जगह कार्टून में दिखाई गई चीजें ही भरी हैं।

सुशांत सिंह और बिहार चुनाव

सुशांत सिंह राजपूत के मामले को बिहार सरकार बखूबी भुना रही है। मामले में एक प्राथमिकी दर्ज की जाती है और उसे सीबीआई को जांच के लिए सिफ़रिसबकी जाती है और अगले 24 घण्टे में केस सीबीआई के पास। केस सीबीआई को सौंप दिया गया लेकिन जांच मीडिया कर रही है। हां हाँ वही भांड मीडिया। अब सुशांत केस के बहाने बिहार के जनता की आवाज भांड मीडिया ने दबा दी। अब शिक्षा, रोजगार, विकास के मुद्दे पर नही बल्कि बिहार सरकार सुशांत के मुद्दे पर वोट मांग रही है और मीडिया सुशान्त केस की जमकर पीआर कर रही है।

सीबीआई जांच में क्या सामने निकालकर आता है यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन मीडिया ट्रायल पूरा हो चुका है और कथित ‘खान गैंग’ औऱ रिया चक्रवर्ती को बस फांसी पर लटकाने मीडिया की तरफ से बांकी बचा है। मामले की सीबी जांच जरूरी थी खासकर मुम्बई पुलिस द्वारा बरती जा रही लापरवाही के चलते लेकिन सिर्फ सुशान्त मुद्दे को उठाना और हजारों गरीब, किसानों के आत्महत्या के मुद्दे को भूल जाना यह दर्शाता है कि भांड मीडिया अब ‘सरकारी रखैल’ बनकर रह चुकी है।

आज हजारों बेरोजगार युवा सुसाइड कर रहे हैं। हजारों किसान जीवन त्याग रहे हैं। उनकी बात मीडिया के स्क्रीन से सिर्फ इसलिए गायब है क्योंकि अब वह भांड, दल्ली, सरकार की रखैल बनकर रह चुकी है। या फिर यह कहें कि आधुनिक मीडिया ‘सरकारी तोता’ बन चुका है। सरकार जो रटाती है वही भांड मीडिया बोलती है।

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ए. के. शुक्लाhttps://www.khabar4india.com
एके शुक्ला लगभग 5 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हैं और खबर4इंडिया, खबर4यूपी और भड़ास4नेता के फाउंडर और संपादक हैं। शुक्ला कई समाचार चैनलों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। शुक्ला बेखौफ और परिणाम की चिंता किए बिना जन सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता करते रहे हैं। इस समाचार से जुड़े शिकायत एवं सुझाव हेतु मो. न. 9990486338 पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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