Tuesday, July 7, 2020
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जीवन संवाद: रास्ते और सुख!

हम सब कितने ही सुखी क्यों न हों जैसे ही यह कोई पूछता है, हमारा जवाब क्या होता है! हम ऐसे चौंक जाते हैं, मानिए यह पूछने वाला स्वयं ईश्वर हो. जैसे ही हम कहेंगे हमारे पास सब कुछ है, वह तुरंत हमारी चाहत पर पूर्ण विराम (फुलस्टॉप) लगा देगा. संतोष हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण गुण था. महत्वाकांक्षा के बादलों ने उस पर ऐसा आक्रमण किया कि उसे अपना बोरिया बिस्तर समेट कर दूर कहीं जाना पड़ गया.

हमारे दिमाग की ट्रेनिंग कुछ ऐसी है कि वह उन्हीं चीजों की ओर भागता है जो उसे उपलब्ध नहीं होतीं. हम अक्सर ही उनका मजाक उड़ाते हैं, जिनसे हम सहमत नहीं होते. लेकिन ऐसा करते करते हम अक्सर खुद को बहुत अधिक असंतुष्ट और अस्थिर चित् बना लेते हैं. हमारे सारे सुख कुछ इसी तरह बुने हुए हैं. आप इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि यह दिमागी दिवालियापन है. दिमाग कुछ इस तरह शून्य होता जाता है कि हमें असली और नक़ली का अंतर ही भूलता जाता है.

खुद को नष्ट करने का अर्थ हमेशा आत्महत्या नहीं है. जीवन को ऐसी चीजों के लिए समर्पित कर देना , जिनका कोई मूल्य नहीं है, यह भी आत्महत्या जैसा है.

हम उस रास्ते चलने की कोशिश नहीं करते, जो हमने बनाए हैं. ऐसा इसलिए नहीं क्योंकि हम डरते हैं , बल्कि इसलिए क्योंकि हमें रास्ता बनाना पसंद ही नहीं. रास्ता तो दूर की बात है हम पगडंडी तक नहीं बनाते. हम केवल उन लकीरों पर चलते रहते हैं, जो किसी तरह उन रास्तों पर बची रह गई हैं, जिन पर हम चल रहे हैं.

रास्ते कैसे बनते हैं.पगडंडी कैसे बनती हैं! दोनों ही आत्मा के अमृत से बनती हैं. आत्मा का अमृत कैसे बनता है. अमृत बनता है अंतर ध्वनि, भीतर की आवाज़ से जो किसी दिशा में आपको ले जाना चाहिए. इन दिशाओं का कैसे पता चलता है! दिशा का आपकी दृष्टि से पता चलता है. आपके विचार की महीन परतों से पता चलता है.

जब हमारे दिमाग़ ने जिन चीजों के आधार पर सुख तय किए हैं, जिनका आधार ही हमारा नहीं है, तो वह सुख हमारे कैसे होंगे! इसी वजह से लोग जीवन को त्यागने का असमय निर्णय लेते हैं. इसी वजह से लोग आत्महत्या करते हैं. अपनी पूरी ज़िंदगी किसी काम मेंं खपा देने बाद जब उनको एहसास होता है वह गलत रास्ते पर हैं तो वह प्रायश्चित की जगह खुद को नष्ट करने की राह पर आगे बढ़ जाते हैं. ‌ ‌

खुद को नष्ट करने का अर्थ हमेशा आत्महत्या नहीं है. जीवन को ऐसी चीजों के लिए समर्पित कर देना, जिनका कोई मूल्य नहीं है, यह भी आत्महत्या जैसा है.

एक परिवार को मैं जानता हूं. बाहर से वह बड़े ही सूखी हैं. लेकिन भीतर? भीतर कुछ ऐसा घटता रहता है, मानो कल ही सब कुछ नष्ट हो जाएगा. क्योंकि उनने सारे रास्ते वही चुने जो उधार के थे. हर निर्णय वही जो पहले से तय है. सुरक्षित निर्णय. हमेशा याद रहे सुरक्षित निर्णय हमें केवल जिंदा रख सकता है, सुखी नहीं. हम जिंदगी में चुनने से क्यों बचते हैं? इसीलिए ना कि कल को कोई न कैसेे कि यह तुम्हारा निर्णय है? इतना कमजोर! इस डर के मारे हम अपने फैसलेेे खुद नहीं लेेेते. हम अपनेेे फैसलों पर सलाह की चारदीवारी बनाए रखते हैं. क्योंकि हम डरते हैं नए रास्तों पर चलने से.

अगर हमारी विचार प्रक्रिया में कुछ अनूठा नहीं है. कुछ नया नहीं है. कोई नवाचार नहीं है. तो उसका परिणाम क्या होगा? उसका परिणाम असली सुख नहीं हो सकता.

सुख और रास्तों के चयन बहुत गहरे जुड़े हुए हैं. दिमाग को ठीक से समझिए, मन के जाले साफ कीजिए. मन के जाले ही आपके और रोशन ख्याल के बीच सबसे बड़ी बाधा हैं.

ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

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ए. के. शुक्लाhttp://www.khabar4india.com
एके शुक्ला लगभग 5 वर्षों से मीडिया में सक्रिय हैं और खबर4इंडिया, खबर4यूपी और भड़ास4नेता के फाउंडर और संपादक हैं। शुक्ला कई समाचार चैनलों में विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। शुक्ला बेखौफ और परिणाम की चिंता किए बिना जन सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता करते रहे हैं। शुक्ला से कोई भी बेहिचक मोबाइल नंबर 9990486338 पर सम्पर्क कर सकता है।

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